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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख: कब थमेगी यह अभद्रता

हमारे देश में छेड़खानी की घटनाओं को आज भी छोटी बात ही समझा जाता है, जबकि छेड़खानी से तंग आकर कितनी ही लड़कियां आत्महत्या तक लेती हैं। कई परिवार बेटियों की पढ़ाई छुड़वा देते हैं। छेड़खानी का प्रतिकार करने पर उपजी बदला लेने की भावना के चलते कई लड़कियों पर तेजाब फेंकने के मामले भी सामने आए हैं। जरूरी कि ऐसी शिकायतों को पहले कदम पर ही गंभीरता से लिया जाए ताकि आगे चलकर इनकी परिणति ऐसी जानलेवा घटनाओं के रूप में न हो।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख:  कब थमेगी यह अभद्रता
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डॉ. मोनिका शर्मा

हाल ही में गाजियाबाद में छेड़खानी का विरोध करने पर एक पत्रकार को गोली मार दी गई। रात को मोटरसाइकिल पर दो बेटियों के साथ जा रहे पत्रकार को कुछ लोगों ने रोका और मारपीट की। यह सब देख मासूम बच्चियां भी काफी डर गईं और भागने लगीं। बच्चियों ने रोते हुए मदद की गुहार लगाई पर कोई आगे नहीं आया। बदमाशों ने उनके पिता के सिर पर गोली मारकर उनकी जान ले ली। परिजनों का कहना है कि कुछ शरारती तत्व पत्रकार की भांजी के साथ छेड़छाड़ करते थे। इसकी शिकायत पहले थाने में भी की गई थी, लेकिन पुलिस ने वक्त रहते कोई कार्रवाई नहीं की। दुस्साहस की हद ही है कि बदमाशों की यह टोली पुलिस में उनके गलत रवैये की शिकायत किए जाने से नाराज थी। ऐसे में यह घटना न केवल कानून व्यवस्था की चिंतनीय स्थितियां सामने रखती है बल्कि छेड़छाड़ के दुर्व्यवहार को छोटी और सहज बात समझे जाने की सोच का आइना है। यह किसी छुपा नहीं कि हमारे यहां ऐसी अधिकतर शिकायतों की अनदेखी ही की जाती है। देखने में आता है कि शिकायत के बावजूद छेड़खानी की घटनाओं में समय पर कार्रवाई नहीं की जाती। यह लचरता अपराधियों का हौसला बढ़ाती है। कई बार नतीजा ऐसी जानलेवा घटना के रूप में सामने आता है।

इस मामले को लेकर सवाल उठता है कि कब तक छेड़छानी की हरकतों को मामूली बात समझकर अनदेखी की जाएगी? साथ ही समाज और परिवार के मोर्चे पर भी यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि यह सब किन घरों के लड़के हैं, जो इतनी हिमाकत करते हैं? साथ ही इंसानी सोच को लेकर भी सवाल उठता है कि कैसे इस आपदा के दौर में भी हमारे गली-मुहल्लों में छेड़खानी और विरोध करने पर जान ले लेने जैसा कुत्सित व्यवहार जारी है |

दरअसल, ऐसी घटनाएं हमारी सामाजिक-पारिवारिक और प्रशासनिक व्यवस्था की दुखद हकीकत से रूबरू करवाने वाली हैं। पारिवारिक मोर्चे पर रीत रहे समझ-संस्कार और सामाजिक पहलू पर समाज में आ रही भयावह गिरावट की स्थितियां सामने रखती हैं। इतना ही नहीं प्रशासनिक मोर्चे पर भी जो निराशाजनक हालात हैं, वे डराने वाले हैं। इस मामले में यह पुलिस-प्रशासन की नाकामी ही है कि शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि उल्टे इन असामजिक-आपराधिक तत्वों को शिकायत की जानकारी दी गई। यानी आपराधिक तत्वों को लेकर अगर किसी जागरूक परिवार द्वारा समय पर शिकायत दर्ज करवा दी जाए तो भी असुरक्षा और ऐसे जानलेवा हमले ही परिवारजनों के हिस्से आएंगे। अफसोस यह भी कई मामलों में अपराधियों के पकड़े जाने और पुख्ता सुबूत होने के बावजूद वे बच निकलते हैं। जिसके चलते ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है। स्कूल-कॉलेज आते-जाते आए दिन बेटियों के साथ दुर्व्यवहार के मामले सामने आते हैं। राह चलते उनसे छेड़छाड़ और अभद्र टिप्पणियां करना हमारे यहां आम बात है। छेड़खानी के कुत्सित व्यवहार को तो आम जिंदगी का हिस्सा मानकर ही स्वीकार कर लिया गया है। जबकि बदसलूकी और बदतमीजी का यह रवैया बेटियों का घर से बाहर निकलना बंद करवा देता है। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या उनके अपने भी इस बेहूदगी का विरोध न करें? पुलिस में इस कुत्सित बर्ताव की शिकायत न करें? अस्मिता को ठेस पहुंचाने वाले इस दुर्व्यवहार बेटियां और उनके परिवार चुपचाप सहते रहे? आखिर क्यों, किस लिए?

