राजनांदगांव के सिंघोला स्थित भानेश्वरी मंदिर में नवरात्रि तिथि नहीं, वार के अनुसार मनाई जाती है। यहां पुरुष जंवारा बोते हैं और हर साल पूरे 9 दिन ही उत्सव होता है।

सचिन अग्रहरि- राजनांदगांव। देशभर में जहां नवरात्रि तिथि के अनुसार मनाई जाती है, वहीं छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव का एक मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के कारण चर्चा में है। सिंघोला स्थित भानेश्वरी देवी मंदिर में नवरात्रि की शुरुआत तिथि नहीं, बल्कि वार के आधार पर होती है। इतना ही नहीं, यहां पुरुष जंवारा बोते हैं और हर साल पूरे नौ दिन तक ही पर्व मनाया जाता है, चाहे तिथि घटे या बढ़े। यही अनोखी मान्यता इस मंदिर को खास बनाती है और दूर-दूर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

पुरुष बोते हैं जंवारा
जहां हर नवरात्र पर्व के अंतिम दिन विसर्जन के अवसर पर महिलाओं द्वारा जोत-जवारा बोया जाता है। वहीं सिंघोला के भानेश्वरी देवी मंदिर में पुरुषों द्वारा जंवारा बोने का काम किया जाता है। इस साल मंदिर में कुल 1029 मनोकामना ज्योत प्रज्वलित किए गए हैं। इनमें सिंघोला के साथ ही आसपास के ग्रामीण सहित महाराष्ट्र जैसे राज्यों के निवासी भी जोत रखवाते हैं। वहीं अष्टमी के अवसर पर माता भानेश्वरी को झूले में बिठाकर झुलाया जाता है। बताया गया कि मां जीवित रहते हुए झूले में झूलती थी, इसलिए साल नवरात्र पर्व के दौरान अष्टमी के अवसर पर ऐसा किया जाता है।

ऐसी है मंदिर की मान्यता
बताया जाता है कि गांव के एक मध्यम वर्गीय किसान सोमनाथ साहू के परिवार में 9 मई 1911 को भानुमति का जन्म हुआ। 12 वर्ष की उम्र में उसके शरीर में बड़े चेचक के दाने उमरने लगे। इसके बाद गांव के शीतला मंदिर में माता का पर्व मनाया गया। मंदिर में पहुंचने के बाद भानुमति अपने आप हंसने व रोने लगी। उन्होंने संकल्प लिया कि वह शीतला मंदिर में ही रहेंगी। आसपास के लोग भानुमति को माता मानने लगे। लोगों ने उन्हें भानेश्वरी माता का नाम दिया।

विशेष धार्मिक पर्व में मां मानेश्वरी कील के कांटो से बने पाटा पर बैठती थी। आज भी कील के कांटो वाला पाटा मंदिर परिसर में है। माता मानेश्वरी ने यहां तीन नवंबर 1975 में समाधि ली। इसके बाद यहां मुख्य मंदिर बनाया गया। मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के दुख माता की मभूति से दूर होते हैं।

गुरुवार को होता है विसर्जन
मंदिर समिति के अध्यक्ष नरेंद्र साहू ने बताया की मंदिर में नवरात्र का आयोजन ऐसे किया जाता है। जिससे नवमी यानी 9वां दिन सोमवार या गुरुवार को आए। यही कारण है कि इस बार गुरुवार की जगह बुधवार से नवरात्र की शुरुआत कर दी गई है। वहीं जहां देशभर में तिथि के घटने-बढ़ने से 8 या 10 दिन की नवरात्र होती है। इस मंदिर में हर साल 9 दिन की ही नवरात्रि मनाई जाती है।