वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव के बीच खाड़ी देशों ने संभावित परमाणु आपदा से निपटने की तैयारियां तेज कर दी हैं। 

इसी कड़ी में, बहरीन के एक फार्मा लायजनिंग एजेंट ने चंडीगढ़ की एक प्रमुख दवा निर्माता कंपनी से संपर्क कर 'प्रशियन ब्लू'  कैप्सूल और पोटैशियम आयोडाइड टैबलेट्स की भारी मांग की है।

1 करोड़ कैप्सूल की बड़ी खेप की तैयारी
बहरीन स्थित एजेंट ने चंडीगढ़ की कंपनी से पूछताछ की है कि क्या वे 1 करोड़ प्रशियन ब्लू कैप्सूल की आपूर्ति करने में सक्षम हैं। साथ ही, कंपनी से उत्पादन क्षमता, डोज प्रोटोकॉल और अलग-अलग आयु वर्ग के लिए दवा की उपलब्धता पर विस्तृत ब्यौरा मांगा गया है। कंपनी की डायरेक्टर डॉ. वैशाली अग्रवाल ने पुष्टि की है कि इस संबंध में बातचीत चल रही है और एजेंट इसे अपने देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ साझा कर रहे हैं। यदि समझौता अंतिम रूप लेता है, तो इन जीवन रक्षक दवाओं की आपूर्ति बहरीन, कुवैत, कतर और जॉर्डन तक की जा सकती है।

क्या है 'प्रशियन ब्लू' और यह क्यों जरूरी है?
प्रशियन ब्लू एक अत्यंत विशिष्ट दवा है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने परमाणु या रेडियोलॉजिकल आपातकाल के लिए 'आवश्यक दवा' की श्रेणी में रखा है:

  • कार्यप्रणाली: यह दवा शरीर के अंदर गए रेडियोएक्टिव तत्वों जैसे सीजियम-137 और थैलियम को अवशोषित कर लेती है और उन्हें मल के माध्यम से शरीर से बाहर निकालने में मदद करती है।
  • तकनीक: यह दवा DRDO की दिल्ली स्थित लैब INMAS (इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेस) द्वारा विकसित तकनीक पर आधारित है।
  • भारत का योगदान: भारत में इसका व्यावसायिक उत्पादन लगभग दो साल पहले शुरू हुआ था। इसके निर्माण और मार्केटिंग के लिए DCGI ने दो भारतीय कंपनियों को अधिकृत किया है।

पोटैशियम आयोडाइड की भी बड़ी मांग
प्रशियन ब्लू के अलावा, खाड़ी देशों ने 1.2 करोड़ पोटैशियम आयोडाइड (KI) टैबलेट की भी संभावित मांग जताई है। पोटैशियम आयोडाइड का उपयोग परमाणु हमले के दौरान थायराइड ग्रंथि को रेडिएशन के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए किया जाता है। कंपनी की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हिमाचल प्रदेश के बद्दी में स्थित है, जहाँ इन दवाओं का उत्पादन मानकों के अनुरूप किया जाता है।

पहले भी उठी थी मांग
यह पहली बार नहीं है जब इन दवाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई है। जून 2025 में इजराइल-ईरान तनाव के दौरान भी इन दवाओं की भारी मांग सामने आई थी, हालांकि उस समय संघर्ष के जल्दी थम जाने के कारण आपूर्ति पर बात आगे नहीं बढ़ पाई थी। अब एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर इन दवाओं की वैश्विक मांग में उछाल देखा जा रहा है।

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