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होर्मुज स्ट्रेट संकट के बीच यूरोपीय देशों ने अमेरिका से अलग होकर अपनी सुरक्षा रणनीति बनाने का बड़ा फैसला किया है। ब्रिटेन और फ्रांस के नेतृत्व में 'यूरोपियन NATO' जैसा ढांचा तैयार किया जा रहा है।

मिडिल-ईस्ट में जारी जंग और वैश्विक तनाव के बीच यूरोप ने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया है जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचा दी है। होर्मुज स्ट्रेट संकट और ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका के साथ बढ़ते मतभेदों के बीच, यूरोपीय देशों ने अब अमेरिका से अलग होकर अपनी स्वतंत्र सुरक्षा रणनीति बनाने का फैसला किया है।

ब्रिटेन और फ्रांस के नेतृत्व में एक नया सुरक्षा ढांचा तैयार किया जा रहा है, जिसे अनौपचारिक तौर पर 'यूरोपियन NATO' कहा जा रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य होर्मुज स्ट्रेट जैसे दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शिपिंग रूट को फिर से बहाल करना और अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

​अमेरिका से किनारा: क्यों अलग राह पर चला यूरोप? 
इस नई सुरक्षा योजना की सबसे खास बात यह है कि इसमें अमेरिका को जानबूझकर अलग रखा गया है। हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच ईरान युद्ध और नौसैनिक नाकाबंदी जैसी रणनीतियों को लेकर गहरे मतभेद उभरे हैं।

कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका के आक्रामक सैन्य अभियानों का समर्थन करने से इनकार कर दिया है। यही वजह है कि अब यूरोप "आत्मनिर्भर सुरक्षा" की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जर्मनी जैसे देश, जो पहले कभी अलग सैन्य गुट बनाने के खिलाफ थे, अब इस 'यूरोपियन NATO' की पहल का खुलकर समर्थन कर रहे हैं।

​होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा और मिशन के 3 मुख्य लक्ष्य 
​पूरी यूरोपियन रणनीति मुख्य रूप से होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित बनाने पर केंद्रित है, जहाँ से वैश्विक तेल सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। हालिया युद्ध और समुद्री खतरों की वजह से यहाँ शिपिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस नए गठबंधन के तीन मुख्य लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं:

  • ​युद्ध के दौरान संकट में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना।
  • ​समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाना।
  • ​भविष्य में जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए एक स्थायी निगरानी और एस्कॉर्ट सिस्टम तैयार करना।

​संसदीय और कूटनीतिक पहल: 40 देशों की महाबैठक 
इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर बड़ी तैयारी शुरू हो गई है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टारमर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इसी हफ्ते 40 से ज्यादा देशों की एक बड़ी बैठक बुलाने जा रहे हैं। इस बैठक में नई सुरक्षा योजना और यूरोपीय कमांड के तहत बहुराष्ट्रीय रक्षा गठबंधन बनाने पर चर्चा होगी।

खास बात यह है कि यह पूरी व्यवस्था यूरोपीय कमान के तहत चलेगी, न कि अमेरिका के नेतृत्व में। यह कदम न केवल सुरक्षा बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है कि यूरोप अब अपनी रक्षा जरूरतों के लिए वाशिंगटन पर निर्भर नहीं रहना चाहता।

​चुनौतियां और भविष्य: क्या ईरान इसको मंजूरी देगा?​ 
हालांकि यह योजना सुनने में जितनी प्रभावी है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या ईरान इस तरह के किसी यूरोपीय मिशन को अपने क्षेत्र में मंजूरी देगा?

इसके अलावा, यूरोप को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस मिशन के दौरान अमेरिका के साथ कोई नया टकराव न हो, क्योंकि अमेरिका पहले से ही अपनी नौसेना के जरिए इस क्षेत्र में दबाव बनाए हुए है। यदि यह योजना सफल होती है, तो यह 'यूरोपियन NATO' भविष्य में वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है।

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