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हरिभूमि-आईएनएच के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने वित्त मंत्री ओपी चौधरी से सार्थक संवाद की।

रायपुर।  छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने कहा है कि वित्तीय पैरामीटर्स पर फाइनेंशियल पैरामीटर्स पर अन्य राज्यों की तुलना करेंगे, तो हम बहुत अच्छी स्थिति में स्टैंड करते हैं। आप कांग्रेस शासित राज्यों को उठा लीजिए, चाहे हिमाचल प्रदेश हो, चाहे कर्नाटक हो, चाहे आम आदमी पार्टी का पंजाब हो, वहां पर तो ये हालात हैं कि कहीं पर एक तारीख को तनख्वाह नहीं मिल पा रहा है, 10-15 तारीख तक अलग-अलग टुकड़ों में कुछ लोगों को मिल रहा है।   हमारी वित्तीय स्थिति में हैं। हम ऋण ले रहे हैं लेकिन अपनी सीमा में। विकास के लिए ऋण लेना गलत नहीं है। श्री चौधरी ने यह बातें राज्य का वार्षिक बजट पेश करने के बाद सार्थक संवाद कार्यक्रम में हरिभूमि-आईएनएच के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी से चर्चा के दौरान कही है। उनसे हई बातचीत के मख्य अंश।

शुरुआत इसी बात से कि पहले ज्ञान, फिर गति, अब संकल्प। अमूमन संकल्प पहले होता है फिर ज्ञान और गति की बात आती है। आपने ज्ञान पहले लिया, गति को पहले पकड़ा, उसके बाद संकल्प ले रहे हैं। थोड़ा इसके संदर्भ में दृष्टि देंगे कि ये संकल्प की सोच इस बजट के संदर्भ में आपके जहन में कैसे आई?

ज्ञान, गति, संकल्प ये सभी जो केवल शब्द मात्र नहीं हैं, चाहे मानवीय जीवन हो, चाहे सामाजिक जीवन हो या एक राष्ट्र जीवन हो, उसमें अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बिंदु हैं। इनके जो डिटेलिंग हैं कि चाहे गरीब, युवा, अन्नदाता, नारी के रूप में 'ज्ञान' का या गुड गवर्नेस, एक्सेलरेटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल ग्रोथ के रूप में 'गति' का, इस तरह के जो की भावना है, जो इसके टर्म हैं, उससे पूरे कि किसी भी लोकतंत्र में समाज के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति के लिए हमको काम करना लोकतांत्रिक दायित्व है। मैं ये जरूर कहना चाहूंगा कि उसके साथ हमने रिफॉर्म की गाड़ी को बहुत तेजी से आगे बढ़ाया है। जैसे ही हमारी सरकार बनी ये विष्णुदेव साय जी के नेतृत्व में, हमने रिफॉर्म एक्सप्रेस को मोदी जी से प्रेरणा लेते हुए हमने तेजी से आगे बढ़ाने का काम किया, उसके कारण हमारी आय में भी अच्छी तरीके से वृद्धि हुई है। हमारी इकोनॉमिक ग्रोथ भी राष्ट्रीय औसत से लगातार हर साल दर साल हमारी सरकार आने के बाद भी बनी हुई है और इसके कारण से रेवेन्यू भी जनरेट हो रहा है। हम हमारे जीएसडीपी के 3 प्रतिशत के अंदर रखने में पूरी तरह से सफल हैं। और ऐसा है कि कोई भी राज्य कितना भी चाहे उतना लोन नहीं ले सकता है, उसकी सीमा है, उस सीमा का हम बखूबी पालन कर रहे हैं और हम 3 प्रतिशत जीएसडीपी के अंदर में ही लोन ले रहे हैं। और किसी भी एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए अधिकाधिक कैपिटल जुटाना भले ही वो ऋण से ही क्यों ना हो, वो जरूरी होता है और उसका बेहतर उपयोग करना उससे भी ज्यादा जरूरी होता है।

वित्तीय - फाइनेंसियल पैरामीटर्स पर हम बहुत अच्छी स्थिति में

आप कांग्रेस शासित राज्यों को उठा लीजिए, चाहे हिमाचल प्रदेश हो, चाहे कर्नाटक हो, चाहे आम आदमी पार्टी द्वारा चलाई जा रही पंजाब हो, वहां पर तो ये हालात हैं कि कहीं पर एक तारीख को तनख्वाह नहीं मिल पा रहा है, 10-15 तारीख तक अलग-अलग टुकड़ों में कुछ लोगों को मिल रहा है।

