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वर्क फ्रॉम होम में बढ़ गईं महिलाओं के लिए प्रॉब्लम्स

कोरोना टाइम में इन दिनों ज्यादातर लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। आगे भी यह कब तक करना होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। महिलाओं के लिए वर्क फ्रॉम होम प्रॉब्लम बन गई है। ऐसा क्यों, यह समझना जरूरी है ताकि इस प्रॉब्लम का सॉल्यूशन निकाला जा सके।

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कोरोना संक्रमण के कारण बहुत सी महिलाएं वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं। लोगों को लगता है कि इस तरह घर बैठे उनके लिए काम करना सुविधाजनक है। लेकिन सच्चाई इससे अलग है। इस संकटकाल में महिलाएं कई तरह के कामों में एकसाथ बिजी हैं। उन्हें घर की सफाई करनी है, खाना बनाना है, बच्चे की ऑनलाइन क्लासेज में भी मदद करनी है। साथ ही अपने दफ्तर की मीटिंग्स में हिस्सा लेना होता है। महिलाएं अकसर घड़ी की तरफ देखती रहती हैं कि अब यह काम करने का समय हो गया है, तब वो काम करना है। उनका वर्क शेड्यूल बहुत टाइट रहता है। इस वजह से वे तनाव में रहती हैं। सर्वे भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

दोहरी जिम्मेदारी का बोझ

इस महामारी में वर्क फ्रॉम होम, घरेलू जिम्मेदारियों, पैरेंटिंग के बोझ से कई महिलाएं टूट गई हैं। लिंक्ड इन वर्कफोर्स कॉन्फिडेंस इंडेक्स से मालूम होता है, जुलाई-सितंबर के बीच लिंक्ड इन ने एक सर्वे किया, जिसके अनुसार भारत में 31 प्रतिशत कामकाजी मांएं फुल-टाइम बच्चों की देखभाल में लगी हुई हैं, जबकि इस में काम-काजी पिताओं का प्रतिशत 17 है। बच्चों की देखभाल करने के लिए 44 प्रतिशत से अधिक काम-काजी मांएं अपने ऑफिस की समयावधि से ज्यादा काम कर रही हैं। यह आंकड़ा पुरुषों (25 प्रतिशत) की तुलना में लगभग दो गुना है। घर में बच्चों के कारण लगभग 42 प्रतिशत काम-काजी मांएं अपने ऑफिस वर्क पर फोकस नहीं कर पातीं, 46 प्रतिशत को अपना ऑफिस वर्क पूरा करने के लिए देर रात तक काम करना पड़ता है।

वर्क प्रोडक्टिविटी कम हुई

वर्क फ्रॉम होम ने ऑफिस और घर के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया है। लेकिन इससे जहां फायदा हुआ है, नुकसान भी हुआ है। कुछ महिलाओं के लिए नए अवसर खुले हैं, अब वे लचीली कार्य-अवधि का फायदा उठा रही हैं। लेकिन इससे उनकी वर्क प्रोडक्टिविटी में कमी आई है, कुछ महिलाओं को तो अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। हर महिला जॉब खोने का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है। मसलन, डे-केयर विकल्पों की कमी के कारण कर्नाटक में गारमेंट वर्कर्स को नौकरी या अपने बच्चों की देखभाल के बीच में चयन करने की मजबूरी है।

मेंटल स्ट्रेस बढ़ा है

ऐसा नहीं है कि महामारी से पहले महिलाएं मल्टीटास्क यानी कई काम एक साथ नहीं किया करती थीं। लेकिन अब कुकिंग करते हुए या बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज पर नजर रखते हुए, ऑफिस की ई-मेल्स का भी जवाब देना पड़ता है। इससे शारीरिक थकान से अधिक मानसिक तनाव होता है, क्योंकि एक साथ कई चीजों के बारे में सोचना पड़ता है। साल 2018 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत की शहरी महिलाएं रोजाना 312 मिनट बिना वेतन वाले केयर वर्क में बिजी रहती हैं। जबकि पुरुष सिर्फ 29 मिनट ऐसा करते हैं। हालांकि अध्ययनों में यह जरूर कहा गया कि लॉकडाउन के शुरू में पुरुषों ने घरेलू कामों में अधिक सहयोग दिया, बाद का डाटा अभी सामने नहीं आया है। लेकिन लगता नहीं है कि यह परमानेंट चेंज है।

समाधान है संभव

महिलाएं वर्क फ्रॉम होम आसानी से कर सकती हैं, बच्चों की देखभाल और घर को भी संभाल सकती हैं, अगर जीवनसाथी का सपोर्ट मिले, साथ ही बच्चे भी सपोर्ट करें। इससे सारा काम महिला के जिम्मे नहीं आएगा। वे भी रिलैक्स रह पाएंगी और जो काम उन्हें करने हैं, अच्छे से कर पाएंगी।

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