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कांग्रेस में किसके सिर फूटेगा हार का ठीकरा!

कांग्रेस में यह पुरानी परंपरा रही है कि जीत का श्रेय नेहरू-गांधी परिवार को जाता है और हार का दूसरों पर।

कांग्रेस में किसके सिर फूटेगा हार का ठीकरा!

नई दिल्‍ली.लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के पूर्व ही जिस तरह से पूरी कांग्रेस पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को बचाने में लगी हुई है, उससे तो एक बात साफ हैकि उसे भी संभावित पराजय का अहसास हो गया है। दरअसल, कांग्रेस में यह पुरानी परंपरा रही हैकि जीत का र्शेय नेहरू-गांधी परिवार को जाता है और हार का ठीकरा दूसरे नेताओं के सिर पर फूटता है। यह माना जा रहा हैकि शुक्रवार को वास्तविक नतीजे एग्जिट पोल की लाइन पर रहे तो कांग्रेस की ओर से यह कहा जाएगा कि पराजय के लिए कोई एक-दो व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी पार्टी जिम्मेदार है।

संभव है इसे डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार और कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के कामकाज से जोड़ा जाए। भले ही संभावित हार के लिए राहुल गांधी को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, परंतु इससे कैसे इंकार कर सकते हैं कि कांग्रेस ने उन्हीं के नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव लड़ा था। पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री के अघोषित उम्मीदवार भी वही थे। समूचा चुनाव अभियान उनके और उनकीटीम की अगुआई में चलाया गया था। केंद्रीय मंत्री कमलनाथ या अन्य दूसरे नेता भले ही उनके बचाव में यह बयान दें कि चूंकि राहुल सरकार का हिस्सा नहीं थे, यह सही भी है, परंतु देश यह भलीभांति जानता हैकि यूपीए सरकार में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की क्या हैसियत रही।

सभी जानते हैं कि दोनों यूपीए सरकार के फैसलों को प्रभावित करने में सक्षम थे और उन्होंने प्रभावित किया भी। सरकार द्वारा लाई गई कई सामाजिक योजनाओं का र्शेय राहुल गांधी को दिया गया। लोकपाल विधेयक को याद कर सकते हैं, जिसके संसद से पास होने के बाद कांग्रेसियों ने उसे राहुल का पसंदीदा विधेयक बताया था। यही नहीं कई अन्य बिलों को भी उनके विधेयक के रूप में प्रचार किया गया। हालांकि वे पास नहीं हो सके। वहीं दागियों के मुद्दे पर राहुल के कड़े रुख के बाद सकते में आई उस कांग्रेस पार्टी को भला कौन भूल सकता है।

कैबिनेट द्वारा लाए गये अध्यादेश को उन्होंने बकवास बता रद्दी की टोकरी में डालने वाला कह दियाथा। और उसके बाद जो सरकार अध्यादेश के पक्ष में तर्क दे रही थी वह राहुल की इच्छा को सर माथे पर लेने लगी। यहां तक कि प्रधानमंत्री भी उनको नजरअंदाज नहीं कर सके। लिहाजा, भले ही वे सरकार में नहीं थे, परंतु इससे साबित होता हैकि यूपीए सरकार में उनकी र्मजी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है। ऐसे में यह प्रश्न तो हर किसी के जेहन में उठेगा ही कि सरकार को सही दिशा देने में क्यों पीछे रह गये। कांग्रेस नेतृत्व की इन्हीं सब गलतियों का खामियाजा आज पार्टी को भुगतना पड़ रहा है।

सरकार पर उसकी अनावश्यक दखल और जनता से जुड़े मुद्दों पर चुप्पी उसमें से प्रमुख हैं। दबी जुबान में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी राहुल की टीम के कामकाज को इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार मान रहे हैं। उनका कहना हैकि राहुल की टीम की अनुभवहीनता, जमीनी राजनीति से दूरी और वरिष्ठ नेताओं से दूराग्रह ने ही पार्टी को इस हाल में पहुंचाया है।

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