एक जो महत्वपूर्ण विषय पर ओपी भाई आपसे जानना है, वो है बस्तर के संदर्भ में। बस्तर के संदर्भ में लगभग हर राजनीतिक या सामाजिक मंच पर ये बात होती थी कि नक्सलवाद के चलते ये इलाका विकास की दृष्टि से पिछड़ा रह गया। जो काम बाकी राज्य में हुआ, इस इलाके में नहीं हो पा रहा था। अब जब अमित शाह के संकल्प के तहत, मोदी सरकार के संकल्प के तहत और आपकी कोशिशों के तहत भी अगर मानें, तो नक्सल मुक्ति के संदर्भ में संभावनाएं स्पष्ट दिख रही हैं। तो क्या आप इसके लिए वैसी राशि संदर्भ में संभावनाएं स्पष्ट दिख रही हैं। तो क्या आप इसके लिए वैसी राशि का प्रावधान कर पाए जो दशकों से विकास से पिछड़ा है, उसके लिए 50, 100, 200, 500 करोड़ से काम बन जाएगा या आप मानते हैं कि इसके लिए और राशि की जरूरत थी पर आपके हाथ तंग थे, आप उतनी राशि नहीं निकाल पाए? थोड़ा बताएंगे?

इस संदर्भ में हमने संकल्प की जो हमारी अवधारणा थी इस बजट में, उसमें एस का अर्थ समावेशी विकास है और समावेशी विकास की जब हम बात करते हैं तो समाज के आखिरी पंक्ति पर खड़े अंत्योदय जो लोग हैं, उनके विकास के साथ-साथ क्षेत्रीय असंतुलन कोई भी बन रहा हो दशकों से अगर बन रहा हो, तो उसको भी दूर करना समावेशी विकास का एक महत्वपूर्ण पैमाना हम मानकर इस बजट को तैयार किए हैं। और हमने सरगुजा अंचल और बस्तर अंचल पर विशेष जोर दिया है और पूरे बजट भाषण के शुरुआती आधा घंटा, 20-25 मिनट तक आपने सरगुजा और बस्तर से प्रावधानों को विस्तार से सुना भी होगा।

बार-बार आप सड़कों का जिक्र कर रहे हैं। ऐसा तो नहीं कि हम लोगों की सराहना के लिए घोषणाएं कर देते हैं, जमीन पर काम नहीं कर पाते? इस बार भी आपने लोक निर्माण विभाग को पीडब्ल्यूडी जिसे कहते हैं, तकरीबन 9 हजार 500 करोड़ से ज्यादा का प्रावधान करके बजट में दिया है। पिछली बार यह राशि तकरीबन 10 हजार करोड़ के रूप में थी। पर हमने फरवरी तक का आंकड़ा निकाला था, 10 हजार करोड़ के मुकाबले बामुश्किल 27 प्रतिशत राशि पीब्लुडी ने खर्च की है। फिर भी आप इस बार भी उदार हैं, 10 हजार करोड़ के करीब राशि दे रहे हैं। इसलिए दे रहे हैं कि खर्च तो यह करेंगे नहीं, तो डाल दो बजट में? या इस बार आपकी सरकार यह पैसा खर्च हो, सड़कें केवल प्रावधान में न रहें, पुल प्रावधान में न रहें, बिल्डिंग प्रावधान में न रहें, बल्कि जमीन पर दिखाई भी दे जाएं, इसके लिए भी कुछ कर रहे हैं?

 मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि जो कैपेक्स करने वाले हमारे विभाग हैं, उनमें कई समस्याएं वर्षों-दशकों से हैं। उसको हमारी सरकार अभी ठीक करने के लिए पूरा प्रयास कर रही है और इसमें तेजी से सुधार भी हो रहा है। और बहुत अच्छी-अच्छी चीजें लेकर के आ रहे हैं। चाहे कैपेक्स से संबंधित पीडब्लुडी विभाग हो, चाहे पीएचई विभाग हो, या इरिगेशन विभाग हो, या एनआरडीए हो, इन सब में भी हमने नए इंजीनियर्स की, नए लोगों की भर्ती के भी बहुत सारे परमिशन दिए हैं। अभी बहुत पिछले 6-8 महीने में बहुत सारे कामों के (प्रशासकीय स्वीकृति) विभाग ने लिए हैं और उससे टेंडर प्रक्रिया पूर्ण करके बहुत तेजी से काम होगा, इसको आप धरातल पर होता हुआ जरूर देखें।

हम राजस्व प्राप्ति की बात कर रहे थे, अभी जीएसटी रेवोल्यूशन हुआ देश में मोदी सरकार के द्वारा। बड़े स्तर पर जीएसटी दरों की कटौती की गई। जिस जीएसटी काउंसिल में यह फैसले लिए गए थे, उसका तो आप भी हिस्सा थे। अब वहाँ पर तो फैसले ले लिए गए पर उसका नुकसान राज्य को कितना हो रहा है? बतौर वित्त मंत्री छत्तीसगढ़, कितने बड़े नुकसान से आप गुजर रहे हैं जीएसटी की दरों में कटौती को लेकर, कमी को लेकर? या कुछ और है आंकड़ा? थोड़ा इस पर भी बताएंगे हमें?

