अपमान पर रार, सबूत मांगे सरकार: माघ मेले में शंकराचार्य पर घमासान, विवाद के लिए जिम्मेदार कौन? जानिए सच
प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के टकराव पर बवाल। अपमान, प्रोटोकॉल और पहचान पर उठे सवाल। पूरी चर्चा देखें।
उत्तर प्रदेश, जहां स्वयं एक संत मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत हैं, वहां संतों के सम्मान और परंपराओं को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच हुआ टकराव अब धार्मिक मर्यादा, प्रशासनिक प्रोटोकॉल और कानूनी पहचान की बहस में बदल चुका है।
यह पूरा मामला अब सिर्फ एक स्नान व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संतों के सम्मान और अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
परंपरा बनाम प्रोटोकॉल: संगम पर क्यों हुआ विवाद?
मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य को परंपरा अनुसार पालकी में बैठकर संगम के अंतिम छोर तक जाकर स्नान करना था।
लेकिन प्रशासन ने अत्यधिक भीड़ का हवाला देते हुए उन्हें बीच रास्ते में ही रोक दिया और पैदल स्नान के लिए जाने को कहा।
शंकराचार्य ने इसे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा का उल्लंघन बताते हुए पैदल जाने से इनकार कर दिया। यहीं से विवाद ने तूल पकड़ लिया।
पुलिस कार्रवाई पर सवाल: क्या संतों के साथ हुआ दुर्व्यवहार?
तनाव बढ़ने के बाद पुलिस ने सख्ती दिखाई। आरोप है कि शंकराचार्य के शिष्यों को जबरन घसीटकर पुलिस चौकी ले जाया गया। स्वयं शंकराचार्य को बिना स्नान किए वापस लौटने को मजबूर किया गया।
इस घटनाक्रम से संत समाज में रोष फैल गया। शंकराचार्य ने इसे अपमानजनक व्यवहार बताते हुए प्रशासन से माफी और परंपरा अनुसार स्नान की मांग रखी है।
पहचान का संकट: ‘शंकराचार्य’ होने पर ही उठे सवाल
माफी मांगने के बजाय प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस जारी कर दिया।
नोटिस में सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए उनसे पूछा गया है कि—
पट्टाभिषेक पर रोक के बावजूद वे ‘शंकराचार्य’ पदवी का उपयोग क्यों कर रहे हैं?
यानी अब यह विवाद धार्मिक सम्मान से निकलकर कानूनी वैधता की लड़ाई बन गया है।
भाजपा पर अपने तीखे बयानों के लिए चर्चित स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के लिए यह मामला और भी संवेदनशील हो गया है।
"चर्चा" के अहम सवाल-
- क्या यह प्रशासनिक मजबूरी थी या परंपरा का अपमान?
- क्या संतों के सम्मान से बड़ा कोई प्रोटोकॉल हो सकता है?
- क्या शंकराचार्य की पहचान पर सवाल उठाना उचित है?
इसी गंभीर मुद्दे पर हरिभूमि और INH के प्रधान संपादक डॉ हिमांशु द्विवेदी ने विशेष कार्यक्रम “चर्चा” का आयोजन किया।
इस चर्चा में शामिल रहे-
- आशीष तिवारी- बीजेपी प्रवक्ता
- विनय सिंह- सपा प्रवक्ता
- स्वामी अनिलानंद महाराज- महामंडलेश्वर, कार्यकारी अध्यक्ष अखिल भारतीय संत समाज
तीनों पक्षों ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी-अपनी राय रखी और प्रशासन, सरकार व संत समाज की भूमिका पर सवाल उठाए।