मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि रेलवे प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण के बदले पोते को नौकरी नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि नियमों में केवल जमीन मालिक, उसके पति/पत्नी और बच्चों को ही रोजगार का अधिकार है।

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने कहा है कि रेलवे के प्रोजेक्ट के लिए दादा की जमीन के अधिग्रहण के बदले पोते को रोजगार नहीं दिया जा सकता। यह निर्णय सुनाते हुए जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डीबी बेंच ने कहा कि कानून में सिर्फ जमीन मालिक, उसके पति या पत्नी और बेटे और बेटी को ही नौकरी देने का प्रावधान है। चूंकि कानून में पोते के लिए कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए उसे नौकरी नहीं दी जा सकती। इसके साथ बेंच ने केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें पोते के दावे पर विचार करने कहा गया था।

हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती
हाईकोर्ट में यह मामला केन्द्र सरकार के रेल मंत्रालय, पश्चिम मध्य रेलवे के सीनियर डिवीजनल ऑफिसर और अन्य की ओर से दाखिल किया गया था। आवेदकों का कहना था कि रीवा-सीधी रेल परियोजना के लिए जगत प्रताप सिंह की जमीन अधिग्रहित की गई थी। इसके बदले जगत प्रताप सिंह को अप्रैल 2013 में चेक से भुगतान किया गया था। दिसंबर 2013 में रेलवे ने भूमि अधिग्रहण के प्रभावितों को नौकरी देने की अधिसूचना जारी की। जगत प्रताप सिंह के पोते भैया प्रशांत सिंह ने नौकरी के लिए आवेदन किया, जो खारिज कर दिया गया। 

पोते को नौकरी का प्रावधान नहीं 
भैया प्रशांत सिंह ने इस पर कैट में मामला दाखिल किया, जहां 21 मार्च 2025 को उसके मामले पर विचार करने के आदेश दिए गए। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर में सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार और रेलवे विभाग की ओर से अधिवक्ता अर्णव तिवारी ने डिवीजन बेंच के सामने दलील दी कि रेलवे द्वारा जारी अधिसूचना में स्पष्ट था कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने के मामले में सिर्फ जमीन मालिक, उसकी पत्नी या बच्चों को ही नौकरी देने का प्रावधान था। पोते के लिए नौकरी का कोई प्रावधान नहीं है। अतः इस मामले में पुनर्विचार नहीं किया जा सकता।