अंकोरवाट से भी भव्य होगा बिहार का यह धाम: 210 टन और 33 फीट उंचे विश्व के सबसे बड़े 'सहस्त्रलिंगम' की मोतिहारी में स्थापना
33 फीट ऊंचे इस 'सहस्त्रलिंगम' को तमिलनाडु से 2100 किमी दूर लाया गया। हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा और 21 नदियों के जल से अभिषेक के बीच यह विराट रामायण मंदिर का हिस्सा बना, जो अंकोरवाट से भी ऊंचा होगा।
मोतिहारी : बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के कल्याणपुर में शनिवार को एक नया आध्यात्मिक इतिहास रचा गया। यहा निर्माणाधीन 'विराट रामायण मंदिर' के मुख्य गर्भगृह में विश्व के सबसे विशाल और भारी शिवलिंग की स्थापना का कार्य वैदिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न हुआ।
दक्षिण भारत से आए प्रकांड विद्वानों के मंत्रोच्चार के बीच जब 210 टन वजनी इस महाकाय शिवलिंग को उसके आधार पर विराजमान किया गया, तब पूरा इलाका 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गूंज उठा।
इस ऐतिहासिक क्षण को और भी भव्य बनाने के लिए प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट की ओर से हेलिकॉप्टर द्वारा फूलों की बारिश कराई गई, जिसने उपस्थित हज़ारों श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
महाकाय संरचना और सहस्त्रलिंगम की अदभुत कलाकृति
मोतिहारी में स्थापित यह शिवलिंग अपनी विशालता और कलात्मकता के मामले में दुनिया में अद्वितीय है। इसे तमिलनाडु के महाबलीपुरम में सहस्रों साल पुराने एक ही विशाल 'ब्लैक ग्रेनाइट' पत्थर को तराश कर बनाया गया है।
इस शिवलिंग की कुल ऊंचाई 33 फीट है और इसकी मोटाई यानी परिधि भी 33 फीट ही रखी गई है। इस शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सतह पर उकेरे गए 1008 छोटे-छोटे शिवलिंग हैं, जिसके कारण इसे 'सहस्त्रलिंगम' के नाम से भी जाना जाता है।
मान्यता है कि सहस्त्रलिंगम के दर्शन मात्र से ही एक साथ एक हजार आठ शिवलिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है।
2100 किलोमीटर की दुर्गम यात्रा और इंजीनियरिंग का चमत्कार
इस विशालकाय शिवलिंग को तमिलनाडु के पत्थरों के शहर महाबलीपुरम से बिहार के मोतिहारी तक लाना आधुनिक इंजीनियरिंग की एक बड़ी परीक्षा थी।
करीब 2100 किलोमीटर की इस लंबी यात्रा को तय करने के लिए 96 पहियों वाले एक विशेष हाइड्रोलिक ट्रेलर का निर्माण कराया गया था।
रास्ते में पड़ने वाले दर्जनों पुलों की भार क्षमता का पहले तकनीकी परीक्षण किया गया और कई जगहों पर सड़क के ऊपर से गुजरने वाले बिजली के तारों को अस्थायी रूप से हटाना पड़ा।
गंडक नदी के पुल और संकरी गलियों से इस 210 टन के वजनी पत्थर को सुरक्षित निकालना किसी चुनौती से कम नहीं था, जिसे कुशल इंजीनियरों की देखरेख में सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
21 पवित्र नदियों के जल से महाभिषेक और दक्षिण भारतीय परंपरा
स्थापना समारोह को पूरी तरह से शास्त्रोक्त और पारंपरिक विधि से संपन्न करने के लिए व्यापक इंतजाम किए गए थे। इस महाभिषेक के लिए देश की 21 प्रमुख नदियों का जल कलशों में भरकर लाया गया था।
इसमें गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, शिप्रा और कावेरी जैसी पवित्र नदियों के साथ-साथ मानसरोवर का जल भी शामिल था। दक्षिण भारत से आए 50 से अधिक वैदिक पंडितों ने 'पीठ पूजा' और 'हवन' संपन्न कराया।
आचार्य किशोर कुणाल की देखरेख में हुए इस अनुष्ठान में यजमानों ने पवित्र नदियों के जल और पंचामृत से महादेव का अभिषेक किया, जिसके बाद शिवलिंग को गर्भगृह के केंद्र में स्थापित किया गया।
