logo
Breaking

टच मोबाइल और लैपटॉप के ज्यादा इस्तेमाल से सुन्न पड़ सकता है हाथ, हो सकती है ये गंभीर बीमारी

इन दिनों हम इतने ज्यादा टेक्नोसेवी हो गए हैं कि बगैर मोबाइल के जरा देर भी नहीं रह पाते हैं। लगातार या लंबे समय तक मोबाइल और लैपटॉप पर अंगुलियों को एक्टिव रखने से रिस्ट और फिंगर्स में बोन या मसल्स संबंधी प्रॉब्लम्स होने लगती है।

टच मोबाइल और लैपटॉप के ज्यादा इस्तेमाल से सुन्न पड़ सकता है हाथ, हो सकती है ये गंभीर बीमारी

इन दिनों हम इतने ज्यादा टेक्नोसेवी हो गए हैं कि बगैर मोबाइल के जरा देर भी नहीं रह पाते हैं। लगातार या लंबे समय तक मोबाइल और लैपटॉप पर अंगुलियों को एक्टिव रखने से रिस्ट और फिंगर्स में बोन या मसल्स संबंधी प्रॉब्लम्स होने लगती है। ऐसे में बगैर देर किए डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए, ताकि यह प्रॉब्लम सीरियस न होने पाए।

इससे जुड़ी तमाम समस्याओं के बारे में इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली के सीनियर आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. राजू वैश्य पूरी जानकारी दे रहे हैं। आज के दौर में युवाओं में फेसबुक और वाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्किंग माध्यमों की लत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इनके बहुत अधिक उपयोग से कलाई और अंगुलियों की जोड़ों में दर्द, आर्थराइटिस, रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्युरीज (आरएसआई) तथा कार्पल टनल सिंड्रोम (सीटीसी) की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्युरीज

पिछले कुछ वर्षों में टच स्क्रीन वाले फोन, स्मार्टफोन और टैबलेट के लगातार इस्तेमाल के कारण वैसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जिन्हें अंगुलियों, अंगूठे और हाथों में दर्द की समस्या उत्पन्न हो रही है। इस तरह का दर्द और जकड़न रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्युरीज (आरएसआई) पैदा कर सकती है। आरएसआई एक ही गतिविधि के लंबे समय तक बार-बार दोहराए जाने के कारण जोड़ों के लिगामेंट और टेंडन में सूजन (इंफ्लामेशन) होने के कारण होती है।

यह भी पढ़ें: ब्लड ग्रुप से जुड़ा है आपकी सेहत का राज, अपने ब्लड ग्रुप के हिसाब से लें डायट

क्यों होता है ऐसा

जो लोग टच स्क्रीन स्मार्टफोन और टैबलेट पर बहुत ज्यादा गेम खेलते हैं और टाइप करते हैं, उनकी कलाई और अंगुलियों के जोड़ों में दर्द हो सकता है और कभी-कभी अंगुलियों में गंभीर आर्थराइटिस हो सकती है। गेम खेलने वाले डिवाइस के लंबे समय तक इस्तेमाल के कारण युवाओं और बच्चों में इस समस्या के होने की अधिक संभावना होती है।

किसी भी गतिविधि के बार-बार दोहराए जाने के कारण जोड़, मांसपेशियां, टेंडन और नर्व्स प्रभावित होते हैं, जिसके कारण रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्युरीज होती है। उदाहरण के लिए, जो लोग सेल फोन पर अकसर संदेश टाइप करने के लिए अपने अंगूठे का उपयोग करते हैं, उनमें कभी-कभी रेडियल स्टिलॉयड टेनोसिनोवाइटिस (डी क्वेरवेन सिंड्रोम, ब्लैकबेरी थंब या टेक्सटिंग थंब के नाम से भी जाना जाने वाला) विकसित हो जाता है।

इसमें टेंडन प्रभावित होती है और अंगूठे को हिलाने–डुलाने में दर्द होता है। हालांकि डेस्कटॉप की-बोर्ड के लंबे समय तक इस्तेमाल के कारण दर्द से पीड़ित रोगियों में इसके संबंध की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि डेस्कटॉप की-बोर्ड पर बार-बार टाइप करने पर यह दर्द और बढ़ सकता है।

कार्पल टनल सिंड्रोम

ज्यादातर लोग टच स्क्रीन का इस्तेमाल गलत तरीके से और गलत पोस्चर में करते हैं। स्ट्रेस से संबंधित इंज्युरीज लोगों को तब भी हो सकती है, जब वे टाइप करते समय अपनी कलाई पर अधिक दबाव डालते हैं या अपने हाथों को बहुत ज्यादा आगे या पीछे की ओर झुकाते हैं, जिससे उनके हाथों पर स्ट्रेस पड़ता है। इसके कारण होने वाली बीमारियों में कार्पल टनेल सिंड्रोम सबसे सामान्य है। यह कलाई में मीडियन नर्व पर दबाव पड़ने के कारण होता है।

