लखनऊ: उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य के अपमान को लेकर चल रहे विवाद के बीच योगी सरकार डैमेज कंट्रोल और धार्मिक भावनाओं को साधने में जुट गई है। इस विवाद के केंद्र में अब राजधानी लखनऊ आ गई है, जहा डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने अपने सरकारी आवास पर 100 बटुकों को आमंत्रित कर उनका भव्य सम्मान किया।
एक तरफ जहा ब्रजेश पाठक ने संतों के सम्मान में 'शिखा खींचने को महापाप' बताया, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के अलग-अलग बयानों ने सियासी पारे को और बढ़ा दिया है।
डिप्टी सीएम ने धोए बटुकों के पैर, कहा- संतों का अपमान बर्दाश्त नहीं
शंकराचार्य विवाद के तूल पकड़ने के बाद डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने हिंदू समाज और संत समुदाय में पनप रहे आक्रोश को शांत करने की पहल की। उन्होंने अपने आवास पर 100 बटुकों को बुलाकर बाकायदा उनके पैर धोए, तिलक लगाया और उन पर पुष्प वर्षा की।
इस दौरान ब्रजेश पाठक ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि हिंदू धर्म में शिखा का बहुत महत्व है और किसी की चोटी खींचना महापाप की श्रेणी में आता है।
उन्होंने साफ संदेश दिया कि उनकी सरकार संतों और बटुकों के सम्मान के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी तरह का अपमान स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह कदम सीधे तौर पर उस घटना का जवाब माना जा रहा है जिसमें पुलिस प्रशासन पर अभद्रता के आरोप लगे थे।
सीएम योगी और केशव मौर्य के बयानों में दिखा विरोधाभास
एक ही मुद्दे पर सरकार के शीर्ष नेतृत्व के सुर अलग-अलग सुनाई दे रहे हैं, जिससे सियासी गलियारों में चर्चा तेज है। जहां ब्रजेश पाठक बटुकों की पूजा कर रहे थे, वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़े तेवर दिखाते हुए कहा कि "हर कोई शंकराचार्य नहीं हो सकता।" सीएम का इशारा संभवतः पद की गरिमा और नियमों की ओर था।
इसके ठीक उलट, दूसरे डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने नरम रुख अपनाते हुए कहा कि "शंकराचार्य हमारे लिए भगवान स्वरूप हैं और वे पूजनीय हैं।" सरकार के इन तीन बड़े चेहरों के अलग-अलग बयानों से यह स्पष्ट है कि बीजेपी इस मुद्दे को लेकर सतर्क है और हर वर्ग को साधने की कोशिश कर रही है।
धार्मिक अनुष्ठान के जरिए राजनीतिक डैमेज कंट्रोल की कोशिश
लखनऊ में आयोजित यह कार्यक्रम महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक संदेश भी था। विपक्ष लगातार शंकराचार्य के अपमान के मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है, जिसे देखते हुए सत्ता पक्ष ने यह 'सम्मान समारोह' आयोजित किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ब्रजेश पाठक का यह कदम ब्राह्मण और संत समाज की नाराजगी दूर करने की एक कवायद है। बटुकों को भोजन कराने और दक्षिणा देने के साथ-साथ सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि सनातन परंपरा का सम्मान उनके लिए सर्वोपरि है, भले ही प्रशासनिक स्तर पर कुछ चूक हुई हो।










