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डॉ. पवन सिंह मलिक का लेख : स्वतंत्रता के प्रहरी वीर सावरकर

सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली, सजा को पूरा किया और फिर से राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गए। वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को दो-दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। वे पहले भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। वे पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज सरकार ने वापस ले लिया। आइए, आज वीर सावरकर जयंती प्रसंग पर उस हुतात्मा से अभिभूत होकर, उनके जीवन मूल्यों को अपने आचरण द्वारा सत्य प्रमाणित करने का संकल्प करें।

डॉ. पवन सिंह मलिक का लेख : स्वतंत्रता के प्रहरी वीर सावरकर
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डॉ. पवन सिंह मलिक

डॉ. पवन सिंह मलिक

आज विश्वभर में जिस प्रकार का एक बौद्धिक विमर्श दिखाई दे रहा है। जहां सभी अपने विचारों की श्रेष्ठता के आधार पर सब को जीत लेना चाहते हैं। जहां केवल मैं सबसे बेहतर हूं, यह सिद्ध करने की होड़ लगी है। ऐसे में केवल भारत ही वह पुण्यभूमि है जो विश्व के लिए पथ प्रदर्शक के रूप में मार्ग प्रशस्त कर सकती है, क्योंकि हम 'कृण्वन्तो विश्वर्मायम' के विचार पर चलने वाले लोग हैं और हमारे यहां तो कहा भी जाता है कि यहां दीप नहीं, जीवन जलते हैं'। ऐसे जीवन जो स्वयं स्वाह हो गए, लेकिन देशभक्ति, विचारों व आदर्श व्यवहारों की इतनी लंबी श्रृंखला छोड़ गए हैं जो प्रत्येक भारतवासी के लिए नित नई प्रेरणा व ऊर्जा का कार्य करती हैं। ऐसा ही एक श्रेष्ठ व प्रेरक जीवन रहा है विनायक दामोदर वीर सावरकर का। अपने महापुरुषों का स्मरण व सदैव उनके गुणों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते रहना, यही भारत की श्रेष्ठ परंपरा है। ऐसे ही अनुकरणीय जीवन को याद करने का दिन है सावरकर जयंती।

क्या मैं अब अपनी प्यारी मातृभूमि के पुनः दर्शन कर सकूंगा? 4 जुलाई 1911 में अंडमान के सेलुलर जेल में पहुंचने से पहले सावरकर के मन की व्यथा शायद कुछ ऐसी ही रही होगी। अंडमान की उस काल कोठरी में सावरकर को न जाने कितनी ही शारीरिक यातनाएं सहनी पड़ी, इनको शब्दों में बता पाना असंभव है। अनेक वर्षों तक रस्सी कूटना, कोल्हू में बैल की तरह जुतकर तेल निकालना, हाथों में हथकड़ियां पहने हुए घंटों टंगे रहना, महीनों एकांत काल-कोठरी में रहना और भी न जाने किस-किस प्रकार के असहनीय कष्ट झेलने पड़े होंगे सावरकर को, लेकिन ये शारीरिक कष्ट भी कभी उस अदम्य साहस का पर्याय बन चुके विनायक सावरकर को प्रभावित न कर सके। कारावास में रहते हुए भी सावरकर सदा सक्रिय बने रहे। कभी वो राजबंदियों के विषय में आंदोलन करते, कभी पत्र द्वारा अपने भाई को आंदोलन की प्रेरणा देते, कभी अपनी सजाएं समाप्त कर स्वदेश लौटने वाले क्रांतिवीरों को अपनी कविताएं व संदेश कंठस्थ करवाते। सावरकर सदैव अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर दिखाई दिए। उनकी अनेक कविताएं व लेख अंडमान की उन दीवारों को लांघ कर 600 मील की दूरी पार करके भारत पहुंचते रहे और जनता में देशभक्ति जगाते रहे। स्वातंत्र्य विनायक दामोदर सावरकर केवल नाम नहीं, एक प्रेरणा पुंज है। जो आज भी देशभक्ति के पथ पर चलने वाले मतवालों के लिए जितने प्रासंगिक हैं उतने ही प्रेरणादायी। सावरकर अदम्य साहस, इस मातृभूमि के प्रति निश्छल प्रेम करने वाले व स्वाधीनता के लिए प्राण न्योछावर करने वाला नाम है। इंग्लैंड में भारतीय स्वाधीनता हेतु अथक प्रवास, बंदी होने पर भी अथाह समुद्र में छलांग लगाने का अनोखा साहस, कोल्हू में बैल की भांति जोते जाने पर भी प्रसन्नता, देश के लिए परिवार की भी बाजी लगा देना, प्रतिपल स्वाधीनता का चिंतन व मनन, ऐसा अद्भुत व्यक्तित्व था विनायक सावरकर का। सावरकर ने अपने नजरबंदी समय में अंग्रेजी व मराठी अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की, जिसमें मैजिनी, 1857 स्वातंत्र्य समर, मेरी कारावास कहानी, हिंदुत्व आदि प्रमुख है।

सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली, सजा को पूरा किया और फिर से राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गए। वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को दो-दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। सावरकर पहले ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। वे पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज सरकार ने वापस ले लिया। वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। वीर सावरकर ने राष्ट्र ध्वज तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम दिया था, जिसे तात्कालिक राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने माना। उन्होंने ही सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया। वे ऐसे प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुंचा। वे पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया तथा बंदी जीवन समाप्त होते ही जिन्होंने अस्पृश्यता आदि कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंडमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएं लिखी और फिर उन्हें याद किया। इस प्रकार याद की हुई दस हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद पुनः लिखा।

वर्ष 1921 में सावरकर को अंडमान से कलकत्ता बुलाना पड़ा। वहां उन्हें रत्नागिरी जेल भेज दिया गया। 1924 को सावरकर को जेल से मुक्त कर रत्नागिरी में ही स्थानबद्ध कर दिया गया। इसी समय में सावरकर ने हिंदू संगठन व समरसता का कार्य शुरू कर दिया। महाराष्ट्र के इस प्रदेश में छुआछूत को लेकर घूम-घूमकर विभिन्न स्थानों पर व्याख्यान देकर धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टि से छुआछूत को हटाने की आवश्यकता बताई। सावरकर के प्रेरणादायी व्याख्यान से लोग उनके साथ हो लिए। वास्तव में अगर भारत को समझना है तो सावरकर को समझना होगा, क्योंकि वीर सावरकर ने भारत बोध व को अपने जीवन में न केवल आत्मसात किया बल्कि उसे प्रतिपल जिया भी। सावरकर का जीवन आज भी युवाओं में प्रेरणा भरता है। विनायक की वाणी में प्रेरक ऊर्जा थी। उसमें दूसरों का जीवन बदलने की शक्ति थी। विनायक के विचारों से प्रभावित असंख्य युवाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ गया। जो उदास तथा आलसी थे, वे उद्यमी हो गए। जो संकुचित और स्वार्थी थे, वो परोपकारी हो गए। जो केवल अपने परिवार में डूबे हुए थे, वे देश-धर्म के संबंध में विचार करने लगे। इस प्रकार हम कह सकते है कि युवाओं के लिए सावरकर वो पारस पत्थर थे, कि जो भी उनके संपर्क में आया वो ही इस मातृभूमि की सेवा में लग गया। सावरकर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए व उसके बाद भी उसकी रक्षा हेतु प्रयास करते रहे, इसलिए उनका नाम 'स्वातंत्र्य सावरकर' अमर हुआ।

आज जब पूरा विश्व आशा भरी दृष्टि से भारत की ओर देख रहा है, ऐसे में हमारा दायित्व अधिक होने वाला है। 138 करोड़ भारतवासियों को विश्वगुरु के उत्तरदायित्व को निभाना होगा। अपना आचार, विचार व व्यवहार उसी के अनुरूप करना होगा। ऐसा करते हुए कुछ राष्ट्रविरोधी ताकतों का भी सामना करना पड़ेगा, ऐसी भी तैयारी रहे। तो आइए, आज वीर सावरकर जयंती प्रसंग पर उस हुतात्मा से अभिभूत होकर, उनके जीवन मूल्यों को अपने आचरण द्वारा सत्य प्रमाणित करने का संकल्प करें, क्योंकि जब हम सबल होंगे, आचरण शील होंगे, तभी हमारे शांति संदेशों को कोई सुनेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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