बेमेतरा। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के प्रशिक्षण संस्थान डाइट में डीएलएड प्रथम वर्ष और द्वितीय वर्ष के छात्र अध्यापकों के लिए चेतना विकास मूल्य शिक्षा पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण चल रहा है। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद रायपुर के निर्देशानुसार और डाइट बेमेतरा के प्राचार्य जे के घृतलहरे के मार्गदर्शन में किया जा रहा है। प्रशिक्षण के दूसरे दिवस संस्थान के प्राचार्य जे के घृतलहरे ने संबोधित करते हुए कहा कि, जीवन विद्या एक ऐसा दार्शनिक और व्यावहारिक ज्ञान है, जो मानवीय संबंधों, स्वयं की समझ (चेतना) और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की कला सिखाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सुख, शांति, समृद्धि और संतोष के साथ जीवन जीना है, जो शरीर और चेतना (मन) के बीच संतुलन स्थापित करता है। यह परिवार और समाज में विश्वास, सम्मान और न्याय जैसे मूल्यों को बढ़ाता है।
तीन तरह की विचारधारा
मानव तीर्थ किरितपुर के प्रबोधक राम मिलन यादव ने कहा कि, मनुष्य में जन्म से ही तीन तरह की विचारधारा चली आ रही है। पहला ईश्वर केंद्रित रहस्यमूलक विचारधारा, दूसरा वस्तु केंद्रित अस्थिरता अनिश्चयता मूलक़, तीसरा अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित विचारधारा। अस्तित्व स्थिर है और जाग्रति निश्चित है। जो कभी बदलता नहीं है वह अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन ज्ञान। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव है। मैं जीवन हूं जो शरीर को संचालित करता है। आपके अंदर जितनी पात्रता योग्यता है, उतना ही आप समझ पाएंगे।

पढ़ने वालों को कोई नहीं रोक सकता
मानव तीर्थ किरितपुर से प्रबोधक अंकित पोगुला ने छात्राध्यापकों को संबोधित करते हुए कहा कि, हमें मान्यता के आधार पर नहीं जीना है। सबसे स्थाई परिवर्तन शिक्षा के द्वारा और मानसिकता में परिवर्तन से होता है। परिवर्तन कैसे होता है? यह मानसिकता में होता है। सिग्नल में लाल बत्ती जल रही है और अगर हमारी मानसिकता में रुकना है। तो अगर सिग्नल पर पुलिस नहीं भी होगा, तब भी हम लाल बत्ती पर रुक जाते है। जिसको नहीं रूकना है वह नहीं रुकेगा। सारा खेल मानसिकता का है। मानसिकता में पढ़ना है तो कक्षा में शिक्षक नहीं भी होंगे तब भी वह पढ़ेंगा। और जिसको नहीं पढ़ना है। वह वही करेगा जो उसकी मानसिकता में है। शिक्षा और शिक्षक वह जगह है जहां मानसिकता के आधार पर काम सबसे ज्यादा होता है। सबसे प्रभावशाली व्यवसाय शिक्षा ही है। शिक्षक अगर किसी छात्र की मानसिकता बदल दिया है तो वह छात्र जीवन भर उसकी पूजा करेगा। अगर कुछ छात्र कमजोर है तो शिक्षक उनके साथ अलग से बैठकर उनसे मानसिकता को परिवर्तित करने का प्रयास करता है।
पैसे से सम्मान और स्थाई सुख नहीं खरीद सकते
प्रबोधक अंकित पोगुला ने कहा कि, वह 25 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। बहुत से डाइट और एससीईआरटी में काम किया है। पहले शिक्षक बदलता है कि उनके माध्यम से बच्चे बदलते हैं। उनकी मानसिकता में परिवर्तन होता है। शिक्षक का कार्य लोगों को हुनर देना है, स्किल देना है, बच्चों में समझ विकसित करना है। और अगर हम ऐसा हम नहीं देंगे तो वे अपनी पढ़ाई का दुरुपयोग ही करेगा। इसीलिए पढ़ाई के साथ-साथ हमारी शिक्षा, मूल्यों पर आधारित हो। कितना पैसा कमाने के बाद माता-पिता या पति-पत्नी के बीच में लड़ाई नहीं होगी, तलाक नहीं होगा। यह समझने की आवश्यकता है। पैसे से हम सामान खरीद सकते है, सुविधा खरीद सकते है, लेकिन माता-पिता का सम्मान, बेटा बेटी का सम्मान, स्थाई सुख नहीं खरीद सकते। हम कहते है टीचर होना चाहिए, डॉक्टर होना चाहिए, वकील होना चाहिए, साथ ही साथ उनमें अच्छाई का भी गुण होना अत्यंत आवश्यक है। तभी वह अपने कार्य को अच्छी तरह कर पाएगा।
मूल्यों की शिक्षा के बिना सब अधूरा
उन्होंने ने कहा कि, शिक्षा के अंतर्गत सिर्फ पढ़ाई लिखाई काफी नहीं है। बच्चों कों अगर हम मूल्य शिक्षा से नहीं जोड़ेंगे, तब तक हमारी शिक्षा अधूरी ही है। मेरे पास पहले पंखा था, फिर कुलर हुआ, फिर एसी हुआ। फिर भी मम्मी पापा के बीच में लड़ाई हो रही है। तो हम आगे गए कि पीछे। आज हर व्यक्ति के पास मोबाइल है लेकिन बातचीत कम हुआ है, स्नेह का भाव कम हुआ है, तो हम आगे गए हैं कि पीछे।
सोशल मीडिया का करें सही उपयोग
प्रबोधक अंकित पोगुला ने कहा कि, देश की युवाओं के पीछे बहुत बड़ी समस्या आ गई है सोशल मीडिया से सब युवा वर्ग प्रेम करते हैं लेकिन मम्मी पापा, भाई बहन से उतना ही प्रेम कम हो गया है। यदि हम सोशल मीडिया का सदुपयोग करेंगे, तभी हम सुखी होंगे, सफल होंगे। अन्यथा एक जगह सफल होंगे, आगे आएंगे, तो दूसरी जगह हम असफल हो जाएंगे और बहुत पीछे चले जाएंगे। हम जैसा है, वैसा अपने आप को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। हमारी सोच, मानसिकता बदलती जाती है। यही सापेक्ष आत्मविश्वास है। दूसरों से तुलना करके हम अपने आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं और काम करते हैं। इसी को सापेक्ष आत्मविश्वास कहते है। इसी को सापेक्ष आत्मविश्वास कहते है। जैसे कोई गोरे हैं या मेरे से साँवले है। मेरे इंस्टाग्राम में इसे ज्यादा फॉलोअर है इस तरह से एक दूसरे की तुलना करते हैं। हम सब अपने मूल में सुखी चाहते हैं। सोशल मीडिया हमें सुखी करता है या दुखी। सोशल मीडिया सदुपयोग करने से हम सुखी होते हैं। हमें निरपेक्ष आत्मविश्वास चाहिए जो हमेशा कायम रहता है। दो दिन, चार दिन वाला नहीं। आत्मविश्वास का मतलब है यह मैं कर सकता हूं।
ये लोग रहे मौजूद
इस अवसर पर डाइट बेमेतरा के वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक परस राम साहू, देवी प्रसाद चंदेश्वर, प्रहलाद कुमार टिकरिया, अनिल कुमार सोनी, जी एल खुटियारे, श्रद्धा तिवारी, कीर्ति घृतलहरे, अमिंदर भारतीय सहित डीएलएड प्रथम एवं द्वितीय वर्ष के छात्राध्यापक उपस्थित थे।









