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Hisar: जोधपुर में तैनात बीएसएफ के जवान शहीद अनिल कुमार का उनके पैृतक गांव कंवारी में पूरे राजकीय व सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। हजारों की संख्या में मौजूद ग्रामीणों ने नम आंखों से शहीद अनिल को अंतिम विदाई दी। शहीद का पार्थिव शरीर जोधपुर से उनके पैतृक गांव कंवारी में लाया गया। जोधपुर से बीएसएफ की ओर से आए  सुभाष चंद्र ने बताया कि अनिल कुमार ड्यूटी करने के बाद बाइक से अपने कमरे पर जा रहा था कि अज्ञात वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।

शहीद बेटे को बार-बार पुकारती रही मां

शहीद अनिल कुमार का पार्थिव शरीर जब उनके गांव में लाया गया तो हर किसी की आंख नम थी और जिसको भी सूचना मिली, वह वहां पर दौड़ा चला आया। शहीद अनिल के भाई देवेंद्र ने बताया कि उनका भाई उनके लिए भगवान के बराबर था। अनिल की माता कृष्णा देवी बार-बार अपने बेटे को पुकार रही थी और आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। ऐसा ही हाल अनिल की पत्नी कविता देवी का था। शहीद की अंतिम यात्रा में जोधपुर से आए बीएसएफ के जवान और हिसार बीएसएफ कैंप से पहुंचे अधिकारी व जवानों के साथ-साथ हजारों की संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। इसके बाद राजकीय सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम संस्कार किया गया।

अनिल कुमार के बेटे अचल को सौंपा तिरंगा

जब भी कोई जवान शहीद होता है तो उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाता है। बीएसएफ की तरफ से पहुंचे अधिकारियों ने श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद तिरंगे झंडे को सम्मान के साथ अनिल कुमार के स्वजनों में उनके बेटे अचल को सौंपा और सलामी दी।

रग रग में बस था कबड्डी खेल

बचपन से ही अनिल का कबड्डी सबसे पसंदीदा खेल था। पहले उनके पिता मांगेराम दुहन भी कबड्डी खेलते थे। कबड्डी खेलते खेलते ऐसी तकनीक सीखी कि जब भी वह मैदान में कबड्डी का मैच खेलने उतरते थे तो सामने वाली टीम के पसीने छूट जाते थे। बहुत कम ऐसे मौके आए जब उनकी टीम को हार का सामना करना पड़ा हो। दसवीं क्लास में पहुंचते ही उन्होंने अपने गांव के स्कूल की टीम को राज्य स्तर तक पहुंचाया था।

कबड्डी के दम पर ही बीएसएफ में हुआ था चयन

वर्ष 2001 में बीएसएफ में स्पोर्ट्स कोटे से ट्रायल देकर भर्ती हुए अनिल कुमार गांव के पहले ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने खेल कोटे से सेना में जाने का अवसर मिला। बीएसएफ की तरफ से खेलते हुए उन्होंने अपनी प्रतिभा का बेहतरीन प्रदर्शन किया। 7 साल तक कोचिंग भी की। नेशनल कबड्डी में कई बार बेस्ट रैडर का अवार्ड भी मिला। 1998 और 1999 में दो बार हरियाणा की टीम से नेशनल खेलते हुए अपनी टीम को बेहतरीन जीत दिलाई थी। इसी दौरान वह बेस्ट रैडर भी चुने गए थे।

बेटा अचल भी पिता की तरह बनना चाहता हैं बेहतर खिलाड़ी

अनिल कुमार का इकलौते बेटे अचल ने बताया कि वह भी पिता की तरह कबड्डी में बेहतरीन खिलाड़ी बनना चाहते हैं और आर्मी में भर्ती होकर देश सेवा भी करना चाहते हैं। अचल फिलहाल दसवीं क्लास में पढ़ाई कर रहा हैं। अचल ने बताया कि उनकी फोन पर तो अक्सर बात होती थी लेकिन फेस टू फेस वह मार्च में मिले थे। अभी 15 तारीख को ही वह परिवार के साथ जोधपुर में पापा के पास घूमने के लिए जाने का मन बना रहे थे। वह अपने मामा के घर गए हुए थे कि इसी दौरान यह हादसा हो गया जिसको वह कभी भूल नहीं सकते।