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अवधेश कुमार का लेख : दिल्ली में उपद्रव के दोषी कौन

गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजधानी दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के नाम पर हुई हिंसा के कारण पूरे देश में क्षोभ का माहौल है। इनमें से कोई भी इस हिंसा के लिए स्वयं को दोषी मानने को तैयार नहीं है। अभी भी दिल्ली पुलिस और सरकार को निशाना बनाया जा रहा है। ये पंजाब के एक अभिनेता और एक दूसरे दूसरे नेता को इसके लिए दोषी ठहरा रहे हैं। वास्तव में यह सब अपनी जिम्मेदारी से बचने की धूर्ततापूर्ण रणनीति है। अगर कोई आंदोलन इस ढंग से हिंसा और अलगाववाद को अंजाम देने लगे तो उसकी जिम्मेदारी केवल उनकी नहीं होती जो ऐसा करते हैं बल्कि नेतृत्वकर्ताओं की ही जिम्मेदारी मानी जाती है। देश को शर्मसार करने का वातावरण बनाने का दोष आपके सिर जाएगा।

लाल किला बवाल मामले में राजद्रोह व यूएपीए का मामला दर्ज
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लाल किला 

अवधेश कुमार

निस्संदेह गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजधानी दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के नाम पर हुई हिंसा के कारण पूरे देश में क्षोभ का माहौल है। इनमें से कोई भी इस हिंसा के लिए स्वयं को दोषी मानने को तैयार नहीं है। अभी भी दिल्ली पुलिस और सरकार को निशाना बनाया जा रहा है। ये पंजाब के एक अभिनेता और एक दूसरे दूसरे नेता को इसके लिए दोषी ठहरा रहे हैं। वास्तव में यह सब अपनी जिम्मेदारी से बचने की धूर्ततापूर्ण रणनीति है।

पूरा देश जानता है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर ट्रैक्टर परेड न निकालने के लिए सरकार ने अपील की, दिल्ली पुलिस ने भी कई कारण बताए, बुद्धिजीवियों पत्रकारों ने तर्कों से ट्रैक्टर परेड को अनुचित करार दिया। बावजूद वे डटे रहे। दिल्ली पुलिस ने हिंसा और गड़बड़ी की आशंका भी जताई। ये टस से मस नहीं हुए, तो फिर हिंसा के लिए ये स्वयं को क्यों नहीं जिम्मेदार मानते? ध्यान रखने की बात है कि आंदोलनरत 37 संगठनों ने बाजाब्ता हस्ताक्षर करके पुलिस के सामने कुछ वादे किए थे, लेकिन सारे वादे टूटते नजर आए। आखिर परेड में शामिल होने वाले लोग पुलिस के साथ किए गए वादे का पालन करें इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी? जाहिर है, इन नेताओं ने प्राथमिक स्तर पर भी इसे सुनिश्चित करने की कोशिश नहीं की। ट्रैक्टर परेड में आने वाले लोगों को अगर ऐलान करके बताया जाता कि हमने ने पुलिस के साथ क्या-क्या वादे किए हैं और उन सब का पालन करना हमारे लिए जरूरी है तो संभव है स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती।

तीन जगह से ट्रैक्टर परेड निकलनी थी- गाजीपुर, सिंधु और टिकरी। तीनों जगह यही स्थिति थी। क्या इन नेताओं का दायित्व नहीं था कि वे तय समय का पालन करते और करवाते? गणतंत्र परेड का सम्मान करना और करवाना इनका दायित्व था। परिणाम हुआ कि गाजीपुर से निकलने वाले परेड के लोगों ने अक्षरधाम, पांडव नगर पहुंचते-पहुंचते स्थिति इतनी बिगाड़ दी कि पुलिस को आंसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े। उन्हें काफी समझाया गया कि अभी गणतंत्र दिवस परेड का समय है, आपकी परेड 12:00 से निकलनी है.. कृपया, अभी शांत रहें... जहां हैं वहीं रहें..। वे मानने को तैयार नहीं। इसमें पुलिस और सरकार कहां दोषी है? विडंबना देखिए किसान नेता आरोप लगा रहे हैं कि दिल्ली पुलिस ने उन मार्गों पर भी बैरिकेड्स लगा दिए जो ट्रैक्टर परेड के लिए निर्धारित थे।

राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के दिन परेड संपन्न होने तक अनेक रास्तों को पुलिस हमेशा बंद रखती है। उन पर बैरिकेड लगाए जाते हैं। जब तक परेड अपने गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच जाती ये बैरिकेड्स नहीं हटाए जाते। गणतंत्र दिवस परेड करीब 11:45 बजे खत्म हुई। उसके बाद ही किसानों का ट्रैक्टर परेड निकल सकती थी। ये पहले ही घुस गए और जगह-जगह से निर्धारित मार्गों को नकार कर दूसरे मार्गों पर भागने लगे। आखिर आईटीओ पर जबरन लुटियंस दिल्ली में घुसने की जिद करने का क्या कारण था? आईटीओ पर उधम मचाया गया। ट्रैक्टर ऐसे चल रहे थे मानो वह कोई तेज रफ्तार से चलने वाली कारें हों। ट्रैक्टरों को तेज दौड़ाकर पुलिस को खदेड़ा जा रहा था। भयभीत किया जा रहा था। क्या यही अनुशासन का पालन है?