सबसे पहले तो मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि 'नुकसान' शब्द जो है, टैक्स अगर कोई भी सरकार कम करती है, तो उससे नुकसान शब्द से मैं डिसएग्री (असहमत ) करता हूँ आर्थिक रूप से, अर्थव्यवस्था की दृष्टि से। ओवरऑल इकॉनमी में अगर हम कोई टैक्स इम्पोज करते हैं, तो जनता के जेब का पैसा सरकार के खजाने में आता है। और टैक्स की रेट में जैसे कमी करते हैं, जैसे जीएसटी 2.0 के माध्यम से नरेंद्र मोदी ने किया या 12 लाख रुपए तक इनकम टैक्स में जो छूट देने का जो प्रावधान किया, उससे सरकार के खजाने में पैसा न आकर लोगों के जेब में आता है। तो ओवर ऑल अर्थव्यवस्था में या तो सरकार के खजाने में पैसा रहता है या लोगों की जेब में पैसा रहता है।

जब आपने अपना पहला बजट दिया था, वह 1 लाख 37 हजार करोड़ का था। ओपी चौधरी जब दूसरा बजट लेकर आए, तो वह 1 लाख 65 हजार करोड़ का था। मतलब एक बड़ी उछाल बजट में देखने को मिली थी। लेकिन तीसरा बजट 1 लाख 65 हजार 1लाख 72 हजार करोड़ तक आया। तो कहाँ ठहर गए हम? कहाँ रुक गए? या कुछ और पहलू है जिसे आप हमारे साथ साझा करना चाहें?

मैं पहले बताना चाहूँगा कि जब कांग्रेस की सरकार गई थी, तो उन्होंने बहुत सारे जगहों में 'कचरा' छोड़ कर गए थे फाइनेंसियल दृष्टि से मैं कहूँ तो। तो चाहे पहले साल का बजट हो या दूसरे साल का बजट हो, उसमें बहुत सारा हमारा जो रिसोर्सेज है, बहुत सारे जो लोन लेने पड़े, जो भी रिसोर्सेज थे, वह उनके 'क्लीनिंग' में लग गए। चाहे मैं अलग-अलग जो संस्थान थे, चाहे मार्कफेड हो, चाहे नागरिक आपूर्ति निगम हो, चाहे छत्तीसगढ़ आयुष्मान भारत का पैसा हो, चाहे इलेक्ट्रसिटी बोर्ड का पैसा हो, रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का पैसा हो, पुलिस हाउसिंग बोर्ड का पैसा हो, यह छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड का पैसा हो-इन सबके अकाउंट्स में ये बड़े मात्रा में देनदारी या लोन छोड़ कर चले गए थे, जो सरकार के लिए ही काम किए थे ये संस्थान और ये संस्थान मृतप्राय होने की स्थिति में पहुँच गए थे। एक फिगर देना चाहूँगा मैं, 39 हजार करोड़ की देनदारी ये विभिन्न संस्थानों में छोड़ कर गए थे। यह लोन इतना लिए, उतना लिए की जो बातें करते हैं, उसमें 39 हजार करोड़ अकाउंटेड नहीं था, उस अकाउंट की क्लीनिंग में हमको पहले साल के बजट में, दूसरे साल के बजट में बहुत पैसा लगाना पड़ गया। और 1 लाख 72 हजार (करोड़) जो अभी पैसा आया है, उसमें हमने मैक्सिमम चीजों को क्लीन कर लिया है, इसलिए 1 लाख 72 हजार करोड़ का जो एक्चुअल इम्पैक्ट है-चाहे वह इंफ्रास्ट्रक्चर के पॉइंट ऑफ व्यू से हो या जनकल्याण के पॉइंट ऑफ व्यू से हो या हेल्थ, एजुकेशन में जो इनिशिएटिव हों या मुख्यमंत्री मिशन में आपने देखा होगा कि पाँच बड़े मिशन हमने लॉन्च किए- उन सब में हम ज्यादा अच्छे तरीके से खर्च कर पाएंगे। तो यह साइज उतना बढ़ा हुआ न दिख रहा हो, तो यह साइज उतना बढ़ा हुआ न दिख रहा हो, लेकिन बजट की जो गुणवत्ता है, जो 'क्वालिटी ऑफ बजट' है और 'क्वालिटी ऑफ एक्सपेंडिचर है, वह बहुत ही उत्कृष्ट श्रेणी की इस बजट में रहने वाली है।

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