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संसद का शीतकालीन सत्र: 543 सांसदों में से मात्र 35 ने ही किया विकास निधि का उपयोग, 508 में उदासीनता

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Jan 7 2019 11:13AM IST
संसद का शीतकालीन सत्र: 543 सांसदों में से मात्र 35 ने ही किया विकास निधि का उपयोग, 508 में उदासीनता

सांसदों की नीरसता के चलते सांसद निधि के फंड का इस्तेमाल न होना बेहद चिंता का विषय है। क्षेत्र के विकास के लिए प्रत्येक संसद सदस्य को करोड़ों की राशि प्रतिवर्ष आवंटित होती है, लेकिन खबर ये है कि अब ज्यादातर सदस्य उस धनराशि का प्रयोग ही नहीं कर पर रहे हैं। केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर सांसदों ने अपनी सांसद निधि का इस्तेमाल नहीं किया। लोकसभा के 543 सांसदों में से मात्र 35 सांसद ही अपनी विकास निधि का उपयोग कर पाए, अन्य 508 सांसदों ने विकास कार्यों में उदासीनता दिखाई।

जनता बड़ी उम्मीद के साथ अपने पसंद के जनप्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेजती है ताकि उनके क्षेत्र का विकास हो सके। सांख्यिकी रिपोर्ट के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि सांसद सिर्फ शान और शौकत के लिए सांसद बनते हैं। जीतने के बाद उनको क्षेत्र और जनता से कोई लेना-देना नहीं होता। ऐसे सांसदों पर भविष्य में चुनाव लड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए। जो नेता किसी काम का न हो उसे चुनने का क्या मतलब?

इस बार कई सांसद ऐसे रहे जो अपने क्षेत्रों में एकाध बार ही गए। रंगमंच की दुनिया से जुड़े सांसदों की तादाद ज्यादा है। दरअसल उनके पास अपने फील्ड का ही काम इतना होता है जिससे वह नेतागिरी में ज्यादा समय नहीं दे पाते। इस लिहाज से अनुमान लगा सकते हैं कि वह सांसद निधि को खर्च करने में समय कैसे निकालेंगे।

दरअसल ऐसे व्यक्तियों को संसद मंे भेजने का क्या फायदा जो इलाके का विकास ही न कर सके। जो सांसद धन होने के बाद भी नीरसता दिखाए उसे घोर लापरवाही ही कहेंगे। ऐसे व्यक्ति सिर्फ स्वार्थ और शौक के लिए ही सांसद बनते हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में जनता को सचेत रहने की जरूरत है। सूत्रों से पता चला है कि केंद्र सरकार में ऐसे सांसदों की एक लिस्ट तैयार हुई है जिसे सार्वजनिक किया जाना है।

प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी के ऐसे सांसदों के टिकट काटने की तैयारी में हैं। दूसरे सियासी दलों को भी ऐसा करना चाहिए। स्कूलों में जब कोई छात्र कम उपस्थित होता है तो उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाता है तो ठीक उसी तर्ज पर सांसदों की भी चुनाव लड़ने से बेदखली का कोई प्रावधान होना चाहिए। जनता के धन का दोहन करने वाले किसी भी व्यक्ति को नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसे गुनाह की श्रेणी में लाना चाहिए।

केंद्र सरकार के लिए केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट चिंतित करने जैसी है। इस रिपोर्ट के बाद गहन मनन-मंथन भी किया जा रहा है, लेकिन समाज में संदेश बहुत गलत जा रहा है। केंद्र सरकार की ओर से लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सदस्यों को अपने पूरे कार्यकाल में 21,125 करोड़ रुपये सांसद निधि के तौर पर खर्च करने के लिए आवंटित किए जाते हैं, लेकिन पिछले दस सालों से देखने को मिला है कि यह राशि खत्म नहीं हो सकी।

कुल राशि में करीब 12 हजार करोड़ रुपये अभी तक सरकारी सुस्ती के कारण सरकारी खजाने में सुरक्षित हैं। इस राशि को खर्च करने की सांसदों ने पहल ही नहीं की। इस मसले पर हाल ही में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने इस साल की सालाना समीक्षा बैठक कर गहरी चिंता जताई है। गौरतलब है कि वर्ष 1993 में जब प्रथमतः सांसद निधि का प्रावधान लागू किया गया था। तब भी विरोध हुआ था।

