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आलोक पुराणिक का व्यंग : सब मैगी धरी रह जाएगी

ऊपर लिखित सूक्ति में क्या गजब बात कही गई है। समझ, हे मानव, समझ सब कुछ क्षण-भंगुर है।

आलोक पुराणिक का व्यंग : सब मैगी धरी रह जाएगी
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दर्शन-शास्त्र के एक प्रोफेसर ने अपने लेक्चर को मैगी के परिप्रेक्ष्य में अपडेट किया है-अपनी शोहरत को तू परमानेंट ना समझ। शोहरत मैगी जैसी है, अभी है, अभी नहीं है। मैगी को देख, कुछ दिन टॉप ब्रांड में गिनी जाती थी, और अब..। सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा, सब मैगी पड़ी रह जाएगी, जब लाद चलेगा जांचवाला।
ऊपर लिखित सूक्ति में क्या गजब बात कही गई है। समझ, हे मानव, समझ सब कुछ क्षण-भंगुर है। जब ऊपरवाला बंडल बांधता है, तो बड़ों-बड़ों के आइटम पैक हो जाते हैं। मैगी पड़ी की पड़ी रह गई। मैगी की ओर उचक कर आनेवाले बच्चे मैगी को देखकर मुंह फेर लेते हैं। बच्चों की मां उस मैगी की तरफ देखने तक को तैयार नहीं, जो मैगी उनके लिए आराम-प्रदायक सिद्ध होती थी। मैगी के प्रदि बदले रुख को देखकर सहज मानवीय रिश्तों को समझा जा सकता है।
कोई टीवी चैनल एक टीवी सीरियल पर काम कर रहा है, जिसका शीर्षक है-सौतेली की मैगी। इस सीरियल में एक सौतेली मां और एक मासूम बच्चे की कहानी दिखाई जाएगी। इसमें दिखाया जाएगा कि कैसे बच्चे को सताने के लिए, परेशान करने के लिए सौतेली मां बच्चे को मैगी खिलाने की कोशिश करती है पर होशियार बच्चा अपनी स्मार्टनेस से बार-बार हर बार मैगी से बच निकलता है।
यह सीरियल एक साथ हारर और सोशल केटेगिरी का सीरियल माना जाएगा। एक शायर ने लिखा है-कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो। इस शेर का मैगी-दर्शनशास्त्रीय वर्जन इस प्रकार है-कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये मैगी बैन का वक्त है, जरा मैगी छिपा के चला करो।
जो कंपनी मैगी बनाती थी, वह बहुत ही बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी है।
मैगी ब्रांड बहुत बड़ा ब्रांड रहा है पर अब हाल यह है कि इस ब्रांड की ओर तपाक से लपकने की बात तो दूर है, इस ब्रांड की ओर देखने भर की हिम्मत-इच्छा पुराने मैगी-प्रेमियों में ना बची है।मैगी के पुराने प्रेमी मैगी की तरफ देखने में ऐसे घबरा रहे हैं, जैसे वह पत्नी के साथ जा रहे हों, और पुरानी गर्लफ्रेंड सामने आ गई हो। मैगी पुरानी गर्लफ्रेंड जैसी हो गई है, जो पहले बहुत राहत देती थी, पर नई बदली हुई स्थितियों में उसे देखने तक में डर लगता है।
एक और महत्वपूर्ण सूक्ति है- एड के सब साथी, दुख के ना कोय, हे मानव कोई किसी का नहीं है। यहां ना कोई तेरा भाई है, ना बाप है। जो कल नोट खाकर यह बताता घूमता कि मैगी से अच्छी खाने की चीज कोई नहीं है। वह आज मैगी को देखकर ऐसे मुंह बिचका रहा है, मानो उसे जानता तक नहीं। एड के सब साथी, जब तक एड मिलता है, बड़का-बड़का स्टार लोग उसकी तारीफ करते हैं। माधुरी दीक्षितजी से पूछा जाना चाहिए कि मैगी इत्ती ही बढ़िया चीज है, तो बहना तू अपने बच्चों को रेगुलरली खिलाया कर और दूसरों की मांओं को भी मैगी खाने-खिलाने के लिए प्रेरित किया कर।
अमिताभ कह रहे हैं कि दो साल पहले इश्तिहार किया था मैगी का। मतलब मैगी दो साल पहले बढ़िया थी। अब भी बढ़िया बता देते, अगर अब इश्तिहार कर रहे होते। एड के सब साथी, दुख के ना कोय। ब्रांड चमचमाचकर कल चले, तो सारे स्टार साथी हैं।
जरा कहीं फंस जाए, तो स्टार बताने लगते हैं कि जी पुरानी बात है, बहुत पुरानी बात है। तब नासमझ थे, जी।
समझते नहीं थे। अमिताभ बच्चन दो साल पहले भी उतने ही समझदार रहे होंगे, जितने आज हैं पर मैगी के हाल क्या बदले, अमिताभजी की स्टाइल बदल गई। खैर जी ज्ञान की बात यही है कि सारा धन, सारा वैभव सब कुछ यहीं धरा रह जाएगा। वक्त की नजर टेढ़ी हो जाए, तो मैगी भी यहीं की यहीं धरी रह जानी है।
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