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विवेक शुक्ला का लेख : बापू से क्यों डरता है पाकिस्तान

पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे पर आए 75 साल होने वाले हैं, पर वह नफरत के रास्ते पर बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान ने 31 प्रकाशकों की 100 किताबों को बैन कर दिया है। इनमें से कइयों में गांधी के विचारों को साफ किया गया है।

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महात्मा गांधी

विवेक शुक्ला

ये बात समझ से परे है कि पाकिस्तान का महात्मा गांधी को लेकर नफरत और भय का मिलाजुला भाव किसलिए है। पाकिस्तान ने उन पाठ्य पुस्तकों से महात्मा गांधी का नाम हटाने का फैसला किया है, जिनमें उनका किसी मसले पर मत दिया गया हो। ये पाकिस्तान के पंजाब सूबे की सरकार ने किया है। पंजाब पाकिस्तान का आबादी की दृष्टि से सबसे बड़ा सूबा है। क्या महात्मा गांधी ने पाकिस्तान को किसी भी रूप में नुकसान नहीं पहुंचाया? उन्होंने तो कभी किसी का अहित नहीं किया हालांकि कुछ ज्ञानी लोग ये नहीं मानते।

पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे पर आए 75 साल होने वाले हैं, पर वह नफरत के रास्ते पर बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान ने 31 प्रकाशकों की 100 किताबों को बैन कर दिया है। इनमें से कइयों में गांधी के विचारों को साफ किया गया है।

गांधी तो देश के बंटवारे के बाद लाहौर, रावलपिंडी और कराची जाना चाहते थे। वे पाकिस्तान जाकर एक इस तरह का संदेश देना चाहते थे कि हिंसक बंटवारे के बाद अब दोनों देश सौहार्दपूर्ण तरीके से रहें। क्या उन्होंने इस तरह से सोचकर बहुत बुरा किया था कि आज पाकिस्तान को उनके नाम से भी डर लगता है? क्या उन्होंने कभी मुसलमानों के साथ भेदभाव किया? उनके सबसे बड़े पुत्र हरिलाल ने इस्लाम स्वीकार किया तो उन्होंने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा था- 'चलो अब वह रास्ते पर आ जाएगा। छोड़ देगा बुरी आदतें।'

बेशक, गांधी बंटवारे से आहत थे। बंटवारे के क्रम में जिस तरह से मानवता मरी थी उससे वे अंदर तक हिल गए थे। उन्होंने पाकिस्तान जाने की इच्छा बिड़ला हाउस में 23 सितंबर, 1947 को प्रार्थना सभा में जाहिर की थी। गांधी जी ने कहा था 'मैं लाहौर जाना चाहता हूं। मैं पुलिस या सेना की सुरक्षा में वहां नहीं जाना चाहता। मुझे मुसलमानों और उनके मजहब पर विश्वास है। वे चाहें तो मुझे मार दें...। मुझे वहां पर जाने से कोई सरकार नहीं रोक सकती।' (महात्मा गांधी वांगम्य, खंड 96, 7 जुलाई, 1947 28 सितंबर, पेज संख्या 419)

दरअसल 23 सितंबर की प्रार्थना सभा बेहद खास थी। प्रार्धना सभा स्थल पर बापू आ गए थे। वहां सर्वधर्म सभा में कुरआन की आयतें भी पढ़ी जानी थी। दिल्ली में हुए भीषण दंगों के कारण वातावरण विषाक्त था। इस बीच, गांधी जी ने वहां उपस्थित लोगों से पूछा 'क्या किसी को कुरआन के पढ़े जाने पर आपति है?' जब सब चुप रहे तो कुरआन की आयतें पढ़ी गईं। उसके बाद गांधी जी बोले थे पाकिस्तान जाने के संबंध में।

हां, पाकिस्तान का बनना गांधी जी के विश्वास पर चोट थी। वे मानते थे कि भारत सबका है। इस भारत पर सभी धर्मों को मानने वालों का बराबर का हक है। ये राय उन्होंने हिन्द स्वराज में 1909 में ही लिख दी थी। (हिन्द स्वराज, नवजीवन, 1938. पेज 44)। वे पाकिस्तान जाने वाले मुसलमालों को 1947 में देश छोड़ने से रोक रहे थे। उन्होंने कुछ मुसलमानों को फटकार भी लगाई थी जो पाकिस्तान जाने पर आमादा थे।