उस वक्त यह कहा गया था कि इससे भ्रष्टाचार में तब्दीली आएगी। वीरप्पा मोइली के नेतृत्व वाली प्रशासनिक सुधार समिति इस फंड को समाप्त करने की सिफारिश भी कर चुकी थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सांसद निधि की राशि एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ रुपये सालाना कर दी।

जिस सांसद निधि को पीवी नरसिम्हा राव ने एक करोड़, अटल बिहारी वाजपेयी ने दो करोड़ और डॉ. मनमोहन सिंह ने पांच करोड़ किया, उसी सांसद निधि के लिए कई सांसद मांग कर रहे हैं कि अब यह राशि पचास करोड़ रुपये कर दी जाना चाहिए, ताकि सांसद आदर्श-ग्राम योजना का क्रियान्वयन किंचित सुविधाजनक हो सके। सवाल उठता है जब मौजूदा फंड ही खर्च नहीं होता, तो फिर बढ़ाने का मतलब ही नहीं बनता।

दरकार इस बात की है कि इस फंड को सीधे अब केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यान्वयन मंत्रालय के अधीन कर देना चाहिए, जिस सांसद को जितना पैसा चाहिए उसे मांगपत्र के आधार पर मुहैया किया जाए। हालांकि सांसदों की राशि बढ़ाने की मांग को फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नकार दिया है। साथ ही फंड का इस्तेमाल न करने वाले सांसदों की समीक्षा करने का प्लान तैयार किया है।

ऐसा किया भी जाना चाहिए। क्योंकि जनता के नाम से आंवटित होने वाला धन जब उन तक पहुंचेगा ही नहीं तो भला उनका विकास कैसे होगा। पिछले दो दशकों से घोटालों के लिए कुख्यात हो चुकी सांसद निधि ने राजनीति और लोकतंत्र के विश्वास को दागदार कर दिया है। इसे नियंत्रित करना शायद अब किसी के लिए संभव नहीं रहा। इस फंड को खत्म करना ही मात्र विकल्प हो सकता है।

संसद का शीतसत्र चल रहा है। सत्र के प्रश्नकाल में सांसदी फंड पर भी चर्चा हुई, लेकिन ज्यादातर सांसद इस जंजाल में फंसे थे तो ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई इस मसले को, लेकिन यह विषय बहुत ही चिंतित करने वाला है। जनता को अब अपने सांसदों के संबंध में पूरा ब्योरा रखना चाहिए और जब मिले तो उनसे अपने मौलिक सवाल भी करने चाहिए।

लोकसभा में कुल 545 सांसद है जबकि राज्यसभा में 250 सदस्य होते हैं। क्षेत्र के विकास के लिए सांसद निधि के तहत सांसद को पांच करोड़ रुपये की सालाना दो किश्तें मिलती हैं। लोकसभा के सांसदों का कार्यकाल पांच साल का होता है जबकि राज्यसभा का 6 साल का होता है। इन सबका खाका सबके पास होना चाहिए।

पिछले दस सालों में देखने को मिला है कि करीबन सांसदों ने अपनी आवंटित राशि खत्म नहीं की। करीब 12,000 करोड़ रुपये ऐसे हैं जिनको सांसदों ने खर्च नहीं किया। यह पैसा जनता का है जो उन तक पहुंच ही नहीं सका। इसके लिए जिम्मेदार वह नाकाबिल सांसद हैं जिन्हें जनता ने धोखे से सदन में भेजा। हालांकि केंद्र सरकार पिछले सप्ताह ही सांसदों और राज्य सरकारों पर इस रकम को जल्द जल्द खर्च करने का दबाव बना रही है,

ताकि 2019 चुनावों से पहले विकास कार्यों का फायदा गरीब और जरूरतमंदों को हासिल हो सके। लोकसभा के सांसदों को 13625 करोड़ रुपये और राज्यसभा के सांसदों को 7500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। ऐसे में सांसद निधि के तहत विकास योजनाएं के लिए कुल 21125 करोड़ रुपये आंवटित हुए, जिनके जरिए क्षेत्र में विकास के जरूरी काम किए जाने थे। सभी कागजी साबित हुए। फंड का इस्तेमाल न करने वाले सांसदों को उनकी पार्टी की ओर से एक्शन लेना चाहिए। साथ ही उनको हिदायतें भी दी जाने चाहिए।


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