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सुरेश पचौरी का लेख : अदूरदर्शिता से बिगड़े हालात

आज देश में हालात बद से बदतर हो रहे हैं। देश मेडिकल इमरजेंसी के दौर से गुजर रहा है। देश और मध्यप्रदेश की सरकार ने इस बात को नजरअंदाज किया कि मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर कैंसे सुधारा जाए। इकाॅनामिक पैकेज के जरिए वंचित वर्ग को मदद पहुंचाने की बजाए प्रदेश सरकार, समाचार पत्रों की, प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रानिक मीडिया की हेडलाइन मैनेजमेंट में लगी रही। मध्यप्रदेश सरकार ने समस्या के समाधान के लिए गैरसरकारी रिटायर्ड मेडिकल विशेषज्ञ, जिनके पास असीम अनुभव है, से मदद लेने का कोई प्रयास नहीं किया।

सुरेश पचौरी का लेख : अदूरदर्शिता से बिगड़े हालात
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सुरेश पचौरी

सुरेश पचौरी

देश में कोराना की दूसरी लहर कहर ढा रही है। कोरोना बीमारों की बढ़ती संख्या और मौतों का बढ़ता आंकड़ा भयावह है। सरकार सच्चाई छिपा रही है और जनता सच्चाई बता रही है। कोरोना ने देश हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर की बदहाली को बेनकाब कर दिया है। हकीकत यह है कि देश में अस्पतालों में पर्याप्त आॅक्सीजन नहीं है, बेड नहीं हंै, रेमडेसीविर इंजेक्शन नहीं हैं, वेंटिलेटर नहीं हैं एवं सक्रंमित मरीजों के लिए समुचित चिकित्सा सुविधा नहीं हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि देश में कोरोना संक्रमण की पहली लहर को आए लगभग एक साल हो गया, लेकिन केन्द्र सरकार ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए कोई सुविचारित, स्पष्ट और दूरगामी कार्ययोजना नहीं बनाई। नतीजा सामने है।

कोरोना संक्रमण की शुरूआत में विश्व स्वास्थ्य संगठन, मेडिकल विशेषज्ञों एवं शीर्ष मीडिया के लोगों ने केन्द्र सरकार को इसके भयावह परिणाम के बारे में बताया था। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने फरवरी 2020 में कोरोना संकट को लेकर प्रधानमंत्री को आगाह किया था एवं कोविड के प्रभावी प्रबंधन की अपेक्षा की थी, लेकिन भाजपा सरकार कोविड प्रबंधन के बजाय चुनाव प्रबंधन में लगी रही। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहन सिंह ने कोरोना से हो रही तबाही का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र द्वारा सकारात्मक सुझाव दिये थे। अफसोस है कि इन सबकी बातों की अनदेखी की गई। काश! तब सुन लिया होता। सरकार यदि समय रहते कोई निर्णायक कदम उठा लेती तो आज देश में स्थिति इतनी विकराल नहीं होती।अब वक्त आ गया है कि लोगों को स्वास्थ्य सेवा बतौर सुविधा नहीं बल्कि अधिकार की तरह दिया जाए।आपदा की घड़ी में हमने अमेरिका, रूस, इंग्लैड, सिंगापुर एवं अरब आदि देशों से बहुत देर बाद मदद ली, दुनिया के ये देश भारत को आॅक्सीजन, वैक्सीन, वेंटीलेटर, व जीवन रक्षक दवाइयां मुहैया करा रहे हैं। यह मदद हम पहले भी ले सकते थे। केन्द्र सरकार ने वाहवाही पाने की ललक में अपने देश की जरूरत की परवाह किये बगैर 76 देशों में 6 करोड़ टीके भेजने का अदूरदर्शी निर्णय लिया। यह सरकार की सबसे बड़ी विफलता है कि दुनिया का अग्रणी टीका निर्माता देश अपने यहां टीके की कमी पूरा करने के लिए अब दूसरे देशों से टीका आयात करने के लिए मजबूर है।

मध्यप्रदेश सरकार ने केन्द्र सरकार से बात करके मेडिकल आॅक्सीजन, रेमडेसिविर इंजेक्शन आदि का इंतजाम किया है। देर आए, दुरूस्त आए। लेकिन जो संजीदा सवाल हैं, उनके जवाब कौन देगा? दुर्भाग्यवश कोरोना सक्रंमित मरीजों के मामलें में हमारा देश शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है। समुचित दवाओं के अभाव में लोग मर रहे हैं? लेकिन नकली रेमडेसीविर इंजेक्शन बनाने वाले और नकली प्लाज्मा बनाने वाले चंद सिक्कों की खातिर इंसानियत को शर्मसार कर रहे हैं। दवाइयों की ब्लैक मार्केटिंग हो रही है और जीवन रक्षक इंजेक्शनों की चोरी हो रही है। इसके बावजूद भी मध्यप्रदेश की सरकार का यह संदेश कि "आॅल इज वेल" सचमुच चैंकाने वाला है। देश में कोरोना संकट लगभग एक साल से है। इस संकट पर हमें केन्द्र सरकार की तैयारी, पाॅलिटिकल सिस्टम की जवाबदेही पर मानवीय संवेदनाओं की दृष्टि से विचार करना होगा। आज देश में हालात बद से बदतर हो रहे हैं। देश मेडिकल इमरजेंसी के दौर से गुजर रहा है। देश और मध्यप्रदेश की सरकार ने इस बात को नजरअंदाज किया कि मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर कैंसे सुधारा जाए। इकाॅनामिक पैकेज के जरिए वंचित वर्ग को मदद पहुंचाने की बजाए प्रदेश सरकार, समाचार पत्रों की, प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रानिक मीडिया की हेडलाइन मैनेजमेंट में लगी रही।

