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कोरोना : कराह रही मानवता

कोरोना के भय के साए में सभी मतभेद एक मत होना चाहते हैं। यह अभूतपूर्व और अत्यंत आश्चर्यजनक समय है, जब काल के शिकंजे में कराह रही मानवता अपनी मुक्ति के लिए परमात्मा के द्वार तक जाने में भी असमर्थ है। मानो परमात्मा कहना चाहते हों कि मुझे बाहर मत खोज नादान मैं तो तेरे घट में ही व्याप्त हूं। सभी भाषाएं, सभी संस्कृतियां आज मूक भाव से अज्ञात राहत का पथ ताक रही हैं। कोई देश कितना भी शक्तिशाली हो आज बेबस और बेदम है।

कोरोना : कराह रही मानवता
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कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक)

पहली बार मनुष्य की पूर्ण सामर्थ्य प्रकृति के सम्मुख नतमस्तक है। विज्ञान की समस्त उड़ान परमात्मा की चौखट पर माथा टेकने को विवश है। प्रगति की अर्जी है कि उसे अभी और बहुत कुछ ऐसा है, जिसे समझना और जानना शेष है? खोज और शोध की दरकारें, घर के दरीचों से अज्ञात व्योम को निहार रही हैं कि कहीं तो, कोई तो आशा की किरण होगी, जो जीवन दान का संदेशा लाती हो? बड़ी बड़ी व्यस्तताएं घर की चारदीवारी के भीतर, मज़बूरन ही सही, स्वयं का आंकलन करने को विवश हैं! सहमी हुई धरती शायद अपने अतिरेक का प्रायश्चित करना चाहती है। पदार्थ में रसी सभ्यता पुनः अपने मूल की ओर निहार रही है, स्तब्ध खामोशी और भय के साथ। अब जब बाहर के सभी द्वार दरवाजे बंद हो ही चुके हैं, तो शायद यह सर्वाधिक उपयुक्त समय है स्वयं के साथ हो लेने का। अन्तर्यात्रा के सूत्र हमें अपने मौलिक स्वरुप से साक्षात्कार का सेतु सिद्ध हो सकते हैं।

भय के साये में सभी मतभेद एक मत होना चाहते हैं। यह अभूतपूर्व और अत्यंत आश्चर्यजनक समय है, जब काल के शिकंजे में कराह रही मानवता अपनी मुक्ति लिए परमात्मा के द्वार तक जाने में भी असमर्थ है। मानो परमात्मा कहना चाहते हों कि मुझे बाहर मत खोज नादान मैं तो तेरे घट में ही व्याप्त हूं। ऐसे ही क्षणों में किसी ने लिखा होगा, भीतर के पट खोल तुझे पिया मिलेंगे! कौन है सबसे बड़ा पिया वही जो हिया में समाया है। सभी भाषाएं, सभी संस्कृतियां आज मूक भाव से अज्ञात राहत का पथ ताक रही हैं। कोई देश कितना भी शक्तिशाली हो आज बेबस और बेदम है। चाहकर भी कोई किसी की मदद नहीं कर सकता है। कुदरत के हाथ सबसे ज्यादा मजबूत हैं। हम जब भी उसके बनाए नियम तोड़ते हैं स्वयं ही अपने बुने हुए जाल में फंस जाते हैं। मैं जानता हूं कि यह समय नसीहत का नहीं है, लेकिन मनुष्य की फितरत है कि उसे वक्त पड़ने पर ही समझ आता है। अगर वो इतना समझदार पहले ही होता तो शायद यह स्थिति आती ही नहीं। ऑस्ट्रलिया के जंगलों में लगी भीषण आग में स्वाह हुए करोड़ों निरीह प्राणियों के अस्तित्त्व की चीत्कार प्रकृति के नियमों का उल्लंघन हैं। अभक्ष का अतिरेक सदैव महामारी को जन्मता है। चीन के लोगों के खानपान पर सभ्य विश्व सदैव अंगुली उठाता रहा है, लेकिन चीन का तुर्रा ये था कि खानपान किसी भी समुदाय या व्यक्ति का अपना निजी मसला है। इस पर किसी को प्रश्न करने का हक नहीं है। भारत की अवधारणा सदैव वसुधैव कुटुंबकम की रही है, यानि पूरा विश्व ही हमारा परिवार है। आज यह मूल संदेश बहुत प्रखर होकर उभरा है। हम सभी किसी न किसी तरह से एक दूसरे से जुड़े ही हुए हैं। हमारे सभी प्रकार के कार्य सभी पर प्रभाव डालते ही हैं। कोरोना ने यह साबित कर दिया है कि आप दुनिया के किसी भी छोर पर क्यों न हों आपके द्वारा किया गया कृत्य सभी को प्रभावित करता है।

पेड़ पर लगे फल को आंख देखती है। मन में लोभ उपजता है। तृष्णा की लिप्सा जिव्हा के रास्ते स्वाद तलाशती है। पैर फल को तोड़ने चलते हैं। हाथ तोड़ते हैं, लेकिन खाते नहीं। मुंह खाता है, लेकिन रख नहीं पाता। इसी बीच रक्षक माली की दृष्टि व्यक्ति पर पड़ती है। डंडा पड़ता है पीठ पर, आंसू बहते हैं आँख से, उसी का दोष था, देखा उसी ने था। सृष्टि और प्रकृति का वर्तुल पूर्ण हुआ। न्याय उपलब्ध हुआ अपने गंतव्य को। चीन ने जो बीज बोया है अब पूरी दुनिया उसकी विषैली फसल काटने को विवश है। सबसे बड़ी सजा भी उसे ही मिली है और मिलेगी। पिछले तीन महीने में चीन अरबों खरबों डॉलर के नुकसान के नीचे आ चुका है। सभी देश इस महामारी के साथ-साथ आर्थिक पतन से भी दो चार होने को विवश हैं।