ये जानते थे कि लाल किला तीनों स्थलों के निर्धारित मार्गो में कहीं नहीं आता था। भारी संख्या में लोग लाल किले तक पहुंचे। वहां अंदर घुसकर किस ढंग से खालसा पंथ का झंडा लगाया गया, किस तरह पुलिस वाले घायल हुए, कैसे लोगों को मारा पीटा गया, तलवारें भांजी गई यह सब देश ने देखा। इसे दोहराने की जरूरत नहीं है। गणतंत्र की झांकियों को भी नुकसान पहुंचाया गया। ये सारे कृत्य डरा रहे थे। गणतंत्र दिवस के अवसर पर ऐसा करने का क्या औचित्य हो सकता था? पूरा देश शर्मसार हुआ है। इस घटना से लाल किले की पवित्रता भी भंग हुई है। किंतु क्या इन सब की आशंका पहले से नहीं थी?

क्या पुलिस ने आगाह नहीं किया था? क्या मीडिया ने नहीं बताया था कि किसान आंदोलन के नाम पर अनेक खालिस्तानी समर्थक तत्व अपना एजेंडा चला रहे हैं? किसान नेता उल्टे कहते थे कि हमको तो खालिस्तानी कहा जा रहा है, देशद्रोही कहा जा रहा है। वे पूछते थे कि क्या हम खालिस्तानी समर्थक और देशद्रोही हैं? जो वास्तविक किसान संगठन, वास्तविक किसान नेता और वास्तविक किसान हैं उनको किसी ने खालिस्तानी या माओवादी या अराजक हिंसक नहीं कहा था, लेकिन ऐसे तत्व उसमें शामिल थे तो जो लोग इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं क्या उनको यह सब दिखाई नहीं पड़ रहा था? अगर दिखाई पड़ रहा था तो. इससे आंदोलन को अलग करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए? ट्रैक्टर परेड शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो, इसके लिए इन्होंने क्या पूर्व उपाय किए?

देश इन सारे प्रश्नों का उत्तर चाहता है। आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को देश को बताना चाहिए कि उन्होंने क्या-क्या कदम उठाए। सत्य यह है कि उन्होंने ऐसा कोई कदम उठाया ही नहीं तो बताएंगे क्या। वास्तव में निर्धारित समय और मार्गों का पालन न करने, बैरिकेड तोड़ने, पुलिस के साथ झड़प और अन्य गड़बड़ियों की शुरुआत सिंधु बॉर्डर से हुई, लेकिन कुछ ही समय में टिकरी और गाजीपुर सीमा से भी ऐसी ही तस्वीरें सामने आने लगी। किसान नेता तीनों मार्गों पर कहीं भी परेड में शामिल नहीं दिखे। जाहिर है, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा। वैसे भी अगर कोई आंदोलन इस ढंग से हिंसा और अलगाववाद को अंजाम देने लगे तो उसकी जिम्मेदारी केवल उनकी नहीं होती जो ऐसा करते हैं बल्कि नेतृत्वकर्ताओं की ही जिम्मेदारी मानी जाती है।

देश को शर्मसार करने का वातावरण बनाने का दोष आपके सिर जाएगा। कायदे से दिल्ली पुलिस को सबसे पहले इनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। समय की मांग है कि इस आंदोलन को तुरंत समाप्त किया जाए। देश में कृषि कानूनों का जितना समर्थन है उसकी तुलना में यह विरोध अत्यंत छोटा है। अगर कानून में दोष हैं तो उसके लिए सरकार ने स्पष्टीकरण देने और संशोधन करने की बात कही है। यही लोकतंत्र में शालीन तरीका होता है। दोनों पक्ष बातचीत करके बीच का रास्ता निकालते हैं, लेकिन इस आंदोलन को उस सीमा तक ले जाया गया जहां से बीच का रास्ता निकलने की गुंजाइश खत्म हो गई। सारे बयान भाषण भड़काने वाले थे। आंदोलन में शामिल वांछित -अवांछित सभी प्रकार के लोगों के अंदर गुस्सा पैदा करने वाले थे। इस तरह की हठधर्मिता और झूठ का परिणाम ऐसा ही होता है। किसान नेता अब देश से क्षमा मांगें तथा स्वयं को कानून के हवाले करें। ऐसा नहीं करते तो फिर कानूनी एजेंसियों को ऐसा करना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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