मध्यप्रदेश सरकार ने समस्या के समाधान के लिए गैरसरकारी रिटायर्ड मेडिकल विशेषज्ञ, जिनके पास असीम अनुभव है, से मदद लेने का कोई प्रयास नहीं किया। केन्द्र सरकार ने वैक्सीन के लिए बजट में लगभग 35000 करोड़ रूपए का प्रावधान किया था। यह राशि देश के 90 करोड़ पात्र लोगों को दोनों टीके लगवाने के लिए पर्याप्त थी, लेकिन यह राशि कहां खर्च की गई, किसी को मालूम नहीं है। अब नए फैसलों के तहत वैक्सीन तीन तरह की दरों पर उपलब्ध कराई जा रही है। क्या इससे काला बाजारी नहीं बढ़ेगी? त्रिस्तरीय वैक्सीन मूल्य का फैसला भारत सरकार की सबसे बड़ी अदूरदर्शिता का प्रमाण है। गांव गांव में कोरोना फैल रहा है, इसकी रोकथाम के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डाॅक्टर, पैरामेडिकल स्टाॅफ एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ता की पर्याप्त संख्या हो, दवाई की समुचित व्यवस्था हो, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं जिला स्वास्थ्य केन्द्र में आरटीपीसीआर टेस्ट एवं सिटी स्केन की व्यवस्था होनी चाहिए। ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डाॅक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ के कई पद रिक्त हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डाॅक्टर के लगभग 23 प्रतिशत पद खाली हैं। इस बात का पूरा ध्यान रखना जरूरी है कि गांव से लोगों का पलायन न हो तथा गांव में जो कोरोना सक्रंमित मरीज पाए जाएँ उनके लिए परमिट वाली बस सुविधा मुहैया कराई जाए ताकि वो नजदीक के शहर या जिले में अपना इलाज समय पर करा सकें। वक्त आ गया है कि कोरोना उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम पर ज्यादा से ज्यादा फोकस हो।

होम आईसोलेशन - कोरोना से बचने के लिए हर व्यक्ति को जागरूक होना होगा और खुद का बचाव करना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रवक्ता एवं देश के अनेक जाने-माने विशेषज्ञ डाॅक्टरों का कहना है कि कोरोना संक्रमण के 85 प्रतिशत मरीजों का घर पर ही इलाज हो सकता हैै। इसके लिए लोगों को सुरक्षित होम केयर के बारे में समुचित जानकारी दी जाए और उन्हें घर में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं दी जाएं। कोरोना संक्रमण अब हवा में है, ऐसी स्थिति में कोरोना के मरीजों को बेहतर विकल्प, होम आइसोलेशन है।

कोरोना संक्रमण की श्रंखला को रोकने के लिए टीकाकरण की सख्त आवश्यकता है। सभी पात्र लोगों को टीकाकरण आवश्यक रूप से कराना चाहिए। टीकाकरण अभियान में भीड़ उमड़ रही है। शासन और प्रशासन के पास पर्याप्त इंतजामात नहीं है, अमले और अनुभवी स्टाफ की भारी कमी है। शहरों व दूर-दराज इलाकों के अस्पतालों में लोगों को घंटों लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है। मध्यप्रदेश सहित देश के अधिकांष राज्यों में 18+ के नौजवानों को 1 मई से वैक्सीन न लगने की शासकीय घोषणा निराषाजनक है। जब 18$ के लोगों के लिए वैक्सीन ही नहीं थी तो उन्हें सपने क्यों दिखाये गये, उनका पंजीयन क्यों कराया? यह उनके साथ छलावा है। सरकार को आगामी कम से कम तीन माह की समयबद्ध कार्ययोजना बनानी चाहिए, कार्ययोजना की मानिटरिंग होनी चाहिए। तय किये गये दिषा निर्देशों का परिपालन होना चाहिए एवं जवाबदेही तय होनी चाहिए। आज सवाल सरकार की नीयत पर नहीं है, बल्कि उसकी कार्यषैली पर है। समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती के लिए मिलकर कदम उठाएं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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