नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने छोड़ा कांग्रेस का 'हाथ': चुनाव की दहलीज पर खड़े उत्तर प्रदेश में बढ़ा सियासी पारा! अब किस ओर मुड़ेगी उनकी सियासत?
बसपा के पूर्व दिग्गज रहे सिद्दीकी के जाने से कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक समीकरणों पर असर पड़ सकता है और प्रदेश की सियासत में नए कयास शुरू हो गए हैं।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के जाने के बाद प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब डैमेज कंट्रोल की चुनौती है।
लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी हलचल के बीच कांग्रेस को एक बड़ा झटका लगा है। बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता रहे और पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
विधानसभा चुनावों के ठीक पहले उनके इस फैसले ने प्रदेश की सियासत में खलबली मचा दी है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी न केवल बसपा सरकार में ताकतवर मंत्री रहे थे, बल्कि उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मुस्लिम मतदाताओं के बीच एक बड़े चेहरे के रूप में देखा जाता था।
उनके जाने से कांग्रेस के चुनावी समीकरणों पर गहरा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
चुनावी मोड में कांग्रेस को लगा जोरदार झटका
कांग्रेस पार्टी इन दिनों उत्तर प्रदेश में 'मिशन-2027' और आगामी चुनावों की तैयारियों में जुटी है। ऐसे महत्वपूर्ण समय में सिद्दीकी जैसे अनुभवी नेता का साथ छोड़ना पार्टी के लिए किसी झटके से कम नहीं है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने 2018 में बसपा से निकाले जाने के बाद कांग्रेस का दामन थामा था। पार्टी को उम्मीद थी कि उनके अनुभव से संगठन को मजबूती मिलेगी, लेकिन अब उनके इस्तीफे ने कांग्रेस के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
इस्तीफे की वजह और सिद्दीकी का राजनीतिक कद
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर काफी प्रभावशाली रहा है। वे मायावती सरकार में लोक निर्माण, आबकारी और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रह चुके हैं।
सिद्दीकी के इस्तीफे के पीछे पार्टी के भीतर उपेक्षा या किसी अन्य बड़े राजनीतिक कदम की चर्चाएं तेज हैं। हालांकि उन्होंने अभी तक अपने भविष्य के पत्तों को पूरी तरह से नहीं खोला है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उनके अगले कदम को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
मुस्लिम वोट बैंक पर पड़ेगा सीधा असर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध क्षेत्र की कई सीटों पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी का व्यक्तिगत प्रभाव माना जाता है। मुस्लिम समाज के बीच उनकी पकड़ कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो रही थी।
अब उनके पार्टी छोड़ने से कांग्रेस के उस 'मुस्लिम-दलित' गठजोड़ की कोशिशों को धक्का लग सकता है, जिसके दम पर वह सत्ता में वापसी का सपना देख रही थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्दीकी का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक बड़े वोट आधार का खिसकना भी हो सकता है।
विपक्ष के लिए खुला नया विकल्प
सिद्दीकी के इस्तीफे के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि वे किस पार्टी का रुख करेंगे? क्या वे वापस बहुजन समाज पार्टी में जाएंगे या समाजवादी पार्टी के साथ अपनी नई पारी शुरू करेंगे? उत्तर प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक माहौल में हर बड़ा दल मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहा है।
ऐसे में नसीमुद्दीन सिद्दीकी जिस भी खेमे में जाएंगे, वहां के समीकरण काफी हद तक मजबूत हो सकते हैं।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने नई चुनौतियां
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के जाने के बाद प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब डैमेज कंट्रोल की चुनौती है। पार्टी को अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी ऐसे मजबूत विकल्प की तलाश करनी होगी जो सिद्दीकी की कमी को पूरा कर सके।
विधानसभा चुनावों की दहलीज पर खड़े प्रदेश में नेताओं का इस तरह पार्टी छोड़ना कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर डाल सकता है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस आलाकमान इस स्थिति से कैसे निपटता है।