नई दिल्ली : मिडल ईस्ट में इस समय बारूद की गंध है और दुनिया एक महायुद्ध के मुहाने पर खड़ी है। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के साथ जारी भीषण तनाव के बीच लेबनान में जमीनी सेना उतारकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
अंतरराष्ट्रीय गलियारों में यह सस्पेंस गहरा गया है कि क्या लेबनान पर हमला और ईरान के साथ सीधा टकराव महज आत्मरक्षा है या इसके पीछे 'ग्रेटर इजराइल' (Eretz Yisrael Hashlema) का कोई गुप्त एजेंडा छिपा है? विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का अगला कदम पूरे नक्शे को बदलने वाला हो सकता है।
'Either fight Greater Israel or be their slave' — girl moves from West BACK to Iran 'under bombardment' pic.twitter.com/8EHMUhXagq
— RT (@RT_com) March 15, 2026
क्या है 'ग्रेटर इजराइल' का नक्शा और इसका धार्मिक आधार
'ग्रेटर इजराइल' एक ऐसी विचारधारा है जो इजराइल की सीमाओं को वर्तमान नक्शे से कहीं आगे तक देखती है। धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के आधार पर इसके समर्थकों का मानना है कि इजराइल की असली सीमाएं 'नील नदी' (मिस्र) से लेकर 'फरात नदी' (इराक) तक फैली होनी चाहिए। इस नक्शे में न केवल वर्तमान इजराइल, बल्कि फिलिस्तीन के इलाके, लेबनान का बड़ा हिस्सा, सीरिया का कुछ भाग, जॉर्डन और इराक तक के क्षेत्र शामिल हो जाते हैं।
What is the connection between the massacres committed by Israel in Palestine, Syria, and Lebanon and the “Greater Israel” project? https://t.co/cu6APrhJr1
— Palestine Info Center (@palinfoen) March 15, 2026
नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन के कई नेता खुलेआम इस विस्तारवाद की वकालत करते रहे हैं, जिसने अरब देशों में खलबली मचा दी है।
लेबनान पर हमला: सुरक्षा की आड़ में जमीन हड़पने की योजना?
नेतन्याहू सरकार का आधिकारिक दावा है कि लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों को नष्ट करना जरूरी है ताकि उत्तरी इजराइल के नागरिक सुरक्षित रह सकें। हालांकि, जिस तरह से इजराइली सेना लेबनान के भीतर घुसकर नियंत्रण बना रही है, उससे 'ग्रेटर इजराइल' के दावों को बल मिल रहा है।
As soon as we declare war on Iran, America will withdraw from the conflict, sell weapons to both sides, and use our resources to defeat both sides and expand the Greater Israel project,
— Visegrád 24 (@visegrad24) March 9, 2026
says former Qatari PM Hamad bin Jassim. 🇶🇦 pic.twitter.com/Y2XItNxRR5
आलोचकों का कहना है कि हिजबुल्लाह को बहाना बनाकर इजराइल दक्षिण लेबनान की उपजाऊ जमीन और पानी के स्रोतों पर कब्जा करना चाहता है, जो उनके 'ग्रेटर इजराइल' के नक्शे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ईरान की तबाही क्यों है इजराइल के लिए जरूरी
इजराइल के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट ईरान है। ईरान न केवल हिजबुल्लाह और हमास का समर्थन करता है, बल्कि वह खुद एक परमाणु शक्ति बनने की दहलीज पर है। 'ग्रेटर इजराइल' के सपने को हकीकत में बदलने के लिए ईरान के 'रेजिस्टेंस एक्सिस' को तोड़ना अनिवार्य है।
नेतन्याहू जानते हैं कि जब तक ईरान आर्थिक और सैन्य रूप से मजबूत है, इजराइल के लिए क्षेत्रीय विस्तार करना नामुमकिन है। इसीलिए, ईरान के परमाणु ठिकानों और तेल डिपो पर हमले की योजना बनाकर इजराइल उसे दशकों पीछे धकेलने की रणनीति पर काम कर रहा है।
नेतन्याहू का 'नया मिडल ईस्ट' और दुनिया का सस्पेंस
हाल ही में नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र में एक नक्शा दिखाया था जिसे उन्होंने 'नया मिडल ईस्ट' कहा था। इस नक्शे में फिलिस्तीन का नामोनिशान नहीं था। अब सवाल यह उठता है कि क्या इजराइल अमेरिका के समर्थन का फायदा उठाकर पूरे क्षेत्र की भूगोल बदलने की फिराक में है?
अगर इजराइल ईरान के सीधे युद्ध में उलझता है और अमेरिका उसे ढाल प्रदान करता है, तो यह 'ग्रेटर इजराइल' की दिशा में पहला बड़ा कदम साबित हो सकता है। दुनिया इस सस्पेंस में है कि क्या नेतन्याहू इस लक्ष्य के लिए पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध में झोंकने को तैयार हैं?
1967 का युद्ध और लिकुड पार्टी का संविधान
'ग्रेटर इजराइल' का विचार पहली बार 1967 के छह-दिवसीय युद्ध के बाद चर्चा में आया था, जब इजराइल ने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम, गाजा, गोलान हाइट्स और सिनाई प्रायद्वीप पर नियंत्रण किया था। इस विचार को 1977 में 'लिकुड पार्टी' के संविधान में भी शामिल किया गया।
इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “समुद्र से लेकर जॉर्डन नदी तक इजरायली संप्रभुता होगी।” यह घोषणा सीधे तौर पर फिलिस्तीनी संप्रभुता के विचार को नकारती है और पूरे क्षेत्र पर इजरायली अधिकार की वकालत करती है।
क्या नेतन्याहू छोड़ जाएंगे एक खंडित इजराइल?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजराइल को इस राह से हटाना है, तो केवल शब्दों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए इजराइल पर कठोर प्रतिबंध लगाने और सैन्य व आर्थिक सहयोग समाप्त करने जैसे ठोस कदमों की आवश्यकता है। अन्यथा, 'ग्रेटर इजराइल' की योजना को साकार होते देर नहीं लगेगी।
इसका खामियाजा न केवल फिलिस्तीनियों को भुगतना होगा, बल्कि इजराइल की वैश्विक साख भी गंभीर रूप से प्रभावित होगी। संभव है कि जब नेतन्याहू सत्ता से हटें, तो वे एक ऐसा इजराइल पीछे छोड़ जाएं जिसकी अंतरराष्ट्रीय छवि पूरी तरह नष्ट हो चुकी हो और जिसे सुधारने में दशकों लग जाएं।









