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चिंतन: गहरे भंवर में फंसी आम आदमी पार्टी की साख

सीएम अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से किए वादों को पूरा करने की बजाय ''पंगे की राजनीति'' की राह चुनी।

चिंतन: गहरे भंवर में फंसी आम आदमी पार्टी की साख
नई दिल्ली. आम आदमी पार्टी का तिलिस्म टूट रहा है। जिस तेजी से आम जनमानस में पार्टी का पारा चढ़ा था, उसी तेजी से पार्टी का ग्राफ गिरता जा रहा है। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए अच्छी बात नहीं है। उस दल के लिए तो बिल्कुल नहीं, जो जनाकांक्षा की पूर्ति की उम्मीद के नाम पर बना हो। लेकिन आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल की मनमानी व टकरावपूर्ण कार्यशैली और उनकी टीम के लोगों के लगातार विवादों में फंसने से पार्टी जनता के बीच साख खोती जा रही है।
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सीएम अरविंद केजरीवाल सरकार की 21 संसदीय सचिवों की नियुक्ति को रद किया जाना आम आदमी पार्टी की साख के लिए बड़ा झटका है। आप के 18 नेताओं का विभिन्न आरोपों में फंसना भी पार्टी की साख पर बट्टा ही है। उनकी सरकार के छह में तीन मंत्री को सेक्स स्कैंडल जैसे गंभीर अपराध के आरोपों के चलते पद छोड़ने के लिए मजबूर होना दर्शाता है कि स्वच्छ राजनीति के नाम पर अरविंद केजरीवाल ने जनता के साथ कितना बड़ा धोखा किया है। 'कैसे-कैसे' लोगों को अपनी पार्टी में जगह दी। जबकि ईमानदार छवि के माने जाने वाले आप के फाउंडर रहे योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, मयंक गांधी जैसों के लिए पार्टी के दरवाजे बंद कर दिए।
आप को एक करोड़ चंदा देने वाले शांति भूषण व अण्णा आंदोलन से ही साथ रहे कानूनविद संतोष हेगड़े खुद किनारे हो गए। ताजा-ताजा केजरी के मंत्री संदीप कुमार के सेक्स स्कैंडल के बचाव में उतरे आप नेता आशुतोष ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी व देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के चरित्र पर जिस तरह कीचड़ उछाल कर संदीप की अनैतिक करतूतों को जायज ठहराने की असफल कोशिश की, उससे आम आदमी पार्टी की नैतिक साख भी नष्ट हो गई है।
आशुतोष को केंद्रीय महिला आयोग में सफाई देनी पड़ी है। पंजाब में भी आम आदमी पार्टी को अपने नेता छोटे सिंह को भ्रष्टाचार के आरोप में पार्टी से निकालना पड़ा है। जिस अण्णा आंदोलन के गर्भ से आम आदमी पार्टी क जन्म हुआ, उसी आंदोलन के प्रणेता समाजसेवी अण्णा हजारे का यह कहना कि 'अरविंद केजरीवाल से अब उनकी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं', नेता के रूप में केजरी की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। 26 नवंबर 2012 जब पार्टी बनी थी, तो लोगों को इससे कितनी उम्मीदें थीं। लोग सोचते थे कि आप भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेगी, ईमानदार और चरित्रवान लोगों को राजनीतिक मंच प्रदान करेगी, सुशासन का नया मॉडल लाएगी, राजनीति को लोकराज का चेहरा प्रदान करेगी और उन्हें बिजली-पानी जैसी समस्याओं से निजात दिलाएगी? प्रचंड बहुमत से आप दिल्ली की सत्ता में भी आई, लेकिन सब 'ढाक के पात' साबित हुए।
सीएम अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से किए वादों को पूरा करने की बजाय 'पंगे की राजनीति' की राह चुनी। उपराज्यपाल नजीब जंग से पंगा, दिल्ली पुलिस से पंगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय से टकराव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बेबुनियाद आरोपों की झड़ी। केजरीवाल के इस रूप की उम्मीद दिल्ली की जनता को कतई नहीं रही होगी। लेकिन जनता अब केजरी के गढ़े हुए राजनीति झूठ को समझ रही होगी। अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को समझना चाहिए कि 'पंगे की राजनीति' से किसी पार्टी की साख नहीं बनती है। अभी भी राजनीतिक व नैतिक ईमानदारी के बल ही पार्टी की साख बनी रहती है।
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