Kuno National Park: मध्यप्रदेश। कूनो नेशनल पार्क में शनिवार को 9 चीते पहुंचे। इनमें 6 मादा और 3 नर हैं। इसके पहले जानकारी सामने आई थी कि, आठ चीते कूनो नेशनल पार्क में आएंगे। चीतों को पहले फ्लाइट से ग्वालियर लाया गया और इसके बाद हेलीकॉप्टर से कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया। केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव इन चीतों को विशेष बाड़े में छोड़ा।
बताया जा रहा है कि, चीतों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए पार्क में 5 हेलीपैड बनाये गए। पूरा अभियान अत्यंत सावधानी और वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत किया गया। पार्क में बाड़े तैयार किए गए हैं, जहां चीते लगभग एक महीने तक क्वारंटाइन में रहेंगे। इस तरह अब भारत में चीतों की संख्या 39 से 48 हो गई है।
सफल प्रजनन के चरण में प्रोजेक्ट चीता
‘प्रोजेक्ट चीता’ अब अपने प्रारंभिक चरण से आगे बढ़कर स्थायी स्थापना और सफल प्रजनन के चरण में प्रवेश कर चुका है। दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 12 चीतों में से 8 वर्तमान में कूनो में पूर्णतः स्थापित और स्वस्थ हैं। इनमें से 3 चीतों को गांधी सागर अभयारण्य में सफलतापूर्वक स्थानांतरित किया गया है। दक्षिण अफ्रीकी माताओं से जन्मे 10 शावक जीवित और स्वस्थ हैं।
यह भी पढ़ें: बाबा महाकाल के दर्शन के बाद बोले पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़
यह भी पढ़ें: 55 जिलों में लगभग 1200 दुकानों की ई-टेंडर की प्रक्रिया शुरू
यह भी पढ़ें: बिजली वितरण कंपनियां को नौ साल में 34 हजार करोड़ घाटा
यह भी पढ़ें: मध्य प्रदेश प्राइमरी स्कूल टीचर परीक्षा का रिजल्ट जारी
यह भी पढ़ें: 2 मार्च से बदलेगा मौसम, ग्वालियर-चंबल में आंधी-बारिश के आसार
मादा चीता द्वारा दिया जा रहा शावकों को जन्म
भारत में जन्मी पहली वयस्क मादा चीता ‘मुखी’ ने 5 शावकों को जन्म दिया है, जो इस परियोजना की ऐतिहासिक उपलब्धि है। ‘गामिनी’ दूसरी बार माँ बनी है। उसकी पहली गर्भावस्था से जन्में 3 सब-एडल्ट शावक स्वस्थ हैं और हाल ही में उसने 4 नए शावकों को जन्म दिया है। ‘वीरा’ अपने 13 माह के शावक के साथ खुले जंगल में विचरण कर रही है, जबकि ‘निर्वा’ अपने 10 माह के तीन शावकों के साथ संरक्षित बाड़े में है।
एशिया से लुप्त हो चुके चीतों का मात्र तीन वर्षों में सफल पुनर्स्थापन भारत के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक सशक्त उदाहरण बन चुका है। प्रजनन करती मादा चीतों, स्वस्थ दूसरी पीढ़ी के शावकों और नए आवासों में विस्तार के साथ यह स्पष्ट है कि चीता अब भारत की वन पारिस्थितिकी का पुनः अभिन्न अंग बन गया है।