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घाटी में अमन बहाली के लिए टूटा भाजपा पीडीपी का गठबंधन

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा नीत राजग सरकार ने अलगाववादियों सहित सभी पक्षों से बातचीत के लिए वार्ताकार भी घाटी भेजा परंतु उसके भी सार्थक नतीजे नहीं निकले।

घाटी में अमन बहाली के लिए टूटा भाजपा पीडीपी का गठबंधन

जिस बात की आशंका थी, जम्मू-कश्मीर में वही हुआ। भाजपा-पीडीपी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। सेना और केन्द्रीय सुरक्षा बल की आतंकियों के खिलाफ मुहिम के इस कारण सही नतीजे देखने को नहीं मिले, क्योंकि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती दूसरा ही राग अलापती रहीं।

हजारों उन पत्थरबाजों को भी मुकदमे वापस लेकर उनकी सरकार ने रिहा कर दिया, जिन्हें राज्य के दक्षिणी जिलों से गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा नीत राजग सरकार ने अलगाववादियों सहित सभी पक्षों से बातचीत के लिए वार्ताकार भी घाटी भेजा परंतु उसके भी सार्थक नतीजे नहीं निकले।

स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शपथ समारोह में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित किया और रूस व अफगानिस्तान की यात्रा से दिल्ली लौटते हुए लाहौर रुककर आपसी विश्वास बहाली की दिशा में ठोस कदम भी बढ़ाया परंतु पहले पठानकोट एयरबेस पर और उसके उपरांत उड़ी सेक्टर में सेना के कैंप पर आतंकवादी वारदात करवाकर पाकिस्तानी सेना और आतंकी जमातों ने अमन की कोशिशों में पलीता लगाने का काम किया।

घाटी में निरंतर आतंकवादी वारदातें करवाकर उसे सुलगाए रखा। सेना और केन्द्रीय बलों पर लगातार पत्थरबाजी कराकर ऐसी विषाक्त वातावरण निर्मित कर दिया कि बातचीत की गुंजाईश खत्म हो जाए। पिछले तीन साल में केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में विकास परियोजनाओं के लिए बाईस हजार करोड़ की धनराशि जारी की है ताकि राज्य विकास की दौड़ में पीछे नहीं रह जाए।

इस बीच कई योजनाएं सिरे भी चढ़ी हैं परंतु जो पहले कभी नहीं हुआ, जब वह घटनाएं घटने लगी तो पीडीपी के साथ राज्य की सत्ता में शामिल भारतीय जनता पार्टी को सख्त रुख अपनाना पड़ा। महबूबा मुफ्ती की जिद पर ही गृह मंत्रालय ने रमजान के दौरान घाटी में आपरेशन आल आउट को स्थगित कर युद्ध विराम लागू करने का ऐलान किया परंतु इस दौरान भी न केवल पत्थरबाजी जारी रही बल्कि आतंकी वारदातें भी जारी रहीं।

एक बड़े संपादक की हत्या सहित कई ऐसी बड़ी वारदातें वहां घटी, जिनके बाद इसमें कोई शक नहीं रह गया कि महबूबा सरकार और राज्य की पुलिस सख्ती के मूड़ में ही नहीं है। सीज फायर पर पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। इससे खासकर जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में भी भाजपा को लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता था। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती इस सबके बावजूद चाहती थी कि सीज फायर वापस न लिया जाए।

इसके अलावा भी कई दूसरे मसले थे, जिन्हें लेकर भाजपा-पीडीपी में कभी सहमति बन ही नहीं पाई। जिस तरह सीमा पार से नित नई साजिशें रची जा रही हैं और अमरनाथ यात्रा पर हमले के जैसे इनपुट्स मिल रहे हैं, उन्हें देखते हुए भाजपा के सामने इसके अलावा कोई चारा बचा नहीं था कि तीन साल पुराने गठबंधन से बाहर आया जाए और जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाकर सेना और सुरक्षाबलों को खुली छूट दी जाए ताकि पत्थरबाजों से लेकर उन तमाम आतंकी जमातों को ठिकाने लगाया जा सके,

जिन्हें कहीं न कहीं महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री रहते, थोड़ी छूट और रहमदिली मिल रही थी। जाहिर है, अब राज्यपाल शासन में उन्हें किसी तरह की छूट नहीं मिलेगी। जो भी तत्व घाटी को सुलगाते रहे हैं, उन पर भी ठीक से मुश्कें कसी जा सकेंगी। हालांकि पहली बार जम्मू-कश्मीर सरकार का हिस्सा बनी भाजपा के लिए सरकार के विखंडन का फैसला आसान नहीं था परंतु पाकिस्तान ने आतंकी जमातों और अलगाववादियों के जरिए वहां जिस तरह के हालात पैदा कर दिए थे,

उनमें महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री रहते, सुधार करना संभव नहीं रह गया था। महबूबा अब भले ही यह बहाना करें कि केन्द्र ने संवाद की कोशिश नहीं की। वस्तुस्थिति यह है कि नवाज शरीफ से लेकर अलगाववादियों तक से बातचीत के हर संभव प्रयास किए गए परंतु जो तत्व घाटी में अमन का विरोध करके अपने खास एजेंडे पर काम करते रहे हैं,

उन्होंने उन कोशिशों को सिरे ही नहीं चढ़ने दिया। जाहिर है, अब वहां शांति बहाल करने का दूसरा रास्ता है, जिस पर तेजी से और समझदारी से आगे बढ़ना होगा। पिछले तीन-चार साल में छह सौ से ज्यादा आतंकवादियों को वहां ठिकाने लगाया गया है। इस मुहिम को सख्ती से जारी रखना होगा। तभी सीमा पार की साजिशों को विफल कर वहां अमन और विकास की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

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