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इजराइल और ईरान के बीच चल रहे सैन्य संघर्ष ने भारतीय बासमती चावल उद्योग की कमर तोड़ दी है।

मिडिल ईस्ट के समुद्री रूटों के बाधित होने के कारण भारत से होने वाला बासमती चावल का निर्यात लगभग रुक गया है। इस संकट की सबसे ज्यादा मार हरियाणा और पंजाब के राइस मिलर्स पर पड़ रही है, जहां से देश का 60 से 70 प्रतिशत चावल निर्यात होता है।

क्या है संकट की मुख्य वजह?
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल ने जानकारी दी कि बासमती चावल के कुल निर्यात का 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) में जाता है। ईरान, इराक और सऊदी अरब जैसे देशों में सालाना लगभग 30 लाख टन बासमती चावल भेजा जाता है।

व्यापार पर पड़ा गहरा असर

  • समुद्र में फंसा माल: लाखों टन चावल से लदे जहाज बंदरगाहों पर अटके हुए हैं। जो जहाज पहले ही समुद्र में निकल चुके थे, वे भी बीच रास्ते में फंस गए हैं। कई जहाजों का माल दुबई, शारजाह और ओमान के बंदरगाहों पर उतारना पड़ा है।
  • फ्रेट (किराया) में बेतहाशा बढ़ोतरी: युद्ध के कारण समुद्री यात्रा का जोखिम बढ़ गया है। पहले एक कंटेनर का किराया 500 से 1000 डॉलर होता था, जो अब बढ़कर 3000 डॉलर प्रति कंटेनर तक पहुंच गया है।
  • महंगा हुआ इंश्योरेंस: 'वॉर रिस्क' के कारण इंश्योरेंस कंपनियों ने प्रीमियम बढ़ा दिया है, जिससे निर्यातकों पर प्रति टन 50 से 100 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
  • हॉर्मुज जलडमरूमध्य का जोखिम: बासमती चावल भेजने का मुख्य मार्ग 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' है, जो इस युद्ध के कारण अत्यधिक संवेदनशील और जोखिम भरा हो गया है।

उद्योग पर मंडराया बंदी का खतरा
एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल ने चेतावनी दी है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो कई राइस मिलों को बंद करने की नौबत आ सकती है।काम रुकने के बावजूद मिलों को बिजली के बिल, बैंक ब्याज और स्थाई कर्मचारियों का वेतन जैसे भारी खर्च उठाने पड़ रहे हैं। एक बड़ी राइस मिल में औसतन 200 मजदूर काम करते हैं। काम की गति घटने से इन मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों और ड्राइवरों की आजीविका प्रभावित हो रही है।

सरकार से राहत की गुहार
निर्यातकों ने भारत सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। एसोसिएशन ने आग्रह किया है कि युद्ध के कारण बढ़े हुए फ्रेट और इंश्योरेंस का अतिरिक्त बोझ निर्यातकों पर न डाला जाए।बंदरगाहों पर फंसे माल पर अतिरिक्त 'डैमरेज शुल्क' न लिया जाए। सरकार नीतिगत फैसले लेकर इस सप्लाई चेन को सुचारू बनाने में मदद करे।

फिलहाल, व्यापारी बैंकों के साथ वित्तीय वर्ष की क्लोजिंग (31 मार्च) के दबाव में भी हैं। सतीश गोयल के अनुसार, अगर स्थिति एक हफ्ते में नहीं सुधरी, तो यह संकट पूरे भारतीय चावल उद्योग के लिए एक बड़ी आर्थिक आपदा का रूप ले सकता है।

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