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सुकमा जिले के सुदूर वनांचलों में अब शिक्षा का नया सूर्योदय हो रहा है। जंगलों की शांत फिज़ाओं के बीच आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की गूंज सुनाई देने लगी है।

लीलाधर राठी- सुकमा। जिले के सुदूर वनांचलों में अब शिक्षा का नया सूर्योदय हो रहा है। जंगलों की शांत फिज़ाओं के बीच आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की गूंज सुनाई देने लगी है। विष्णुदेव साय के ‘सशक्त छत्तीसगढ़’ विज़न को साकार करते हुए जिला प्रशासन ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के पोटाकेबिन (आवासीय विद्यालयों) में एआई आधारित शिक्षा की ऐतिहासिक शुरुआत की है। यह पहल नक्सल प्रभावित दूरस्थ वनांचल के बच्चों को डिजिटल युग की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध होगी।

शिक्षकों का होगा सशक्तिकरण 
कलेक्टर अमित कुमार के मार्गदर्शन में इस मिशन का शुभारंभ लाइवलीहुड कॉलेज, सुकमा से किया गया। शनिवार को आयोजित इस विशेष कार्यशाला में पोटाकेबिन विद्यालयों के शिक्षकों को अत्याधुनिक एआई टूल्स का व्यावहारिक एवं गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशासन का स्पष्ट मानना है जब शिक्षक तकनीक में दक्ष होंगे, तभी विद्यार्थी भविष्य की चुनौतियों का आत्मविश्वास से सामना कर पाएंगे। 

AI training is being given to teachers
शिक्षकों को दी जा रही एआई की ट्रेनिंग 

क्यों है यह पहल ऐतिहासिक?
महानगरों में उपलब्ध महंगे कोचिंग संसाधनों जैसी सुविधाएँ अब सुदूर अंचलों में निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। एआई के माध्यम से विद्यार्थियों में कोडिंग, लॉजिकल थिंकिंग और समस्या समाधान क्षमता का विकास किया जाएगा। डिजिटल क्रांति की ओर कदम बढ़ाकर नक्सलवाद के साये से निकलकर अब सुकमा का युवा ‘कर्सर’ और ‘कीबोर्ड’ के जरिए वैश्विक मंच से जुड़ेगा।

कलेक्टर ने दी जानकारी 
कलेक्टर अमित कुमार ने बताया कि हमारा लक्ष्य सुकमा के बच्चों को केवल साक्षर बनाना नहीं, बल्कि उन्हें ग्लोबल मार्केट के लिए ‘फ्यूचर रेडी’ बनाना है। एआई आधारित शिक्षा से जुड़कर बच्चों को नई नई तकनीकी जानकारी प्राप्त होगी और इनके लिए रोजगार के अनंत अवसरों के द्वार खोलेगी।

शिक्षा का बदलता स्वरूप
अब पोटाकेबिन विद्यालयों में पारंपरिक ब्लैकबोर्ड से आगे बढ़कर स्मार्ट लर्निंग मॉडल और स्मार्ट प्रोजेक्टर अपनाया जा रहा है। कठिन गणितीय गणनाएं हों या विज्ञान के जटिल सिद्धांत एआई टूल्स की सहायता से विद्यार्थी इन्हें सहज, रोचक और प्रयोगात्मक तरीके से समझ सकेंगे। यह पहल न केवल शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाएगी, बल्कि सुकमा को शिक्षा के एक नवाचारी मॉडल के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगी।

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