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धार के भोजशाला विवाद में हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान नए पुरातात्विक तर्क पेश किए गए। एएसआई खुदाई में मिली ब्रह्मा प्रतिमा और महाकाल मंदिर जैसी निर्माण शैली को मंदिर होने के संकेत के रूप में बताया गया। अगली सुनवाई 15 अप्रैल को होगी।

इंदौर। धार से जुड़े बहुचर्चित भोजशाला विवाद में एक बार फिर सुनवाई के दौरान नए तथ्य रखे गए हैं। शुक्रवार को हाईकोर्ट की डबल बेंच के समक्ष इस मामले में याचिका पर विस्तृत बहस हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पेश सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ने स्थल के धार्मिक स्वरूप पर तर्क रखे। उन्होंने दावा किया कि उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्य इसके मंदिर होने की ओर इशारा करते हैं। इस दौरान खासतौर पर एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) की खुदाई से मिले अवशेषों का उल्लेख किया गया। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अगली सुनवाई 15 अप्रैल को तय की है।

ASI खुदाई-ब्रह्मा प्रतिमा मुख्य आधार 
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने एएसआई की खुदाई में मिली एक विशेष प्रतिमा का जिक्र किया। यह प्रतिमा भगवान ब्रह्मा की बताई जा रही है, जिसे दुर्लभ श्रेणी का माना गया। उनके अनुसार, इस मूर्ति की बनावट और स्वरूप प्राचीन ग्रंथ समरांग सूत्रधार से मेल खाते हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा के युवा रूप का जो विवरण है, वही शैली प्रतिमा में दिखाई देती है। इसके अलावा अन्य स्थानों से प्राप्त मूर्तियों का भी संदर्भ दिया गया। इन सभी को एक ही शिल्प परंपरा का हिस्सा बताया गया है।

अन्य स्थलों से भी जोड़ी गई समानता 
अधिवक्ता ने अपने तर्कों में मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों का उल्लेख किया। हिंगलाजगढ़, मंदसौर और रायसेन से मिली मूर्तियों का हवाला दिया गया। इन मूर्तियों की कलात्मक शैली भोजशाला परिसर में पाए गए अवशेषों से मिलती-जुलती बताई गई। इससे यह संकेत देने की कोशिश की गई कि यह एक समान स्थापत्य परंपरा का हिस्सा है। ऐतिहासिक दृष्टि से इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में पेश किया गया। कोर्ट में इन तथ्यों को मंदिर पक्ष के समर्थन में रखा गया।

महाकाल से मिलता-जुलता स्थापत्य  
सुनवाई के दौरान उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि भोजशाला की निर्माण शैली कई मायनों में महाकाल मंदिर से मिलती है। खंभों की संरचना, नक्काशी और वास्तु विन्यास में समानता दर्शाई गई। अधिवक्ता ने कहा कि यह समानता मंदिर वास्तुकला की परंपरा को दर्शाती है। उन्होंने तर्क दिया कि इस आधार पर भोजशाला को प्राचीन सरस्वती मंदिर माना जा सकता है। जहां कभी शिक्षा और विद्या का केंद्र विकसित हुआ था।

समरांग सूत्रधार बना प्रमुख संदर्भ ग्रंथ 
राजा भोज द्वारा रचित समरांग सूत्रधार को इस मामले में महत्वपूर्ण आधार बताया गया। यह ग्रंथ नगर नियोजन और मंदिर वास्तुकला पर आधारित है। इसमें मंदिरों की संरचना, स्तंभों और मूर्तियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। अधिवक्ता ने कहा कि भोजशाला के कई हिस्से इस ग्रंथ के सिद्धांतों से मेल खाते हैं। इसी आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि स्थल का स्वरूप मंदिर जैसा है। भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है, जहां हिंदू और मुस्लिम पक्ष अपने-अपने धार्मिक दावे करते रहे हैं। मामला न्यायालय में विचाराधीन है। अब 15 अप्रैल की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। 

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