पंकज गुप्ते- बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नगरीय निकायों में प्रमोशन से जुड़े अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सीएमओ (चीफ म्यूनिसिपल ऑफिसर) के पद पर पदोन्नति के नियमों को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दी है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि, राज्य सरकार को सेवा शर्तें तय करने, प्रमोशन के अवसर बनाने और पदों का समानीकरण करने का अधिकार है। इसमें न्यायालय सीमित हस्तक्षेप ही कर सकता है। दरअसल मामले में याचिकाकर्ता सीएमओ वर्ग-C अधिकारियों ने 2017 के नियमों के उस प्रावधान को चुनौती दी थी, जिसमें राजस्व निरीक्षकों को भी सीएमओ वर्ग-B पद के लिए प्रमोशन के लिए पात्र माना गया है। साथ ही 2 फरवरी 2018 के आदेश के जरिए एक साल की सेवा में दी गई छूट को भी असंवैधानिक बताया गया था।
प्रमोशन किसी कर्मचारी का मौलिक अधिकार नहीं है
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि, प्रमोशन किसी कर्मचारी का मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि केवल विचार किए जाने का अधिकार है। राज्य सरकार अपने कर्मचारियों के लिए प्रमोशन के रास्ते तय कर सकती है और अलग-अलग पदों को समान मानने का निर्णय भी उसका अधिकार क्षेत्र है, जब तक कि यह स्पष्ट रूप से मनमाना या असंवैधानिक न हो।
सरकार विशेष परिस्थितियों में पात्रता शर्तों में छूट दे सकती है
कोर्ट ने यह भी माना कि, नियमों में दी गई ‘रिलैक्सेशन पावर’ के तहत सरकार विशेष परिस्थितियों में पात्रता शर्तों में छूट दे सकती है और यह कदम प्रशासनिक आवश्यकता के तहत लिया गया था। ऐसे में इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता। अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम स्पष्ट रूप से असंवैधानिक हैं, इसलिए याचिका निराधार है और खारिज की जाती है।