अब जो मुल्क पैदा ही नफरत के कारण हुआ हो वहां से सुकून और बेहतर बात की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। उन्होंने गांधी को जाना-समझा-पढ़ा होता तो उनके दिमाग के बंद दरवाजे खुलते। चूंकि पाकिस्तान में इतिहास के साथ कसकर तोड़ मरोड़ की गई है, इसलिए उससे ये अपेक्षा करना ज्यादती ही होगा कि वे गांधी जी के व्यक्तित्व को समझें। पाकिस्तान को क्यों मालूम होगा कि गांधी ने 1947 में मुसलमानों के जान-माल की रक्षा के लिए अपने जीवन का अंतिम उपवास रखा था। बापू 9 सितंबर, 1947 को कोलकाता से दिल्ली के शाहदरा रेलवे स्टेशन पर उतरे थे। वहां पर देश के गृह मंत्री सरदार पटेल और स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने उनका स्वागत किया। गांधी जी को रेलवे स्टेशन पर ही सरदार पटेल ने बता दिया था कि दिल्ली जल रही है। इधर सांप्रदायिक दंगे भड़के हुए हैं। बापू ने तुरंत अपना पंजाब जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। शाहदरा से बिडला हाउस तक के सफर में गांधी जी ने जलती दिल्ली को देख लिया था। वे समझ गए थे कि यहां के हालात बेहद संवेदनशील हैं। महात्मा गांधी पूर्णाहुति चतुर्थ खंड के अनुसार, गांधी जी की गाड़ी बिडला हाउस पहुंची ही थी कि पंडित नेहरू आ गए। उनके मुख मंडल पर चिंता दिखाई देती थीं। शहर में चौबीस घंटे का कर्फ्यू लगा हुआ था। सेना बुला ली गई थी, परन्तु गोलियां चलना और लूटपाट पूरी तरह बंद नहीं हुई थी। सडकों पर लाशें बिछी हुईं थीं।

बापू दिल्ली आते ही दंगे रुकवाने में जुट गए। वे 1 4 सितंबर 1947 को ईदगाह और मोतिया खान जाते हैं। ये दोनों स्थान भी दंगों की आग में झुलसे थे। वे स्थानीय लोगों से शांति बनाए करने की अपील करते हैं। दोनों जगहों पर दोनों संप्रदायों के लोग उन्हें अपनी आपबीती सुनाते हैं। पाकिस्तान से अपना सब कुछ खोकर आए हिंदू और सिख शरणार्थी हैरान थे कि गांधी जी कह रहे हैं कि 'भारत में मुसलमानों को रहने का हक़ है।' इसी दौरान स्थानीय मुसलमान उनसे मिलने आ रहे हैं। उन्होंने रोते हुए अपनी आप दुखगाथा गांधी को सुनाई। गांधी जी उन्हें सांत्वना दी।

दिल्ली में जब दंगे रुक ही नहीं रहे थे, तब बापू ने 13 जनवरी, 1948 से अनिश्चितकालीन उपवास चालू करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने उपवास की घोषणा 12 जनवरी 1948 को की। उस दिन महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में एक लिखित भाषण पढ़कर सुनाया गया, क्योंकि गांधी ने मौन धारण कर रखा था। 'कोई भी इंसान जो पवित्र है, अपनी जान से ज्यादा कीमती चीज कुर्बान नहीं कर सकता। मैं आशा करता हूं कि मुझमें उपवास करने लायक पवित्रता हो। उपवास कल सुबह (मंगलवार) पहले खाने के बाद शुरू होगा। उपवास का अरसा अनिश्चित है। नमक या खट्टे नींबू के साथ या इन चीजों के बगैर पानी पीने की छूट मैं रखूंगा। तब मेरा उपवास छूटेगा जब मुझे यकीन हो जाएगा कि सब कौमों के दिल मिल गए हैं।' गांधी जी ने 13 जनवरी, 1948 को अपना आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके उपवास का चमत्कारी असर हुआ। दिल्ली में दंगे रुक गए। गांधी ने 18 सितंबर 1948 को अपना उपवास समाप्त कर दिया।

क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, जो अपने को इतिहास का विद्यार्थी कहते हैं, को पता है कि दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी गांधी जी के आशीर्वाद और सक्रिय सहयोग से बनी थी? क्या उनकी पंजाब सरकार को उपर्युक्त तमाम तथ्यों की जानकारी है? यकीनन नहीं होगी। अगर होती तो वे गांधी जी को अपना नायक नहीं मानते तो कम से कम उनका अनादर तो नहीं करते।

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