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रोजगार के लिए शिक्षा तंत्र में सुधार जरूरी

एक पीएचडी किया व्यक्ति चपरासी बनने की लाइन में खड़ा हो रहा है, तो यहां पूछा जा सकता हैकि ये संस्थान किस स्तर की शिक्षा अपने छात्रों को दे रहे हैं।

रोजगार के लिए शिक्षा तंत्र में सुधार जरूरी
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के सचिवालय में चपरासी की करीब साढ़े तीन सौ पोस्ट के लिए 23 लाख लोगों ने आवेदन किया है जिसमें पीएचडी, बीटेक, बीएससी, बीकॉम, एमएससी, एमकॉम और एमए की डिग्री हासिल किए हुए युवाओं की भरमार है। उत्तर प्रदेश की आबादी करीब 21.5 करोड़ है। यानी हर 93वें व्यक्ति ने इस पोस्ट के लिए आवेदन किया है। देश में बेरोजगारी का जो आलम है उसे देखते हुए यह खबर बहुत ज्यादा चौंकाती नहीं है, बल्कि रोजगार के मोर्चे पर जो संकट है उसे ही एक नए रूप में शासकों के सामने ला रही है। खासकर देश में शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है। उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि जहां पांचवीं पास योग्यता रखी गई है, वहां आवेदन करने वालों में बड़े डिग्रीधारियों का हुजूम उमड़ पड़ा है। आज देश में हर साल करीब एक करोड़ युवा र्शम के बाजार में प्रवेश कर रहे हैं, लेकिन उसकी तुलना में संगठित क्षेत्र में सिर्फ पांच लाख नौकरियां ही पैदा हो पा रही हैं। जाहिर है, बाकी लोग बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो जा रहे हैं। ऐसे लोग सोचते हैं कि बेकार रहने से बेहतर है कि चपरासी जैसी छोटी-मोटी नौकरी ही कर ली जाए।
आज उपभोक्तावादी युग में बिना नियमित आय पर गुजारा करना मुश्किल है। यदि आप मोटी रकम खर्च करके पीएचडी, इंजीनियरिंग या एमबीए जैसी उच्च डिग्रियां प्राप्त किए हैं तब तो बेरोजगारी के आलम में समाज भी आपको सवालिया निगाहों से देखता है। उत्तर प्रदेश की यह घटना देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की भी पोल खोलने के लिए पर्याप्त है जिसमें शिक्षण संस्थाओं का ज्यादा जोर डिग्रियां बांटने पर होता है। आज हमारे विश्वविद्यालयों में जो पढ़ाया जाता है उसका र्शम बाजार से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। ऐसे में छात्र पीएचडी जैसी ऊंची डिग्री तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन उसके बिना पर वे कोई ढंग की नौकरी नहीं प्राप्त कर पाते। लंबे समय से उद्योग या सेवा जगत की जरूरतों को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम तैयार करने की मांग की जा रही है, जिससे छात्रों में पढ़ाई के दौरान ही उचित हुनर का विकास हो सके, लेकिन शिक्षण संस्थाओं ने इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। विश्वविद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रश्न खड़ा होता रहा है।
एक पीएचडी या इंजीनियरिंग किया व्यक्ति चपरासी बनने की लाइन में खड़ा हो रहा है, तो यहां पूछा जा सकता हैकि ये संस्थान किस स्तर की शिक्षा अपने छात्रों को दे रहे हैं। देश की प्रतिष्ठित संस्था एसोचैम ने एक अध्ययन में पाया हैकि देश के इंजीनियरिंग व प्रबंधन कॉलेजों से हर साल लाखों छात्र पढ़ाईकरके निकलते हैं, लेकिन उनमें से करीब 35 फीसदी बीटेक व एमबीए किए छात्र नौकरी के काबिल नहीं होते हैं। जाहिर है, देश में गत कुछ वर्षों में ऐसे संस्थानों की बाढ़ तो आई है, लेकिन उनमें दी जाने वाली तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षा का स्तर गिरा है। बहरहाल, हालात को बदलने का एक ही तरीका है कि देश में रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं और युवाओं को इस काबिल बनाया जाए कि वे अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी हासिल कर सकें। ऐसे में स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया योजना कारगर साबित हो सकती है। स्किल इंडिया के तहत 2022 तक 40 करोड़ लोगों में कौशल का विकास करना है जिससे कि उनकी कार्य क्षमता में सुधार लाया जा सके। मेक इन इंडिया के तहत देश में उद्योग धंधों का विस्तार करना है जिससे रोजगार के अवसर पैदा हो सकें।
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