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बिलासपुर। शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत दायर एक याचिका में कहा गया है कि, ईडब्ल्यूएस वाले बच्चे पास के निजी स्कूलों में निःशुल्क पढ़ाई के लिए पात्र हैं लेकिन उन्हें एडमिशन से वंचित कर दिया जाता है। नियमों में उलझाकर निजी स्कूल संचालक बच्चों को बाहर कर देते हैं जबकि आरटीई के प्रावधानों में साफ है कि जिसकी सालाना आय 3 लाख रुपए से कम है, वह ईडब्ल्यूएस के तहत मिलने वाले लाभ का पात्र होगा। हाईकोर्ट ने मामले में राज्य सरकार और निजी स्कूलों से दो सप्ताह में जानकारी मांगी है। एक मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों से दो सप्ताह में जानकारी मांगी है।
इसमें प्रत्येक निजी स्कूल को यह जानकारी देनी होगी की आरटीई के तहत आरक्षित 25 प्रतिशत सीटों पर पिछले सालों में कितने बच्चों को एडमिशन दी गई है और कितनी सीट खाली रह गई। इसके साथ ही खाली सीटों को ओपन आधार पर भरा गया तो उसके लिए क्या नियम अपनाए गए, इसकी जानकारी भी देनी होगी। शासन को भी इस संबंध में डाटा पेश करने कहा गया है। इसके साथ ही ईडब्ल्यूएस और बीपीएल कार्डधारियों की सीटों मामले में सुनवाई हुई, जिसमें बात सामने आई कि राज्य सरकार ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोटा कम कर दिया है।
ईडब्ल्यूएस के कोटे को बीपीएल कोटे में बदल दिया
एक-दूसरे मामले में सुनवाई हुई, जिसमें कहा गया कि राज्य सरकार ने ईडब्ल्यूएस वर्ग का कोटा कम कर दिया है जबकि यह केन्द्र का मामला है और राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। राज्य सरकार ने 2007 की सूची के आधार पर ईडब्ल्यूएस वर्ग कोटे को बीपीएल कोटे में बदल दिया है जो गलत है। याचिका में यह भी कहा गया कि केन्द्र का नियम है कि ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत वह माता पिता प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को दाखिला दिला सकते हैं जिनकी सालाना आय तीन लाख तक सीमित होती है जबकि राज्य सरकार ने इसे 40 हजार रुपए कर दिया है। इससे बहुत से पात्र लोग बाहर हो गए हैं।
बच्चे को पढ़ाई से रोका नहीं जा सकता
ये मामला 2012 से कोर्ट में चल रहा है। 2016 में हाईकोर्ट ने विस्तार से इस बारे में निर्देश जारी किया था लेकिन प्राइवेट स्कूलों ने उसे ठीक से लागू नहीं किया। इसी शिकायत को लेकर एडवोकेट देवर्षी ठाकुर ने फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस पर शासन ने दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने कहा है कि 6 से 14 आयु समूह के बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा बच्चों का अधिकार है। बच्चे को आर्थिक एवं सामाजिक आधार पर पढ़ाई से रोका नहीं जा सकता है।
पात्र बच्चों को किया जा रहा वंचित
याचिका में बताया गया कि, प्राइवेट स्कूलों में पहली कक्षा के नामांकन में 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब छात्रों को मुफ्त में नामांकन लेना है, एवं निशुल्क पढ़ाई कराना है। लेकिन गरीब बच्चों के नामांकन में प्राइवेट स्कूल के संचालकों की मनमानी जारी है। घर से 100 मीटर के दायरे में एडमिशन के नियम के आधार पर कई बच्चों को प्रवेश वंचित किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने मामले में कहा कि आरटीई अधिनियम के तहत पड़ोस के स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करना बच्चों का मौलिक अधिकार है। गरीब माता पिता भी अपने बच्चों को बच्चे को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने की इच्छा रखते हैं तो वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में नामांकन करा सकते हैं।