भारत में पहली बार 21 मार्च के बाद से हफ्ते भर तक किसी भी देश की कोई भी फ्लाइट लैंड नहीं करेगी। जब से हवाई यात्रा का प्रारम्भ हुआ तब से लेकर आज तक यह पहली बार होगा। जो आध्यात्मिक ऊर्जाओं के संग साथ को समझता है वह स्वतः ही दूरदर्शी होता है। भारत का सौभाग्य है कि उसे बहुत पारखी दृष्टि वाला मुखिया मिला है। जिस खतरे को अमेरिका और यूरोप हल्के में लेता रहा, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत समझदारी से समझा। भारत उन देशों में अग्रणी रहा जिन्होंने अपने आगंतुक यात्रियों के लिए चिकित्सा जांच को सबसे पहले शुरू किया और पीड़ितों को सही देखरेख प्रदान की। जैसी हमारी मेडिकल व्यवस्थाएं हैं और जैसा हमारा भारतीय हीला हवाली वाला मन है ऐसे में विशेष सतर्कताएं और सावधानियां ही इस बीमारी पर अंकुश सिद्ध होंगी। भारत में जितनी आबादी है उसके लिहाज से भी हमें अत्यधिक सतर्क और सुरक्षित रहने की जरूरत है। जो किसी भी विश्व युद्ध में नहीं हुआ वह इस वायरस युद्ध में हो रहा है।

जब भी देश में कोई विशेष परिस्थितयां उपजी प्रधानमंत्री एक अभिभावक और घर के बड़े के रूप में प्रकट हुए। सभ्य समाज में राजनीती सिर्फ जुमलों की दुकान भर नहीं है गहरे सरोकारों और मर्मों को ताकने की एक कीमियां हैं, जो बिरलों को नसीब होती है। सिर्फ कहने भर से कोई नेता नहीं हो जाता। संवेदनशील होने के लिए आपको जमीन से जुड़ा होना होता है। जैसे मोदी जी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का आह्वान किया है इससे वे समूचे विश्व में अपनी तरह के अकेले नेता बनकर उभरेंगे। सार्क देशों को साथ लेकर संकट के निवारण हेतु उनकी गंभीरता जल्दी ही उन्हें एक ऐसा विकल्प बनाकर प्रस्तुत करेगी जिसके गर्भ से विश्व नेतृत्व की संभावनाओं का उदय होगा। ऐसे थोड़े ही भारत विश्व गुरु रहा है।

ऐसा लगता है कि इस त्रासदी के जरिये प्रकृति हमसे कुछ कहना चाहती है। भीड़भाड़ भरी आपा धापी वाली दुनिया से कुदरत कह रही है, अपने से अपनों से मुलाकात करो ना। शायद ये वायरस हमें हमारे बनावटी पागलपन से दूर करने के लिए आया है। यह वायरस हमें जोड़ने आया है, अपनी धरा से, अपनी आदतों में सुधार से, जीवन में स्वच्छता अपनाने के नियमों पर पालन करने से, अपने आपको नितांत निजी रखकर स्वयं की आवाज़ सुनने से। हो सकता है हवाई जहाजों के कार्बन से अंतरिक्ष का कलेजा मुंह को आ रहा हो। अब आकाश भी कुछ दिन का अवकाश पाकर अपने फेफड़ों में स्वच्छ प्राणवायु को आत्मसात कर पाएगा। शॉपिंग मालों और छविगृहों में हुई तालाबंदी हृदयों पर लगे तालों में जुम्बिश पैदा कर पाए। सिनेमा और अस्त व्यस्त जीवन चर्या से परे आप उन किताबों को कुछ पल निहार पाएं, जिन पर धूल की मोटी परतें जमीं हैं। ये समय है हृदय की वीणा के तार झंकृत करने का। होठों पर बांसुरी रखने का। अंदर छिपा बच्चा जो बड़ों की दुनिया से डर सहम गया है उसके हाथों में फिर से ब्रश कलर देने का। बच्चों को अपने किस्से सुनाने और उनकी मुद्दतों से इंतजार कर रही मासूम कहानियों को सुनने का। सांप सीढ़ी, लूडो और कैरम बोर्ड पर उंगलियाँ थिरकाने का। बासी और बेस्वाद भोजन जिसकी पनाहगाह

रेस्टोरेंट थे उनसे मुक्त होने का भी समय है। घर में चटनी रोटी का मौसम आया है जो स्वाद उसमें है उसी स्वाद में जीवन है।

कुछ राहत मिली होगी अपने कत्ल का इंतज़ार करते हुए पशु पक्षियों को भी। जब दुनिया में शांति और सौहार्द होगा तो उसी की छाया में आरोग्य भी पनपता है। सभी मानव जब दानव न होकर मानव के ही पथ का अनुसरण करेंगे, तो पूरे अस्तित्त्व में एक लयबद्धता का अभ्युदय होगा। आप देखना जैसे ही यह तस्वीर पूरी होगी ,वह सबका मालिक मुस्कुराएगा और जब वह मुस्कुराएगा तब पूरी धरती मुस्कुराएगी।

अच्छा करना ही करो

केवल करा रह जाएगा।

इस धरा पर इस धरा का

सब धरा रह जाएगा।

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