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विवेक शुक्ला का लेख: चीन को शिकस्त देगा भारत

हमारा फार्मा सेक्टर मूल रूप से जेनेरिक दवाओं पर आधारित है, इसलिए हमारे लिए चीन अति महत्वपूर्ण देश है। चीन में कोरोना वायरस फैलने की वजह से इन कंपनियों को सामान पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। इनका उत्पादन घट रहा है। भारत को खुद फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स बनाना होगा। ये स्थिति देर-सवेर खत्म होनी थी। अगर भारत अपना कच्चा माल खुद बनाने लगेगा तो वह चीन या किसी अन्य देश के रहमो करम पर नहीं रहेगा।

विवेक शुक्ला का लेख: चीन को शिकस्त देगा भारत

कोरोना संक्रमण के चलते भारत के फार्मा सेक्टर को सुनहरा अवसर मिला है। वह चाहे तो इसका लाभ लेकर हर साल अरबों डॉलर और भी कमा सकता है। इसके साथ ही लाखों युवाओं के लिए रोजगार के मौके भी पैदा हो सकते हैं।

पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से हाथ जोड़ने के अंदाज में मदद मांगी थी कि उनके देश को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाई की सप्लाई कर दें। मोदी ने ट्रंप का संकट के वक्त साथ देते हुए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा की सप्लाई करने का भरोसा दिया। पर याद रखिए कि इस तरह के मौके बहुत कम आते हैं।

हालांकि भारत का फार्मा सेक्टर हर साल भले ही देश-विदेश में अपने माल को बेचकर अरबों रुपये कमा रहा हो, पर ये भी सच है कि हमारी सभी सरकारी और निजी क्षेत्र की फार्मा कंपनियां अपनी जेनेरिक दवाओं को बनाने के लिए करीब 85 फीसदी एपीआई यानी कच्चा माल चीन से आयात करती है। भारत में एपीआई का उत्पादन बेहद कम है। भारतीय कंपनियां एपीआई के उत्पादन के लिए भी चीन पर निर्भर हैं। निश्चित रूप से ये आदर्श स्थिति तो नहीं मानी जा सकती। सिर्फ मुनाफा कमाने से ही कोई कंपनी महान नहीं हो जाती। फार्मा कंपनी की पहचान मोटे तौर पर इस आधार पर की जानी चाहिए कि वह कितनी नई जीवनरक्षक दवाओं को इजाद कर रही है। क्या इस मोर्चे पर हमारी कंपनियों का रिकॉर्ड गर्व करने लायक है?

पर हमें आगे बढ़ने से पहले ये जान लेना होगा कि जो फार्मा कंपनी किसी दवा को इजाद करती है, फिर एक निश्चित अवधि तक उस पर उसी का ही पेटेंट होता है। मतलब जिसने उस दवा को बनाया है वह ही उसे एक तय अवधि तक के लिए बाजार में बेच सकती है। पर शर्त ये है कि वह उन सभी मानकों का पालन करे जिनके चलते वह दवा बनी। उस दवा को कहते हैं जेनेरिक। ग्रेटर नोएडा की स्टार्ट अप फार्मा कंपनी रेडिको फार्मा लिमिटेड के निदेशक प्रशांत शर्मा मानते हैं कि कोरोना संकट ने भारत के फार्मा सेक्टर को अपनी क्षमताओं को नए सिरे से देखने समझने का मौका दिया है। वे भी मानते हैं कि हम एपीआई के लिए चीन पर अनिश्चितकाल तक के लिए आश्रित नहीं रह सकते।

भारत की फार्मा कंपनियां नई दवाओं को इजाद करने के लिए होने वाले रिसर्च पर कितना निवेश करती है? अंग्रेजी अखबार इकोनोमिक टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि भारत की पांच शिखर फार्मा कंपनियां हर साल 7 हजार करोड़ रुपये शोध पर खर्च कर रही हैं। इन कंपनियों में लुपिन और सिप्ला शामिल हैं। हालांकि इनके सालाना मुनाफे की तुलना में यह राशि कोई बहुत नहीं मानी जा सकती। एक बार लेखक ने रैनबैक्सी फार्मा के चेयरमैन मलविंदर सिंह से पूछा था कि उनकी कंपनी रिसर्च पर कितना निवेश करती है? इस सवाल को सुनते ही वे कहने लगे थे। हालांकि मलविंदर सिंह ने रैनबैक्सी को आगे चलकर जापान की फार्मा कंपनी दाइची को बेचकर मोटा लाभ कमाया था।

