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योगेश कुमार गोयल का लेख : समरसता के विचाराें पर सदैव अटल

भारतीय जनसंघ के संस्थापक पहली बार 1957 में बलरामपुर सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे ऐसी शख्सियत थे जिनका सभी विपक्षी दलों के नेता भी सम्मान करते थे। राष्ट्रीय मंचों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पर उन्होंने सदैव अपने वक्तव्यों का लोहा मनवाया। उन्होंने प्रधानमंत्री रहते ही 1 मई 1998 को राजस्थान के पोरखण में परमाणु बम परीक्षण किया गया था और इस प्रकार उन्होंने देश को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाकर दुनियाभर में भारत की धाक जमाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो वर्ष 2005 में उन्हें राजनीति के भीष्म पितामह की संज्ञा दी थी।

योगेश कुमार गोयल का लेख : समरसता के विचाराें पर सदैव अटल
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अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

योगेश कुमार गोयल

भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के ही टिकट पर वर्ष 1957 में पहली बार बलरामपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। उसके बाद से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर में एक स्कूल अध्यापक के घर जन्मे अटल जी की शख्सियत और हाजिरजवाबी ऐसी थी कि तमाम विरोधी दलों के नेता भी उनका सम्मान किया करते थे। अपनी हाजिरजवाबी की अद्भुत शैली से उन्हें सामने वाले की बोलती बंद कर देने की महारत हासिल थी। अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पर उन्होंने सदैव अपने वक्तव्यों का लोहा मनवाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो वर्ष 2005 में उन्हें राजनीति के भीष्म पितामह की संज्ञा दी थी। वे समरस के विचारों पर सदैव अटल थे।

वाजपेयी अपने 93 वर्ष के जीवनकाल में तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे और उनकी लंबी अस्वस्थता के चलते तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रोटोकॉल तोड़ते हुए 27 मार्च 2015 को स्वयं उनके आवास पर जाकर उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया था। वे वाजपेयी ही थे, जिनके प्रधानमंत्री रहते ही 1 मई 1998 को राजस्थान के पोरखण में परमाणु बम परीक्षण किया गया था और इस प्रकार उन्होंने देश को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाकर दुनियाभर में भारत की धाक जमाई थी। पूरी दुनिया को अपने प्रेरणादायक संदेश में उन्होंने एक बार कहा था कि हम यूं ही अपने कीमती संसाधनों को युद्धों में बर्बाद कर रहे हैं, अगर युद्ध करना ही है तो बेरोजगारी, बीमारी, गरीबी और पिछड़ेपन से करना चाहिए। वे अक्सर कहा करते थे कि छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता और टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

अटल बिहारी वाजपेयी भारत के ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जो अपनी हाजिरजवाबी, मजाकिया लहजे, मुहावरों और शब्दों से भेदने वाले संवादों के जरिये अपने विरोधियों को निरुत्तर कर दिया करते थे। वाजपेयी अपनी चुटीली शैली और हाजिरजवाबी के लिए इतने विख्यात थे कि कई बार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी दूसरे पक्ष की बोलती बंद कर दी थी। ऐसा ही एक किस्सा है, जब एक बार एक महिला पाकिस्तानी पत्रकार ने अटल के समक्ष बड़ा ही अनोखा प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि अगर आप मुंह दिखाई में कश्मीर दें तो मैं आपसे शादी करने को तैयार हूं। अटल जी ने तपाक से जवाब देते हुए समूचे पाकिस्तान को एक ही झटके में हिला दिया था कि ठीक है, मैं आपसे शादी कर लूंगा लेकिन मुझे दहेज में पूरा पाकिस्तान चाहिए। उनकी हाजिरजवाबी के ऐसे ही अनेक किस्से सामने आते हैं। एक बार पाक प्रधानमंत्री का बयान आया कि कश्मीर के बिना पाकिस्तान अधूरा है। वाजपेयी जी ने तुरंत पलटवार करते हुए कहा कि 'पर पाकिस्तान के बिना हिन्दुस्तान अधूरा है।' पाकिस्तान के आतंकी कैंपों के बारे में सवाल करते हुए कुछ पत्रकारों ने उनसे सवाल किया कि पड़ोसी कहते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती। इस पर वाजपेयी ने उत्तर दिया कि मैं कहता हूं कि ताली नहीं, चुटकी तो बज ही सकती है। 1996 के लोकसभा चुनावों में जब भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और प्रधानमंत्री पद के लिए वाजपेयी का नाम सामने आया तो एक पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में वाजपेयी से तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो से संबंधित एक सवाल पूछा कि आज रात बेनजीर भुट्टो को आप क्या संदेश देना चाहेंगे? वाजपेयी ने तपाक से जवाब दिया कि अगर कल सुबह बेनजीर को कोई संदेश दूं तो क्या कोई नुकसान है?

वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में ममता बनर्जी रेलमंत्री थी। वो बात-बात पर नाराज हो जाया करती हैं। उस समय भी पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों को लेकर ममता इस कदर नाराज हुई कि उनकी नाराजगी से केन्द्र में उन्हीं की सरकार पर सवाल उठने लगे। वाजपेयी द्वारा ममता को मनाने के लिए कोलकाता भेजे गए जॉर्ज फर्नांडीज से भी जब ममता ने मुलाकात तक नहीं की, तब स्वयं वाजपेयी एकाएक कोलकाता में ममता के घर जा पहुंचे। उस समय ममता कोलकाता से बाहर थी। वाजपेयी जी ने वहां पहुंचकर ममता की मां के चरण स्पर्श करतेे हुए कहा कि आपकी बेटी बहुत शरारती है, बहुत तंग करती है। बताया जाता है कि ममता को यह पता चलते ही उनका गुस्सा चंद पलों में ही शांत हो गया था।

एक बार रामबिलास पासवान ने भाजपा पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा था कि भाजपा राम की बातें बहुत करती है पर वास्तव में उसमें कोई राम नहीं है जबकि मेरे तो नाम में ही राम है। इसका जवाब देते हुए वाजपेयी जी ने यह कहकर कि पासवान जी, हराम में भी राम होता है पासवान की बोलती बंद कर दी थी। एक टीवी कार्यक्रम के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे सवाल किया कि कहा जाता है कि भाजपा में इस समय दो दल हैं, एक नरम और दूसरा गरम, जिनमें से एक वाजपेयी का है और दूसरा आडवाणी का। यह सुनते ही वाजपेयी ने झट से जवाब दिया कि मैं किसी दलदल में नहीं हूं बल्कि मैं तो औरों के दलदल में अपना कमल खिलाता हूं।

1970 के दशक का एक वाकया है, जब वाजपेयी को पुणे में आयोजित एक जनसभा में तीन लाख रुपये भेंट किए जाने थे। पार्टी के जिन कार्यकर्ताओं ने यह राशि जुटाने में अपना योगदान दिया था, उन सभी को एक-एक करके वाजपेयी जी को माला पहनाने का अवसर दिया गया। कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार मालाएं पहनाए जाने से जब उनके गले तक मालाएं भर जाती तो वाजपेयी उन्हें उतारकर रख देते। उसके बाद जब उन्होंने जनसभा को सम्बोधित किया तो उन्होंने कहा, 'आज समझ आया कि ईश्वर की मूर्ति पत्थर की इसलिए होती है ताकि वह भक्तों के प्यार के बोझ को सहन कर सके।'

वाजपेयी की हाजिरजवाबी का एक और किस्सा याद आता है, जब उन्होंने जनसंघ पर की गई इंदिरा गांधी की तीखी टिप्पणियों पर उन्हें संसद में अपने जवाबों से घेरा था। उस समय भाजपा का गठन नहीं हुआ था और उसकी जगह 'जनसंघ' ही राजनीति में सक्रिय था। वाजपेयी उन दिनों जनसंघ के ही सांसद थे। 26 फरवरी 1970 को संसद में दिए अपने एक भाषण में इंदिरा ने भारतीयता के मुद्दे पर जनसंघ को घेरते हुए कहा था कि वह जनसंघ जैसी पार्टी से पांच मिनट में ही निपट सकती हैं। इंदिरा की जनसंघ पर की गई वह टिप्पणी वाजपेयी को रत्ती भर भी रास नहीं आई। उन्होंने तुरंत तीखे शब्दों में इसका जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री महोदया कहती हैं कि वह जनसंघ से पांच मिनट में ही निपट सकती हैं लेकिन पांच मिनट में तो आप अपने बाल भी नहीं ठीक कर सकती हैं, फिर भला हमसे कैसे निपटेंगी? भारत की यह महान शख्सियत आज हमारे बीच नहीं है। 93 वर्ष की आयु में 16 अगस्त 2018 को उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन हर भारतवासी के हृदय में वे सदा अमर रहेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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