चिंतनीय है कि अभद्र हरकतों की शिकायत से क्रोधित बदमाशों का गाजियाबाद में पत्रकार की जान ले लेने का यह मामला आमजन को भयभीत और व्यथित करने वाला है। महानगरों से लेकर गांवों-कस्बों तक आम परिवारों और उनकी बेटियों की असुरक्षा और अपमानजनक हालात की स्थितियां सामने रखता है। विचारणीय यह भी है कि ऐसी जानलेवा घटनाएं अचनाक नहीं होतीं। प्रशासन की अनदेखी ही ऐसे बदमाशों की हिम्मत बढ़ाती है। इस मामले में भी पत्रकार ने खुद पर हुए हमले से चंद घंटे पहले भी पुलिस से सहायता मांगी थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। यही वजह है कि यह घटना पुलिस की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाती है। जनमानस में पुलिस-प्रशासन को लेकर रीत रहे भरोसे की बानगी है। आए दिन ऐसे मामले सामने आते हैं, जो बताते हैं कि छेड़छाड़ जैसे दुर्व्यवहार को लेकर आवाज उठाना भी बेटियों और उनके अपनों के लिए अपराध बना गया है। क्या उन्हें अपने प्रति हो रहे दुर्व्यवहार का विरोध करने का भी हक नहीं? कोई हैरानी नहीं कि आज भी कई परिवारों में लड़के उसी सोच के साथ बड़े हो रहे हैं जिसकी बानगी निर्भया के साथ क्रूरता करने वाले सोच में भी दिख चुकी है। गौरतलब है कि निर्भया के एक रेपिस्ट ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर निर्भया चुप रहती, प्रतिरोध नहीं करती तो उसकी जान नहीं जाती। कहना गलत नहीं होगा कि विचार और व्यवस्था, दोनों मोर्चों पर हमारे असुरक्षित परिवेश में बेटियों का जीवन हमेशा के आशंका से घिरा रहता है। शिक्षित होने और आत्मनिर्भरता के सपने देख रही बच्चियां और उनके परिवारजन हर पल इस भय से जूझते हैं कि जाने कब कोई दुर्घटना घट जाए? ऐसी घटनाओं का सबसे चिंतनीय पक्ष यह है कि जनमानस में असुरक्षा और भय का भाव जड़ें जमा लेता है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी महिलाओं से छेड़छाड़ को एक बड़ा अपराध बताते हुए सरकार से इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कड़ा कानून बनाने की बात कही जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक जब तक इस संबंध में कानून नहीं बनता, तब तक सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारें कुछ दिशानिर्देशों का पालन करें ताकि सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा तय हो। लेकिन हमारे देश में छेड़खानी की घटनाओं को आज भी छोटी बात ही समझा जाता है। जबकि छेड़खानी से तंग आकर हर साल कितनी ही लड़कियां आत्महत्या तक लेती हैं। कई परिवार बेटियों की पढ़ाई छुड़वा देते हैं। कम उम्र में उनकी शादी कर देते हैं। छेड़खानी का प्रतिकार करने पर उपजी बदला लेने की भावना के चलते कई लड़कियों पर तेजाब फेंकने के मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में जरूरी कि ऐसी शिकायतों को पहले कदम पर ही गंभीरता से लिया जाए ताकि आगे चलकर इनकी परिणति ऐसी जानलेवा घटनाओं के रूप में न हो और बेटियों को सुरक्षित और सम्मानजनक परिवेश मिले।

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