Dog Bite Case: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- इंसानी जान की सुरक्षा सर्वोपरि, लापरवाही पर देना होगा जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार होंगी और उन्हें भारी मुआवजा देना होगा।
कोर्ट ने स्थानीय निकायों और नगर निगमों की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त किया।
नई दिल्ली : देशभर में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और उनसे होने वाली मौतों पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल कागजी कार्रवाई से काम नहीं चलेगा। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि अब हर एक "डॉग बाइट" के लिए जवाबदेही तय होगी।
कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो भारी जुर्माने के लिए तैयार रहें।
सरकारों को चुकानी होगी भारी कीमत
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि पिछले पांच वर्षों में आवारा जानवरों के प्रबंधन के लिए बने नियमों का सही क्रियान्वयन नहीं हुआ है।
बेंच ने कहा कि भविष्य में कुत्तों के काटने से होने वाली हर मौत या गंभीर चोट के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार होंगी।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि वह इन घटनाओं के लिए राज्यों पर "भारी मुआवजा" लगाने पर विचार कर रहा है, क्योंकि लोगों की जान की सुरक्षा करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
डॉग फीडर्स पर भी कसेगा शिकंजा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उन लोगों पर भी सख्त टिप्पणी की जो सार्वजनिक सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि जो लोग आवारा कुत्तों को खिलाते हैं, उन्हें उन कुत्तों के व्यवहार की भी जिम्मेदारी लेनी होगी।
कोर्ट का तर्क था कि यदि आपको जानवरों से इतना ही प्रेम है, तो उन्हें अपने घर ले जाएं और वहीं उनकी देखभाल करें। सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाने से वे वहां अपना इलाका बना लेते हैं, जिससे राहगीरों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरा पैदा होता है।
संस्थानों को 'डॉग-फ्री' बनाने का आदेश
अदालत ने शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों जैसे उच्च फुटफॉल वाले क्षेत्रों को तुरंत आवारा कुत्तों से मुक्त करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों पर आवारा कुत्तों की मौजूदगी गंभीर संक्रमण और हादसों का कारण बन सकती है।
बेंच ने गुजरात हाई कोर्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोर्ट परिसर के अंदर वकील सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता का क्या हाल होगा। इन क्षेत्रों से कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रशासनिक विफलता पर जताई नाराजगी
कोर्ट ने स्थानीय निकायों और नगर निगमों की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। बेंच ने सवाल किया कि जब एक 9 साल के बच्चे पर कुत्ते हमला करते हैं, तो क्या हमें आंखें बंद कर लेनी चाहिए? कोर्ट ने कहा कि कुछ राज्यों ने तो कोर्ट के आदेशों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा, ऐसे राज्यों के प्रति अब "सख्त रुख" अपनाया जाएगा।
अधिकारियों को आगाह किया गया है कि नियमों की अनदेखी करने पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
Co-existence बनाम पब्लिक सेफ्टी
सुनवाई के दौरान पशु प्रेमियों की ओर से तर्क दिया गया कि कुत्तों को उनके प्राकृतिक इलाके से हटाना क्रूरता है, जिस पर कोर्ट ने कहा कि वे जानवरों के प्रति क्रूरता के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन 'राइट टू लाइफ' सर्वोपरि है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी और टीकाकरण करना अनिवार्य है, लेकिन आक्रामक और पागल कुत्तों को सड़कों पर खुला नहीं छोड़ा जा सकता। इस मामले में अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को होनी है, जिसमें मुआवजे की रूपरेखा तय हो सकती है।