सिर्फ निजी क्षेत्र की कंपनियां ही नहीं, हमारे यहां हेल्थ सेक्टर की सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी तबाह होते रहे हैं। इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड की ही बात कर लें। इसकी स्थापना 1961 में की गई थी, जिसका प्राथमिक उद्देश्य जीवनरक्षक दवाओं में आत्मनिर्भरता हासिल करना था। इसने शुरुआती दौर में बेहतर काम भी किया पर फिर इसे करप्शन और इनोवेशन के अभाव में घाटा ही घाटा होने लगा। देश की चोटी की निजी क्षेत्र की फार्मा कंपनी डॉ.रेड्डीज़ लेबोरेटरीज के संस्थापक डा. के.ए. रेड्डी आईडीपीएल में काम करते थे। उन्होंने अपनी फार्मा कंपनी खोली और वे अब अरबों रुपये का कारोबार करती है। पर आईडीपीएल खत्म हो गई। क्या कोई इस सवाल का जवाब देगा? आईडीपीएल की बर्बादी के लिए कौन जिम्मेदार माना जाए? एक दौर में इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल लिमिटेड का फार्मा सेक्टर में बड़ा नाम और स्थान था। कुछ समय पहले मीडिया में खबर थी कि इसकी उत्तराखंड इकाई में एक समय हजारों कर्मी थे। वे घट कर चार रह गए।

चलिए आगे चलते हैं। अब प्राइवेट सेक्टर की प्रमुख कंपनियों की बात करते हैं। भारत की 10 बड़ी फार्मा कंपनियों, जिनमें ग्लैक्सोस्मिथ क्लाइन, टोरेंट फार्मा, कैडिला फर्मास्यूटिकल्स लिमिटेड, ग्लेनमार्क, सिप्ला, डॉ.रेड्डीज़ लेबोरेटरीज़, लूपिन, सन फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड, जेनेरिक दवाएं बनाने और उनके निर्यात करने के चलते अरबों रुपये कमाती हैं। फिर से बात आ गई जेनेरिक दवाओं की। इसलिए अब ये भी जान लेते हैं कि ब्रांडेड दवाएं किस तरह से जेनेरिक दवाओं से अलग होती हैं। इसे समझना जरूरी है। ये कुछ इसी तरह की बात हुई कि दिल्ली के गांधी नगर इलाके में जींस के दर्जनों थोक विक्रेता है। इनसे कनॉट प्लेस की मशहूर रेडीमेड गारमेंट की दुकान स्नोव्हाइट भी माल खरीदती है और सहारनपुर का कोई कपड़े का व्यापारी भी। स्नोव्हाइट अपने माल को बेहतर पैकिंग के साथ बेचता है, उसके लिए विज्ञापन पर मोटा खर्च भी करता है, पर सहारनुपर वाला व्यापारी गांधी नगर से जींस की खेप को लेकर उसे सीधे अपनी दुकान में बेचने के लिए रख देता है। बस मोटा- मोटी यही अंतर होता है ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं में। दिल्ली के भगीरथी पैलेस में जेनेरिक दवाएं थोक के भाव से मिल रही हैं। उधर, बड़ी फार्मा कंपनियों के मार्केटिंग अधिकारी डाक्टरों को समझाते रहते हैं कि वे उनकी कंपनी की तरफ से उत्पादित दवाई को रोगियों को खरीदने के लिए कहें। आरोप लगते हैं कि ये बड़ी कंपनियां डाक्टरों को उपकृत करने के लिए कई तरह के प्रलोभन भी देती हैं।

चूंकि हमारा फार्मा सेक्टर मूल रूप से जेनेरिक दवाओं पर आधारित है, इसलिए हमारे लिए चीन अति महत्वपूर्ण देश है। चीन में कोरोना वायरस फैलने की वजह से इन कंपनियों को सामान पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा है। इनका उत्पादन घट रहा है। तो मौजूदा संकट का हल और भविष्य की संभावनाएं कहा है? दिल्ली के अपोलो अस्पताल के प्लास्टिक सर्जन और लेखक डा. अनूप धीर कहते हैं कि भारत को खुद फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स बनाना होगा। ये स्थिति देर-सवेर खत्म होनी थी। अगर भारत अपना कच्चा माल खुद बनाने लगेगा तो वह चीन या किसी अन्य देश के रहमो करम पर नहीं रहेगा। इस बीच,भारत सरकार के वाणिज्य विभाग से मान्यता और समर्थन प्राप्त ट्रेड प्रोमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया की एक

रिपोर्ट का कहना है कि साल 2018-19 में भारत से दवाओं का अनुमानित निर्यात 19.14 अरब डॉलर का था। ये बहुत प्रभावशाली आंकड़ा है। इसमें और भी सुधार हो सकता है कि अगर हम खुद अपने यहां कच्चे माल को तैयार करने लगे। ये संभव है। एक बार हम तय तो कर लें। भारत को इस अनुपम अवसर को गंवाना नहीं चाहिए।

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