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व्यंग्य: दूसरी नस्ल का कॉकटेल चिंतक

पहली और दूसरी नस्ल का कॉकटेल चिंतक हूं। कॉकटेल चिंतक बोले तो प्रोफेशनल कम सेंशैसनल चिंतक। आप विश्वास तो नहीं करोगे पर सच कहूं तो मैं ऐसा चिंतक पेट के लिए हुआ हूं। जो ये पेट न होता तो चिंतन का चालू धंधा कभी न करता। वैसे आज का दौर प्रोफेशनल कम सेंशैसनल होने का दौर है। किराए के आंसू ला रोने का दौर है। वे मेरे चिंतन करने के आर्ट के बहुत कायल हैं।

व्यंग्य: दूसरी नस्ल का कॉकटेल चिंतक
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पहली और दूसरी नस्ल का कॉकटेल चिंतक हूं। कॉकटेल चिंतक बोले तो प्रोफेशनल कम सेंशैसनल चिंतक। आप विश्वास तो नहीं करोगे पर सच कहूं तो मैं ऐसा चिंतक पेट के लिए हुआ हूं। जो ये पेट न होता तो चिंतन का चालू धंधा कभी न करता। वैसे आज का दौर प्रोफेशनल कम सेंशैसनल होने का दौर है। किराए के आंसू ला रोने का दौर है। वे मेरे चिंतन करने के आर्ट के बहुत कायल हैं।

कल वे मेरे पास फिर आए। उनसे सबकुछ आता है पर सेंशैसनल देशीय चिंतन करना नहीं आता। उस वक्त मैं किसी दूसरे के चिंतन का ड्राफ्ट फाइनल करने में जुटा था। आते ही बोले, बंधु मेरी तरफ से देश हित में एक फड़कता हुआ सेंशैसनल चिंतन तैयार कर दो। कब तक चाहिए आपको चिंतन, कब तक हो जाएगा, पर अबके जरा जल्दी है,

कहकर उन्होंने अपनी जेब से चिंतन करने के लिए कागज पर लिखा टॉपिक मेरी ओर बढ़ाते आगे पूछा, दो-चार दिन में हो जाएगा क्या। असल में मैं इस टॉपिक पर चिंता व्यक्त कर खांटी समाज सुधारक होना चाहता हूं। समाज को बताना चाहता हूं कि उन्हें ही नहीं, मुझे भी समाज की चिंता है। वे ही नही, मैं भी विपक्ष में बैठा समाज की विसंगतियों को देख परेशान हूं बड़ा।

सॉरी, मरा जा रहा हूं, मैंने उनके हाथ से कागज का मुचड़ा टुकड़ा लिया, उसे सीधा किया तो देखा कि वे गिरते रुपये और बढ़ते पेट्रोल के दामों पर धांसू चिंता लिखवाने आए थे। मतलब एक साथ दो-दो टॉपिकों पर चिंता! मैंने गौर से उनके कागज के टुकड़े एक बार फिर घुमा फिरा कर देखा, उसके बाद उनसे बिंग ए प्रोफेशनल पूछा, मतलब आप एक तीर से दो मुर्गे मारना चाहते हो।

बस तुम्हारी कृपा हो जाए तो। पर चिंता के शब्द ऐसे हों कि सीधे सरकार की छाती में जा लगें पृथ्वीराज के शब्द भेदी बाणों की तरह, कह वे ठेठ विपक्षी हंसी होंठों पर लिए खिसियाए तो मैंने कहा, पर अभी तो देश के बीसियों शुभचिंतकों की चिंताएं लिखने को पैंडिंग पड़ी हैं सर! देश में पंगे ही इतने हो रहे हैं कि...।

अभी उनको देश में बढ़ते बलात्कारों को लेकर चिंता लिखनी है। रोज दिमाग खाए जा रहे हैं कि इससे पहले कि देश में कोई और बलात्कार हो जाए उन्हें अपनी चिंता रिलीज करनी है बस! इस बाबत रोज दिन में दस-दस बार फोन करके दिमाग खाते रहते हैं। मैंने उनसे कहा भी कि बंधु! देश में बलात्कार, चोरी, डकैती, लूट मार सतत्ा प्रक्रिया है। ये देश के महत्वपूर्ण अंग हैं।

इन्हें लेकर इत्ते उतावले होने का नहीं। पर नहीं, वे तो बस चिंता व्यक्त करने का इत्ते व्यग्र हैं जैसे उसके बाद देश में बलात्कार रूक जाएंगे। देश में बलात्कारों को लेकर उनकी चिंता जैसे मील का पत्थर साबित होगी। ये देखो, उनकी चिंता लिखने को पिछले एक महीने से कोने में पड़ी है। मेरे पास बंधु दिमाग तो एक ही है न! आप नहीं जानते एक ही दिमाग से बीसियों किस्म की सेंशैसनल चिंताएं लिखना कितना कठिन दुष्कर्म है।

मतलब, उन्होंने मुंह सा बनाया। बंधु! अभी न तो देश में पेट्रोल के दाम गिरने वाले हैं और न ही रुपये की सेहत सुधरने वाली है। कदम-कदम पर गिरना और न सुधरना हम सबकी चारित्रिक विषेशता है। सरकार जहां चाहे हम सबको इलाज के लिए ले जाए। इसलिए पेट्रोल में और आग लगने दो। रुपये को सगर्व और गिरने दो। बस, वेट एंड वाच।

सही वक्त पर इनको लेकर आपको ऐसी चिंता लिख कर दूंगा कि, ऐसी चिंता लिख कर दूंगा कि आग लगे पेट्रोल पर घी का काम करेगी। टूटी कमर वाले रुपये की कमर पर वज्र सा प्रहार करेगी। सारे चिंतकों की आपकी चिंता को सुन घिग्गी बंध जाएगी। पर प्लीज! इससे पहले कि पेट्रोल की आग कम हो जाए, रुपया कमर पकड़ कर ही सही उठ जाए,

मैं देश का सबसे बड़ा चिंतक होने का मौका खोना नहीं चाहता अबके। मेरा चिंतन अब तुम्हारे हवाले है दोस्त! तुम्हें तुम्हारे प्रोफेशन का वास्ता! और वे मुझे मेरे प्रोफेशन का वास्ता दे आगे हो लिए। वास्तों पर ही तो देश टिका है दोस्तो! टिकाना भी पड़ेगा। और दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है अपुन के पास।

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