कर्ज से परेशान युवक ने की आत्महत्या: सुसाइड नोट में चार सूदखोरों का जिक्र, 50 दिन बाद भी नहीं हुई गिरफ्तारी
राजनांदगांव में एक युवक ने कर्ज के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में चार सर्राफा व्यापारियों का जिक्र है। लेकिन 50 दिन बाद भी किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
एसपी ऑफिस, राजनांदगांव
अक्षय साहू- राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में 19 नवंबर को हुई एक दर्दनाक आत्महत्या की घटना ने पुलिस विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतक के परिजनों का आरोप है कि संबलपुर (सिंघोला) निवासी 49 वर्षीय रामखिलावन साहू ने ऊंचे ब्याज की वसूली, धमकियों और मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर धान खरीदी केंद्र के पास एक पेड़ पर फांसी लगा ली।
किसान व्यापारी की आत्महत्या को आज 50 दिन बीत जाने के बाद भी इस मामले में एफआईआर हो जाने के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। सवाल उठता है कि क्या एक स्पष्ट सुसाइड नोट, जिसमें आरोपियों के नाम साफ-साफ लिखे हैं, की प्रमाणिकता साबित करने में इतना समय लगना चाहिए? क्या आम मामलों में पुलिस इतनी ही सतर्कता बरतती है, या सिर्फ प्रभावशाली लोगों के नाम आने पर जांच को लटकाया जा रहा है?
चार सर्राफा व्यापारियों का सुसाइड नोट में उल्लेख
मृतक रामखिलावन साहू के शव के पास से बरामद सुसाइड नोट में स्पष्ट रूप से शहर के प्रमुख सर्राफा व्यापारी राजेंद्र गोलछा (आर.के. ज्वेलर्स के मालिक), आढ़तिया उमेश पालीवाल, रमेश पालीवाल और शिव कुमार के नाम का उल्लेख है। मृतक ने इन पर गंभीर आरोप लगाए थे कि इन्होंने ऊंचे ब्याज पर कर्ज देकर उन्हें मानसिक और सार्वजनिक रूप से अपमानित किया, जिससे उनकी जिंदगी नर्क बन गई। घटना के बाद पुलिस ने केवल मर्ग दर्ज किया और करीब दो सप्ताह तक एफआईआर दर्ज करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।
अब तक नहीं हुई है आरोपियों की गिरफ्तारी
परिजनों और स्थानीय लोगों के अनुसार, शुरुआती दिनों में पुलिस ने कोई सक्रियता नहीं दिखाई। अखबारों में खबरें छपने, टीवी चैनलों पर स्टोरी चलने और सोशल मीडिया पर जनआक्रोश भड़कने के बाद आनन-फानन में नामजद आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया। लेकिन आज, 7 जनवरी तक, यानी घटना को पूरे 50 दिन बीत जाने के बाद भी एक भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। सूदखोर और प्रभावशाली व्यापारी खुलेआम अपनी दुकानों पर बैठे सोना-चांदी बेच रहे हैं, जबकि मृतक के परिजन न्याय की आस में भटक रहे हैं।
एसपी ने दिया हैरान करने वाला बयान
इस मामले में पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा का बयान और भी हैरान करने वाला है। एसपी शर्मा ने कहा है कि सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग जांच के लिए एक्सपर्ट्स के पास भेजा गया है और रिपोर्ट आने के बाद ही गिरफ्तारी की जाएगी। सवाल उठता है कि क्या एक स्पष्ट सुसाइड नोट, जिसमें आरोपियों के नाम साफ-साफ लिखे हैं, की प्रमाणिकता साबित करने में इतना समय लगना चाहिए? क्या आम मामलों में पुलिस इतनी ही सतर्कता बरतती है, या सिर्फ प्रभावशाली लोगों के नाम आने पर जांच को लटकाया जा रहा है?
रसूखदारी होने की वजह से गिरफ्तारी नहीं करने का आरोप
परिजनों का सीधा आरोप है कि रसूखदार होने के कारण पुलिस हिचकिचाहट दिखा रही है। अगर मामला किसी साधारण व्यक्ति के खिलाफ होता, तो गिरफ्तारी तुरंत हो जाती। पुलिस की इस नाकामी से स्थानीय लोग और परिजन बेहद नाराज हैं। शहर में चर्चा का बाजार गर्म है कि कहीं पैसे और रसूख के बल पर अपराधी बच तो नहीं जाएंगे? शुरुआती जांच में पुलिस की सुस्ती साफ नजर आई – मर्ग दर्ज करने के बाद दो हफ्ते तक एफआईआर नहीं, फिर मीडिया दबाव में केस दर्ज, और अब गिरफ्तारी के नाम पर बहाने।
सवालों के घेरे में पुलिस की भूमिका
पुलिस का कहना है कि वे "निष्पक्ष जांच" कर रहे हैं, लेकिन जनता पूछ रही है कि निष्पक्षता के नाम पर न्याय में देरी क्यों? क्या सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग टेस्ट इतना जटिल है कि 50 दिन में रिपोर्ट नहीं आ सकती? या यह सिर्फ समय गंवाने का बहाना है? यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि पूरे जिले में पुलिस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है। अगर प्रभावशाली लोग कानून से ऊपर हैं, तो आम आदमी को न्याय की उम्मीद कैसे रहेगी? परिजनों ने चेतावनी दी है कि अगर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो बड़ा आंदोलन होगा।
पुलिस विभाग की हो रही किरकिरी
पुलिस विभाग की यह किरकिरी छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था की पोल खोल रही है। जहां आम मामलों में त्वरित एक्शन होता है। वहीं रसूखदारों के खिलाफ जांच सालों लटक जाती है। उम्मीद है कि एसपी अंकिता शर्मा जल्द कोई ठोस कदम उठाएंगी, वरना जनआक्रोश और बढ़ेगा, और पुलिस की निष्ठा पर सवाल गहराते जाएंगे।