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जीएसटी का एक साल: ऐसा है टैक्स और जीएसटी का पूरा खेल

अप्रत्यक्ष कर के क्षेत्र में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) आजादी के बाद भारत का सबसे बड़ा टैक्स सुधार है। जीएसटी लागू होने से देश में अप्रत्यक्ष करों की जटिलता खत्म हुई है।

जीएसटी का एक साल: ऐसा है टैक्स और जीएसटी का पूरा खेल

अप्रत्यक्ष कर के क्षेत्र में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) आजादी के बाद भारत का सबसे बड़ा टैक्स सुधार है। जीएसटी लागू होने से देश में अप्रत्यक्ष करों की जटिलता खत्म हुई है। आज जबकि जीएसटी को एक साल हो गया है तो यह विवेचना जरूरी है कि वह कहां सफल रहा और कहां वह कमजोर रहा।

पहले अगर फायदे की बात करें तो जीएसटी को जो सबसे बड़ी उपलब्धि है वह यह कि टैक्स कलेक्शन बढ़ा है। न केवल अप्रत्यक्ष कर के रूप में बल्कि साइड इफेक्ट के तौर पर प्रत्यक्ष कर के रूप में भी। वित्त मंत्रालय के मुताबिक पिछली अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की तुलना में जीएसटी आने के बाद इनडायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में 21 फीसदी का इजाफा हुआ है।

वित्त वर्ष 2017-18 में जीएसटी कलेक्शन 10.06 लाख करोड़ रुपये रहे, जबकि वित्त वर्ष 2016-17 में अप्रत्यक्ष कर संग्रहण 8.63 लाख करोड़ रुपये था। प्रत्यक्ष कर संग्रह में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वित्त वर्ष 2017-18 में प्रत्यक्ष कर वसूली 10.02 लाख करोड़ रुपये हुई, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 8.5 लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई थी।

ये आंकड़े दर्शाते हैं कि जीएसटी के बाद डायरेक्ट व इनडायरेक्ट दोनों का टैक्स बेस बढ़ा है। यानी करदाता बढ़े हैं। जीएसटी से पहले इनडायरेक्ट टैक्स रेजीम में रजिस्टर्ड कारोबारियों की संख्या 64 लाख थी, जो अब बढ़कर 1.12 करोड़ हो गई है। ईपीएफओ सब्सक्राइबर बेस भी बढ़ा है। जीएसटी से देश ने एक राष्ट्र एक टैक्स की ओर मजबूती से कदम रखा है।

अब देश में कहीं भी सामान खरीदने पर एक समान टैक्स देना पड़ता है। जीएसटी ने प्रोडक्शन, सप्लाई चेन, स्टोरेज सहित पूरे प्रोडक्शन सिस्टम को दुरुस्त करके कारोबार के लिए ज्यादा कुशल बनने का रास्ता साफ हुआ है। जीएसटी से देश में सिंगल मार्केट विकसित हुई। अब राज्यों की सीमाओं पर चेकपोस्ट्स पर लगने वाली ट्रकों की लंबी-लंबी लाइनें खत्म हो गईं।

जीएसटी से महंगाई नहीं बढ़ी। पहले आशंका थी कि जीएसटी से महंगाई बढ़ सकती है, जैसा सिंगल टैक्स रेजीम लागू होने के बाद कई देशों में हो भी चुका है। एंटी प्रॉफीटियरिंग अथॉरिटी से मुनाफाखोरी रोकना भी आसान हो गया। इस एक साल में जीएसटी लागू करने की राह में मुश्किलें भी बनी रहीं।

सौ से अधिक बार बदलाव के लिए अधिसूचना जारी करनी पड़ी। जीएसटी रिजीम में कंप्लायंस प्रोसेस आसान नहीं हुआ। तकनीक खामियों के चलते कंप्लायंस प्रोसेस में लगने वाला समय खासा बढ़ गया। इनपुट टैक्स क्रेडिट की समस्या भी बनी हुई है। रजिस्ट्रेशन प्रोसेस की दिक्कतें अभी भी बनी हुई हैं।

कई मामलों में रजिस्ट्रेशन सभी राज्यों में कराना जरूरी है। सेस खत्म नहीं हुए बल्कि नए और लग गए। जीएसटी में लग्जरी और सिन गुड्स के लिए कम्पन्सेशन सेस पेश कर दिया गया। इसके दायरे में ऑटोमोबाइल्स गुड्स भी आ गए। रिफंड मेकैनिज्म की समस्या भी बनी हुई है। इससे छोटी इकाइयों को ज्यादा समस्या हुई है।

जीएसटी के लागू होने के एक साल बाद भी रिटेलर्स को रिफंड मिलना शुरू नहीं हुआ है। पेट्रोल, डीजल, प्राकृतिक गैस, शराब, विमान ईंधन, बिजली और रियल स्टेट अभी भी जीएसटी के दायरे से बाहर हैं। जीएसटी के एक साल में टैक्स में बढ़ोत्तरी, ईज ऑफ डूइंग, वन नेशन-वन टैक्स, आसान कंप्लायंस जैसे तमाम दावे पूरे नहीं हो सके हैं।

टैक्स स्ट्रक्चर में अभी तक बदलाव की बात हो रही है। जीएसटी के बाद भी कर चोरी की समस्या है। 28 फीसदी टैक्स स्लैब को समाप्त किए जाने की जरूरत है। यह सही है कि एक टैक्स स्लैब संभव नहीं है। जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है कि दूध और मर्सिडीज पर एक दर से टैक्स नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन वित्त मंत्री को जीएसटी में अपेक्षित सुधारों पर ध्यान देना चाहिए ताकि अप्रत्यक्ष टैक्स व्यवस्था और सरल बन सकें कर के हौव्वे को खत्म किया जा सके।

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