छत्तीसगढ़ के गांवों में इमली का लाटा बड़ा ही प्रसिद्ध है। खासतौर पर महिलाओं और लड़कियों को इसका स्वाद बहुत ही भाता है।

कुश अग्रवाल- बलौदा बाजार। छत्तीसगढ़ के गांवों में इमली के लाटा का स्वाद दशकों से लोगों की जुबान पर रहा है। पकी हुई इमली से बीज निकालकर उसमें नमक-मिर्ची और हल्दी मिलाकर पत्थर से कूटकर तैयार किया जाता है और फिर इसे बाँस की डंडी में लगाकर खाया जाता है। खट्टे-मीठे स्वाद से भरपूर यह पारंपरिक स्वाद आज भी लोगों के बचपन की यादें ताजा कर देता है।

इसी पारंपरिक स्वाद को बलौदा बाजार विकासखंड के ग्राम अर्जुनी निवासी राखी ध्रुव ने आजीविका का साधन बनाया है। उन्होंने बताया कि, उनकी सफलता की शुरुआत उस समय हुई जब वे रायपुर में अपने एक रिश्तेदार के घर गई थीं। वहां उन्होंने आसपास की महिलाओं को पारंपरिक तरीके से इमली लाटा बनाते देखा। इस काम में छिपी संभावनाओं को समझते हुए उन्होंने इसकी पूरी जानकारी ली और गांव लौटकर बिहान समूह से जुड़कर इसे व्यवसाय के रूप में शुरू किया।

भाटापारा से खरीदती हैं इमली
राखी ध्रुव अपने व्यवसाय के लिए कच्चे माल के रूप में इमली की खरीदी भाटापारा से करती हैं, जबकि उत्पाद की आकर्षक पैकिंग के लिए डिब्बे बिलासपुर से मंगवाती हैं। घर पर ही अन्य समूह की महिलाओं के सहयोग से इमली लाटा तैयार किया जाता है। मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने इस पारंपरिक उत्पाद को बाजार तक पहुंचाया है।

सालाना डेढ़ लाख की हो रही कमाई
वर्तमान में राखी ध्रुव इस कार्य से सालाना करीब डेढ़ लाख रुपये की आय अर्जित कर रही हैं। इससे न सिर्फ उनका परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रेरणा मिल रही है। वे बताती हैं कि अब आसपास के लोग उन्हें प्यार से “लखपति दीदी” कहकर बुलाते हैं, जिसे सुनकर उन्हें गर्व महसूस होता है। राखी ध्रुव के पति जलेश्वर ध्रुव गांव में टेलरिंग और जूते की दुकान चलाते हैं। राखी के मन में भी कुछ अलग करने की इच्छा थी और इमली लाटा ने उन्हें एक नई पहचान दिला दी।

सरकार को देती हैं सफलता का श्रेय
राखी अपनी सफलता का श्रेय केंद्र और राज्य सरकार की महिला सशक्तिकरण योजनाओं को देती हैं। उनका कहना है कि सरकार की योजनाओं और बिहान समूह के सहयोग से आज ग्रामीण महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। राखी ध्रुव की यह कहानी इस बात की मिसाल है कि, अगर परंपरा को नवाचार और मेहनत के साथ जोड़ा जाए तो वही पारंपरिक स्वाद न सिर्फ पहचान बन सकता है बल्कि आजीविका का मजबूत साधन भी बन सकता है।