सुलझा 'धर्म-सत्ता' का विवाद: शंकराचार्य के आगे झुका प्रयागराज प्रशासन! किन दो शर्तों पर हुआ सुलह? 1 फरवरी को राजकीय सम्मान के साथ करेंगे संगम स्नान
1 फरवरी को माघी पूर्णिमा पर शंकराचार्य को पूरे राजकीय सम्मान के साथ संगम स्नान कराया जाएगा। लखनऊ के वरिष्ठ अधिकारी इस सुलह की निगरानी कर रहे हैं, जिससे 12 दिनों से जारी विवाद थम गया है।
प्रयागराज प्रशासन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की दो शर्तों को मानते हुए लिखित माफी मांगने को तैयार हो गया है।
प्रयागराज : ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेला प्रशासन के बीच चल रही तनातनी अब खत्म होने वाली है। 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर हुए अपमान के बाद शंकराचार्य ने प्रयागराज छोड़ दिया था, लेकिन अब प्रशासन ने अपनी गलती स्वीकार करने का मन बना लिया है।
शासन के शीर्ष अधिकारियों के निर्देश पर प्रयागराज के अफसर शंकराचार्य से माफी मांगने को तैयार हैं। शंकराचार्य ने भी नरमी दिखाते हुए प्रशासन के सामने दो शर्तें रखी हैं, जिन्हें स्वीकार कर लिया गया है।
यदि सब कुछ तय योजना के अनुसार रहा, तो 1 फरवरी को माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर शंकराचार्य भव्य रूप से संगम में स्नान करेंगे।
प्रशासन की माफी और शासन का हस्तक्षेप
विवाद उस समय और गहरा गया था जब मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस जारी कर उनके पद पर सवाल उठा दिए थे। इसके बाद देशभर के संत समाज में भारी रोष व्याप्त हो गया।
रिपब्लिक भारत की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश शासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रयागराज प्रशासन को फटकार लगाई और तत्काल विवाद सुलझाने का आदेश दिया।
अब लखनऊ से आए दो वरिष्ठ अधिकारी इस पूरी प्रक्रिया की मध्यस्थता कर रहे हैं। प्रशासन न केवल अपनी गलती मानेगा, बल्कि लिखित में खेद प्रकट करने की तैयारी में भी है।
शंकराचार्य की पहली शर्त: लिखित माफी और नोटिस की वापसी
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अपनी पहली शर्त के रूप में यह मांग रखी है कि प्रशासन ने जो आपत्तिजनक नोटिस जारी किए थे, उन्हें वापस लिया जाए।
साथ ही, जिम्मेदार अधिकारियों को लिखित में माफी मांगनी होगी कि उन्होंने सनातन धर्म की परंपराओं और शंकराचार्य पद की गरिमा का अनादर किया है।
स्वामी जी का कहना है कि यह उनकी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, बल्कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पीठों के सम्मान की रक्षा का सवाल है।
दूसरी शर्त: राजकीय सम्मान और प्रोटोकॉल के साथ स्नान
शंकराचार्य की दूसरी शर्त यह है कि 1 फरवरी को होने वाले माघी पूर्णिमा स्नान के दौरान उन्हें वही सम्मान और प्रोटोकॉल दिया जाए, जो एक शंकराचार्य के लिए शास्त्र सम्मत है।
इसमें संगम तट तक पालकी ले जाने की अनुमति, विशेष सुरक्षा घेरा और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्नान की व्यवस्था शामिल है।
प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि इस बार कोई अवरोध नहीं आएगा और उन्हें राजकीय अतिथि जैसा सम्मान प्रदान किया जाएगा।
मौनी अमावस्या से शुरू हुआ अपमान का घटनाक्रम
इस पूरे विवाद की जड़ 18 जनवरी की घटना है, जब प्रशासन ने 'नो व्हीकल जोन' और सुरक्षा कारणों का हवाला देकर शंकराचार्य की पालकी को संगम जाने से रोक दिया था।
शंकराचार्य का आरोप था कि उनके शिष्यों और बटुकों के साथ पुलिस ने अभद्रता की। इस अपमान से आहत होकर उन्होंने 11 दिनों तक भीषण ठंड में अन्न त्याग कर धरना दिया था और अंततः 28 जनवरी को यह कहते हुए वाराणसी लौट गए थे कि "प्रयागराज में संतों का सम्मान नहीं रह गया है।"
वाराणसी से ससम्मान वापसी की तैयारी
वर्तमान में शंकराचार्य वाराणसी में हैं। खबर है कि 31 जनवरी की शाम या 1 फरवरी की सुबह लखनऊ के दो बड़े अधिकारी और प्रयागराज प्रशासन के प्रतिनिधि वाराणसी पहुंचकर उन्हें ससम्मान वापस लाएंगे।
माघी पूर्णिमा पर होने वाला यह स्नान एक 'प्रायश्चित स्नान' और 'विजय स्नान' के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ प्रशासन खुद अपनी गलतियों को सुधारने के लिए उनके साथ मौजूद रहेगा।