कंबोडिया के अंकोरवाट से भी भव्य और ऊंचा होगा मंदिर का स्वरूप
यह विशाल शिवलिंग जिस 'विराट रामायण मंदिर' का हिस्सा है, वह आने वाले समय में दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर होगा। इसकी ऊंचाई कंबोडिया के विश्व प्रसिद्ध 'अंकोरवाट' मंदिर 215 फीट से भी अधिक यानी 270 फीट रखी गई है।
करीब 125 एकड़ में फैले इस मंदिर परिसर में कुल 22 अलग-अलग मंदिर होंगे और इसका मुख्य शिखर सोने जैसा चमकता हुआ नजर आएगा।
मंदिर की लंबाई 1080 फीट और चौड़ाई 540 फीट है, जो इसे क्षेत्रफल के हिसाब से भी विशालतम बनाता है। मंदिर का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि यहा एक साथ 20 हजार से अधिक लोग दर्शन कर सकेंगे।
मुस्लिम समाज का भूमि दान और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
इस मंदिर और शिवलिंग की स्थापना की कहानी भारतीय एकता और भाईचारे की भी एक मिसाल पेश करती है। मंदिर निर्माण के लिए आवश्यक जमीन का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय मुस्लिम परिवारों ने स्वेच्छा से दान दिया है।
लगभग 2.5 करोड़ रुपये की कीमत वाली यह भूमि इस महान कार्य के लिए बिना किसी संकोच के मंदिर ट्रस्ट को सौंपी गई थी। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह मंदिर न केवल हिंदुओं की आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि इस क्षेत्र के सामाजिक ताने-बने को और भी मजबूत करेगा।
मुख्यमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने इस कदम की सराहना करते हुए इसे 'गंगा-जमुनी तहजीब' का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है।
मंदिर की नींव में छिपी विशेष तकनीकी और सुरक्षा के इंतजाम
इतने भारी शिवलिंग और 270 फीट ऊंचे मंदिर का भार सहने के लिए इसकी नींव को बेहद खास तरीके से बनाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर की नींव में करीब 150 फीट नीचे तक पाइलिंग की गई है और इसमें कंक्रीट के साथ-साथ विशेष ग्रेड के स्टील का इस्तेमाल हुआ है।
यह संरचना भूकंप रोधी है और इसे अगले 2500 वर्षों की मजबूती को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।
शिवलिंग के नीचे जो अर्घा बनाई गई है, उसे भी 140 टन के वजन के साथ इस तरह संतुलित किया गया है कि जल प्रवाह के दौरान भी स्थिरता बनी रहे।
रामायण सर्किट और बिहार पर्यटन के लिए 'गेम चेंजर'
मोतिहारी में इस शिवलिंग की स्थापना के बाद यह इलाका पर्यटन के मानचित्र पर एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरेगा। सरकार की योजना इसे 'रामायण सर्किट' से जोड़ने की है, जिससे अयोध्या और जनकपुर के बीच आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक अनिवार्य पड़ाव बन जाएगा।
इससे स्थानीय स्तर पर होटल, परिवहन और हस्तशिल्प उद्योग को भारी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। आचार्य किशोर कुणाल ने बताया कि मंदिर का मुख्य निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है और आने वाले कुछ वर्षों में यह पूरी तरह बनकर तैयार हो जाएगा, जिससे बिहार की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाइयां मिलेंगी।
भविष्य का विराट रामायण मंदिर
यह विशाल शिवलिंग 'विराट रामायण मंदिर' का मुख्य केंद्र होगा, जिसके साल 2030 तक बनकर पूरी तरह तैयार होने की उम्मीद है।
इस मंदिर का निर्माण पूरा होना बिहार के लिए न केवल धार्मिक बल्कि गौरव का एक बड़ा पल होगा, जिसकी शुरुआत आज इस ऐतिहासिक स्थापना के साथ हो गई है।