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15वीं लोकसभा, 33 फीसदी हंगामे और मात्र 40 विधेयक, शीत सत्र से उम्‍मीदें

संसद का शीताकालीन सत्र आज से शुरू हो रहा है। सत्र में कई अहम बि‍ल पास हो सके हैं।

15वीं लोकसभा, 33 फीसदी हंगामे और मात्र 40 विधेयक, शीत सत्र से उम्‍मीदें
देश में चुनावी माहौल को देखते हुए बृहस्पतिवार से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में केंद्र की यूपीए-2 सरकार अपने वादों से जुड़े प्रमुख विधेयकों को पास कराना की कवायद कर सकती है, वहीं विपक्षी दल हाल के मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास कर सकते हैं। जिस तरह से सत्र की रूप रेखा तैयार की गई है उससे तो यही आभास हो रहा है। वैसे भी यह सत्र खास है, क्योंकि लोकसभा चुनावों से पूर्व यह सत्र यूपीए सरकार के लिए अपने चुनावी एजेंडे को पूरा करने के अंतिम मौके के रूप में है, क्योंकि आगामी बजट सत्र में ऐसा करना मुश्किल होगा। हालांकि इस सत्र में मात्र 12 बैठकें (कामकाजी बैठकें इससे भी कम) होंगी और सरकार भी 40 विधेयकों की सूची तैयार कर रखी है, जिसमें लोकपाल, महिला आरक्षण, सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम, बीमा और सूचना अधिकार के दायरे से दलों को बाहर रखने संबंधी संशोधन विधेयक आदि प्रमुख हैं। वहीं महंगाई, यूपी में सांप्रदायिक हिंसा, सीबीआई दुरुपयोग और 2जी पर जेपीसी रिपोर्ट सहित करीब दो दर्जन मुद्दों पर चर्चा की जानी है। इतने कम दिनों में इतने महत्वपूर्ण कार्य तभी संपन्न होंगे जब सभी दल बिना हंगामे के सत्र को चलाने में अपना योगदान देंगे, हालांकि सत्र कितना फलदायी होगा यह तो वक्त ही बतायेगा, परंतु राजनीतिक गलियारों में विभिन्न मुद्दों व विधेयकों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों के बीच जिस तरह के मतभेद उभरे हैं, जिसकी एक बानगी मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी दिखी, उससे इस बात के कयास लगाये जा सकते हैं कि इस सत्र का क्या हर्श होगा। हंगामे का इंतजाम खुद सरकार ने भी कर रखा है, खासकर विवादित विधेयक पेश करने की इच्छा जताकर। लोकतंत्र का महत्व तीन डी से होता है, डिबेट (बहस), डिस्कशन (चर्चा), डिसेंट (विरोध) और फिर आखिर में डिसीजन (फैसला), लेकिन आज संसद में एक दीगर डी डिसरप्शन (सदन की कार्यवाही में बाधा) सबसे ज्यादा हावी है। ऊपर से अफसोस यह हैकि व्यवधान संसदीय कार्यवाही का हिस्सा बनता जा रहा है। संसद की प्रासंगिकता बहस और चर्चा की वजह से ही है। लिहाजा सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेवारी बनती है कि वे संसद में सभी जरूरी मुद्दों पर सार्थक चर्चा करें और नियमित रूप से बैठकों में भाग लें। 15वीं लोकसभा में हंगामे का प्रतिशत 33 फीसदी तक जा पहुंचा है, जो कि दुखद है। आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा में बैठकों की संख्या भी साल दर साल कम होती जा रही है। प्रथम लोकसभा ने हर साल अधिकतम 72 विधेयक पारित किये थे, लेकिन 15वीं लोकसभा में अब तक एक साल में अधिकतम 40 विधेयक ही पारित हो सके हैं। महत्वपूर्ण विधेयकों के समय से पारित नहीं होने के कारण देश आज आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक मोचरें पर पिछड़ गया है। बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसे मौसम में सत्तापक्ष व विपक्षी दल संयम का परिचय देंगे। संसद का सत्र बहुमूल्य होता है इसका अधिक से अधिक उपयोग होना चाहिए, जिससे जनता के पैसे का सार्थक सदुपयोग हो पायेगा और इस प्रकार से अंतत: लोकतंत्र की जड़ें गहरी होंगी।
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