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उमेश चतुर्वेदी का लेख: क्या बदले रुख पर कायम रहेगी कांग्रेस

जब पूरे देश के मंदिर विरोधी सेकुलर और वामपंथी बौद्धिकों की ब्रिगेड राममंदिर की बजाए अस्पताल होने, प्रधानमंत्री द्वारा राममंदिर के भूमिपूजन के जरिए देश के संविधान की शपथ के उल्लंघन का विरोध राग अलाप रहे थे, उसी वक्त प्रियंका के आए इस वक्तव्य ने हैरान कर दिया। नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कद के बरक्स प्रियंका और राहुल के कद को दक्षिण भारतीय राजनीति की शैली में कटआउट के तौर पर स्थापित करने की अहर्निश कोशिश में जुटे इन लोगों के लिए प्रियंका का यह दांव हैरत की ही बात रहा।

राम मंदिर के शिलान्यास के मौके पर बोले राहुल गांधी- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम सर्वोत्तम मानवीय गुणों का स्वरूप
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राहुल गांधी का फाइल फोटो।

उमेश चतुर्वेदी

हिंदू मान्यता में कहावत बहुप्रचलित है, हारे को हरिनाम, लगता है कि कांग्रेस को अब हरि यानी भगवान में ही सहारा नजर आने लगा है। उत्तर प्रदेश में चुनाव-दर-चुनाव मात खाती रही कांग्रेस की राज्य प्रभारी प्रियंका गांधी के पांच अगस्त के ट्वीट से तो यही लगता है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में बहुप्रतीक्षित राममंदिर के लिए भूमि पूजन करने लिए दिल्ली से लखनऊ के विमान में होंगे, 11 बजकर 33 मिनट पर उत्तर प्रदेश की कांग्रेस की प्रभारी प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया। प्रियंका ने लिखा, सरलता, साहस, संयम, त्याग, वचनवद्धता, दीनबंधु राम नाम का सार है। राम सबमें हैं, राम सबके साथ हैं। भगवान राम और माता सीता के संदेश और उनकी कृपा के साथ रामलला के मंदिर के भूमिपूजन का कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का अवसर बने।

जब पूरे देश के मंदिर विरोधी सेकुलर और वामपंथी बौद्धिकों की ब्रिगेड राममंदिर की बजाए अस्पताल होने, प्रधानमंत्री द्वारा राममंदिर के भूमिपूजन के जरिए देश के संविधान की शपथ के उल्लंघन का विरोध राग अलाप रहे थे, उसी वक्त प्रियंका के आए इस वक्तव्य ने हैरान कर दिया। नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कद के बरक्स प्रियंका और राहुल के कद को दक्षिण भारतीय राजनीति की शैली में कटआउट के तौर पर स्थापित करने की अहर्निश कोशिश में जुटे इन लोगों के लिए प्रियंका का यह दांव हैरत की ही बात रहा। अब उनके सामने चुनौती है कि अपने बौद्धिक संजाल रचने के लिए भाजपा नेतृत्व के बरक्स किस नेतृत्व को खड़ा कर पाएंगे? उन्हें अब कांग्रेस का नया रूख न तो उगलते बन रहा है और न ही निगलते।

हो सकता था कि राहुल गांधी या अखिलेश जैसे भाजपा विरोधी नेताओं के मुंह से राममंदिर के विरोध में कोई आवाज निकलती और भाजपा विरोधी और संविधान के कथित समर्थकों को कोई राजनीतिक आधार बनाने का बहाना मिलता, लेकिन इन दोनों नेताओं ने भी उन्हें निराश ही किया। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने लिखा, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम सर्वोत्तम मानवीय गुणों का स्वरूप हैं। वे हमारे गहराइयों में बसी मानवता की मूल भावना हैं। राम प्रेम हैं। वे कभी घृणा में प्रकट नहीं हो सकते। राम करुणा हैं, वे कभी क्रूरता में प्रकट नहीं हो सकते। राम न्याय हैं, वे कभी अन्याय में प्रकट नहीं हो सकते।

देश के उत्साही मानस की अभिव्यक्ति का दबाव रहा या कुछ और, मंदिर आंदोलनकारियों पर गोलीवर्षा के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश की भाजपा विरोधी राजनीति में स्थापित हुए समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेटे और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कुछ ऐसा ही सुर संधान शुरू कर दिया। उन्होंने ट्वीट किया, जय महादेव, जय सियाराम, जय राधे कृष्ण, जय हनुमान से शुरुआत करते हुए लिखा, भगवान शिव के कल्याण, श्रीराम के अभयत्व और श्रीकृष्ण के उन्मुक्त भाव से सब परिपूर्ण रहें। आशा है वर्तमान व भविष्य की पीढ़ियां भी मर्यादा पुरुषोत्तम के दिखाए मार्ग के अनुरूप सच्चे मन से सबकी भलाई व शांति के लिए मर्यादा का पालन करेंगी।

