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चीन अपनी शर्मिंदगी की वजहों पर आत्मचिंतन करे

ड्रैगन को इस बात का एहसास हो गया है कि ग्लोबल स्तर पर वह अलग-थलग पड़ता जा रहा है।

चीन अपनी शर्मिंदगी की वजहों पर आत्मचिंतन करे
परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के शामिल होने की राह का रोड़ा बनने वाले चीन को अब शर्मिंदगी महसूस हो रही है। चीन का भारत से चिरौरी करना कि एनएसजी मामले में वह उसे बदनाम नहीं करे, साबित करता है कि ड्रैगन को इस बात का एहसास हो गया है कि ग्लोबल स्तर पर वह अलग-थलग पड़ता जा रहा है। एनएसजी पर भारत ने जिस मजबूती से कूटनीतिक बाजी खेली, उसमें सदस्यता नहीं मिलने के बावजूद वैश्विक सर्मथन में भारत ने चीन को करारी मात दी।
अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, र्जमनी, कनाडा जैसे ताकतवर देश भारत के साथ खड़े दिखे, तो चीन का भारत विरोध जगजाहिर हो गया। 48 देशों के एनएसजी समूह में से केवल चार देश चीन की मुहिम में साथ दिखे। इसके बाद तो जैसे चीन दुनिया में एक्सपोज ही हो गया, जबकि वह ढंके-छिपे रहना चाहता था। सिओल मीटिंग के दरम्यान चीन की शह पर पाकिस्तान ने भी जिस तरह भारत को रोकने के लिए 17 देशों को पत्र लिख कर अभियान चलाया, उससे चीन की छवि पाक सर्मथक और भारत विरोधी की बनी।
जैश ए मोहम्मद के सरगना मौलाना अजहर मसूद को संयुक्त राष्ट्र में ग्लोबल आतंकी घोषित करवाने की भारत की कोशिशों को भी चीन ने जिस तरह रोका, उससे भी उसकी छवि पाक सर्मथक व भारत विरोधी की बनी। आज चीन को अपनी इस 'नई पाकपरस्त छवि' पर खल रहा है। कारण भी साफ है कि विश्व में पाकिस्तान आतंकवाद की पनाहगाह के तौर पर कुख्यात हो गया है, ऐसे में कोई भी देश अपने को पाक का मित्र नहीं कहलाना पसंद करेगा। निश्चित ही पाक की 'यारी' चीन को नहीं भा रही है। इसलिए वह टीस महसूस कर रहा है।
चीन के सरकारी अखबार ने भारत पर तंज भी कसा है कि वह 1962 की मानसिकता से नहीं उबर पा रहा है, लेकिन सच तो यह है कि ड्रैगन खुद 1962 की मानसिकता में जी रहा है। उस समय भी वह विस्तारवाद की नीति पर चल रहा था, आज भी चल रहा है। उसकी विस्तारवादी नीति के चलते ही उसके सभी सीमाई पड़ोसी देशों रिश्ते अच्छे नहीं हैं। चीन की सीमा दुनिया में सबसे अधिक 14 देशों को छूती है। लेकिन हर देश के साथ सीमा पर चीन का तनावपूर्ण रवैया है।
चीन एक तरफ दक्षिण सागर में भारत के लिए सुरक्षा चुनौती पेश कर रहा है, तो पाकिस्तान और नेपाल के साथ पींगे बढ़ा कर भारत विरोधी सेंटिमेंट को हवा दे रहा है। जबकि दुनिया साक्षी है कि भारत ने हमेशा वसुधैव कुटंबकम् की नीति को आत्मसात किया है, किसी भी देश पर आधिपत्य जमाने का कभी प्रयास नहीं किया है। इसलिए चीन को खुद अपनी कूटनीति व विदेश नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। वैसे चीन के तेवर अपने आप नरम नहीं हुए हैं, बल्कि यह भारत की कूटनीतिक पेशबंदी का प्रतिफल है। भारत ने मसूद का जवाब डोल्कन इशा से दिया था।
भारत ने कहा कि वह एमटीसीआर में चीन का विरोध नहीं करेगा। उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन को साफ संदेश दिया कि अब भारत उससे आंख मिलाकर बात कर रहा है। भारत-जापान और अमेरिकी की तिकड़ी और रूस के साथ भारत के मजबूत संबंध भी चीन के लिए आईना है। इसलिए अब चीन को अपनी शर्मिंदगी की वजहों को ढूंढ़ना चाहिए कि आखिर भारत विरोध से वह ज्यादा हासिल करेगा या ग्लोबल अर्थव्यवस्था में तेजी से आगे बढ़ रहे भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखकर अधिक पाएगा?
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