इन्हें भी हो सकती है ये बीमारी

इस बीमारी का खतरा मोबाइल और कंप्यूटर का बहुत अधिक इस्तेमाल करने वालों के अलावा उन सभी लोगों को अधिक होता है, जिन्हें अपनी अंगुलियों और हाथों का बहुत अधिक इस्तेमाल करना पड़ता है। मिसाल के तौर पर टाइपिस्टों और मोटर मैकेनिकों को यह बीमारी होने की आशंका अधिक होती है। मधुमेह, गाउट, गठिया के मरीजों तथा शराब का बहुत अधिक सेवन करने वालों को भी कार्पल टनल सिंड्रोम का खतरा अधिक होता है। इसके अलावा गर्भधारण, रजोनिवृति और गर्भनिरोधक गोलियों के सेवन से होने वाले हार्मोन संबंधी परिवर्तन के दौरान भी यह बीमारी हो सकती है।

इस बीमारी के अन्य कारण

यह बीमारी आनुवांशिक कारणों से भी हो सकती है। कुछ लोगों में आनुवांशिक तौर पर कलाई एवं अंगुलियों की नसों (फ्लेक्सर टेंडन) की प्राकृतिक चिकनाई कम होती है। प्राकृतिक चिकनाई कम होने पर सीटीएस होने की आशंका अधिक होती है।

यह भी पढ़ें: काजोल से लेकर शिल्पा तक, बॉलीवुड की ये 5 एक्ट्रेसेस झेल चुकी हैं मिसकैरेज का दर्द

इसके अलावा कुछ लोगों की कलाई और अंगुलियों में हड्डियों एवं नसों की बनावट इस प्रकार की होती है कि उन्हें यह बीमारी अन्य लोगों की तुलना में अधिक होती है। कलाई या हाथ के अगले हिस्से में चोट लगने से भी सीटीएस हो सकती है।

बीमारी के प्रमुख लक्षण

हाथों में सुन्नपन्न, सनसनाहट या झुनझुनी, छोटी-मोटी चीजों को पकड़ने में कमजोरी, हाथ को कंधे तक उठाने में दर्द और अंगूठे, तर्जनी एवं मध्यमा में संवदेना की कमी जैसे लक्षण कार्पल टनल सिंड्रोम (सीटीसी) के प्रमुख लक्षण हैं।

बीमारी की अन्य जानकारी

कार्पल टनल कलाई में हड्डियों और सख्त लिगामेंट से घिरी अत्यंत पतली सुरंग जैसी संरचना है, जो कलाई एवं अंगुलियों की विभिन्न हड्डियों को आपस में जोड़ती है। कार्पल टनल कलाई के जरिए प्रवेश करते हुए अंगुलियों में जाता है।

इस सुरंग (टनल) से अंगुलियों और अंगूठे की नसें (फ्लेक्सर टेंडन) और मध्यस्थ स्नायु (मेडियन नर्व) गुजरते हैं। ये नसें मांसपेशियों और हाथ की हड्डियों को जोड़ती हैं और अंगुलियों की क्रियाशीलता का संचालन करती हैं।

हमारा मस्तिष्क मध्यस्थ स्नायु (मेडियन नर्व) के जरिए ही हाथों एवं अंगुलियों तक संदेश पहुंचा कर उनकी क्रियाशीलता पर नियंत्रण रखता है। हाथ एवं अंगुलियों के हिलाने पर नसें (फ्लेक्सर टेंडन) टनल के किनारों से रगड़ खाती हैं।

इन अंगुलियों की नसों के टनल से बार-बार रगड़ खाने के कारण नसों में सूजन उत्पन्न होती है। सूजन के कारण मध्यस्थ स्नायु (मेडियन नर्व) पर दबाव पड़ता है और इससे अंगुलियों एवं हाथों में सुन्नपन, कमजोरी एवं झुनझुनी पैदा होती है और गंभीर अवस्था में इनमें भयानक दर्द होता है।

कैसे करें बचाव

  • अगर अंगुलियों को काम के दौरान बीच-बीच में विश्राम मिलता रहे तो सूजन एवं दबाव को कम होने में मदद मिलती है।
  • अपने काम-काज के तौर-तरीकों में बदलाव लाकर इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती है।
  • अगर इस बीमारी का समय से पता चल जाए तो इसका इलाज आसान हो जाता है।
  • रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्युरीज (आरएसआई) और कार्पल टनल सिंड्रोम की जांच नर्व कंडक्शन परीक्षण से होती है।
  • रोग की आरंभिक अवस्था में इसका इलाज रात में कलाई में पट्टी या स्पिंट पहनने से हो सकता है।
  • इससे कलाई को मुड़ने से रोका जाता है।
  • कलाई को विश्राम देने और दवाइयों से भी आराम मिलता है।
  • गंभीर अवस्था में चिकित्सक कार्पल टनल में कोर्टिसोन के इंजेक्शन दे सकते हैं।
  • जिन मरीजों को उक्त तरीकों से लाभ नहीं मिलता, उन्हें सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।
  • आधुनिक समय में सर्जरी की ऐसी तकनीकों का विकास हुआ है, जिसमें चीर-फाड़ की जरूरत नहीं के बराबर होती है।
Share it
Top