गौर से देखें तो प्रियंका और राहुल के साथ ही अखिलेश के बयानों में एक अंतर है। अखिलेश अपने बयान में शिव, श्रीकृष्ण और हनुमान को याद करके सिर्फ हिंदुत्ववादी लहर में शामिल होने की कोशिश ही नहीं करते, बल्कि वे हिंदू समाज में भी अपने जातीय आधार वोटबैंक मसलन यादवों, अति पिछड़ों और दलितों के एक हिस्से को जोड़ने की कोशिश करते नजर आते हैं। हाल के दिनों में हिंदुत्व के विराट को संकुचित करने की भी कोशिश हो रही है। शिव, श्रीकृष्ण और हनुमान को जातीय आधार पर केंद्रित करने और बांटने की कोशिश हो रही है। शिव को जहां वंचितों के देवता के तौर पर स्थापित किया जा रहा है, वहीं हनुमान को पिछड़ों और श्रीकृष्ण को यादवों का। हालांकि इस तरह के विभाजन की बौद्धिक कवायद कर रहे लोग भूल रहे हैं, कि हिंदुत्व में दरार डालने की उनकी कोशिश हिंदुत्व के विराट और उदार आधार के ही चलते नाकाम होगी। जिसका असर राममंदिर के प्रति व्यापक समर्थन के तौर पर नजर आ रहा है।

राममंदिर ही नहीं, हिंदुत्व के प्रतीकों से जुड़े मसलों पर कांग्रेस या तो उहापोह में नजर आती रही है या फिर वह अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करते नजर आती रही है। आजादी के फौरन बाद गुजरात के सोमनाथ मंदिर का पुनरूद्धार हो या फिर अयोध्या में राम मंदिर का मसला, कांग्रेस का हर बार ऐसा ही रूप सामने आया है। जब 1986 में आए प्रसिद्ध शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन प्रस्ताव राजीव सरकार ने संसद से पास कराया तो उस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का आरोप लगा। इस आरोप के बाद दबाव में आई राजीव सरकार ने 9 नवंबर 1989 को अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास होने दिया था, जिसे विश्व हिंदू परिषद ने कराया था। राममंदिर के चलते मुलायम सिंह को मुसलमानों में अपनी पैठ बनती नजर आई। उन्होंने राममंदिर को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा दी। नवंबर 1990 में तो कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश तक दे दिया। तब से वे उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय के हीरो बने ही हुए हैं।

शिलान्यास को छोड़ दें तो कांग्रेस का भी राममंदिर को लेकर यही रवैया रहा है। यही वजह है कि वह हिंदुओं के बड़े आधार वोट बैंक से दूर होती चली गई। हालांकि जब भी चुनाव आते हैं तो वह असमंजस में नजर आने लगती है। वह अल्पसंख्यकों को तो साथ रखने के लिए धर्मनिरपेक्षता के ऐसे-ऐसे कार्ड फेंकती है, जो हिंदुत्व की नजर में धर्म विरोधी होते हैं। लगे हाथों कांग्रेस मंदिरों और देवस्थानों का भी सहयोग हासिल करने की कोशिश करने लगती है।

कांग्रेस चूंकि राजनीतिक पार्टी है, इसलिए उसकी सोच में आ रहे ये बदलाव राजनीतिक ही माने जाएंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहता रहा है कि उसका उद्देश्य हिदू समाज को ताकतवर बनाना है। संघ को खुले तौर पर किसी दल से कभी परहेज नहीं रहा है। इसलिए वह खुश हो सकता है कि राममंदिर और हिंदुत्व की विरोधी रही कांग्रेस भी कम से कम राममंदिर के बहाने हिंदू समाज के साथ खड़ी हो रही है। कांग्रेस के सामने चुनौती भी है। उसका केरल में मुस्लिम लीग से समझौता है। मुस्लिम लीग कांग्रेस के रूख में दिख रहे इस बदलाव से नाराज है। मुस्लिम लीग ने एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें कहा गया, कांग्रेस सेक्युलर पार्टी है। हम प्रियंका गांधी सहित इसके कुछ नेताओं के बयानों से दु:खी हैं, जिन्हें हम अनुचित और गलत समय पर दिया गया मानते हैं। लीग ने अपने नेताओं से भी कहा है कि वे इस मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से अपनी राय न रखें। केरल में नौ महीने बाद चुनाव है, मुस्लिम लीग का रूख उसके लिए परेशानी का सबब बन गया है। देखना यह है कि उत्तर भारत में पैर जमाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस कितने वक्त तक इस रूख पर कायम रह पाती है या फिर अल्पसंख्यक के दबाव में झुक जाएगी, जिसकी कोशिश शुरू हो गई है।

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