देश की राजधानी दिल्ली के लिए मेट्रो एक सुगम परिवहन का साधन बन चुकी है। केवल बुजुर्ग ही नहीं बल्कि महिलाएं और बच्चे भी आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकते हैं। यात्रियों को किसी तरह की परेशानी न आए इसके लिए मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं के लिए कई इंतजाम किए गए हैं। बावजूद इसके कई बार ऐसी स्थितियां बन जाती है, जिस कारण यात्रियों को शर्मसार होना पड़ता है। दिल्ली की एक अदालत ने ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए उस आरोपी की सजा को बरकरार रखा है, जिसने मेट्रो के भीतर हस्तमैथुन कर बगल में बैठी महिला का यौन उत्पीड़न किया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरगुरविंदर सिंह जग्गी ने दिल्ली मेट्रो में महिलाओं की सुरक्षा संबंधित चिंताओं का हवाला देते हुए इस व्यक्ति की ओर से सजा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। यह घटना साकेत और आईएनए स्टेशन के बीच येलो लाइन पर 2023 में हुई थी। आरोपी ने आईपीसी की धारा 354 और 354 ए के तहत अपराधों के लिए सजा को चुनौती दी थी।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार दिया था। कहा था कि वह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने और यौन उत्पीड़न करने का दोषी पाया जाता है। उसने भीड़ से भरी मेट्रो में खुद को निर्वस्त्र, हस्तमैथुन किया और महिला को छुआ। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देकर प्रत्येक अपराध के लिए एक वर्ष की कठोर कारावास की सजा के साथ ही जुर्माना भी लगाया। कोर्ट ने कहा कि यह सजाएं एक साथ चलेंगी।
सजा को दी चुनौती
इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई। व्यक्ति ने तर्क दिया कि दोषसिद्धि केवल शिकायतकर्ता की गवाही पर आधारित है। घटना कथित तौर पर मेट्रो ट्रेन में घटी और कोच में भीड़ थी। इसके बावजूद कोई सीसीटीवी फुटेज, स्वतंत्र गवाह या सहायक सामग्री पेश नहीं की गई। यही नहीं, घटना के समय और स्थान की विसंगतियों की तरफ भी इशारा किया। तर्क दिया कि इन सभी के चलते संदेह का लाभ मिलना चाहिए।
अदालत ने दोषसिद्धि की सजा को रखा बरकरार
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरगुरविंदर सिंह जग्गी की अदालत ने कहा कि यह मामला दिल्ली मेट्रो में यात्रा करने वाली महिलाओं की सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर प्रकाश डालता है। हम सभी ने 8 मार्च को अंतराराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया, इसके मद्देनजर और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। अदालत ने कहा कि निचली कोर्ट ने सजा के संबंध में जो भी टिप्पणियां की, सही हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध, विशेष रूप से सार्वजनिक जगहों पर अपराध न केवल शारीरिक बल्कि गंभीर मनोवैज्ञानिक आघात भी पहुंचाते हैं। इससे पीड़ित की निजता और सुरक्षा की भावना का उल्लंघन होता है।
अदालत ने टिप्पणी की कि यह घटना चलती मेट्रो में घटी, जहां पीड़ित को मदद मांगने के लिए आपातकालीन बटन दबाना पड़ा। यह मेट्रो प्रणाली के भीतर मजबूत सुरक्षा उपायों और त्वरित कार्यवाही को रेखांकित करता है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत द्वारा पारित निर्णय पीड़ित के प्रत्यक्ष साक्ष्य पर आधारित था। इसकी पुष्टि घटनाक्रम में शामिल अन्य गवाहों ने की थी, जिसमें आपातकालीन बटन दबाना, अधिकारियों का मौके पर आना और ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन के नियंत्रक कक्ष में आरोपी की गिरफ्तारी शामिल थी। कोर्ट ने व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा है।