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प्रभात झा का लेख : कारसेवकों में था गजब उत्साह

4 दिसंबर को अयोध्या के राष्ट्रीय राजमार्ग पर जब हमने निगाहें दौड़ाई तो कारसेवकों के सिवा कुछ और नहीं दिख रहा था। लोग नारे लगा रहे थे, राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। वे कह रहे थे, जो राम-राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं। वातावरण राममय हो गया था। सरयू पर बने पुल से जब स्नान कर रहे लाखों कारसेवकों का फोटो खींच रहे थे तो कैमरे के लेंस में लोग समा नहीं रहे थे। हिंदुत्व के ज्वार का ऐसा अद्भुत दृश्य हमने पहले कभी देखा था।

प्रभात झा का लेख : कारसेवकों में था गजब उत्साह
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प्रभात झा

वे लोग भाग्यशाली होते हैं जो इतिहास को अपनी आंखों से देखते हैं। यह मेरा सौभाग्य था कि मैं पत्रकार के नाते 6 दिसंबर 1992 को रामलला जन्मभूमि के उस परिसर में खड़ा था, जहां हमारी आंखों के सामने भगवा पट्टी माथे पर बांधे सैकड़ों कार सेवक देखते-देखते गुंबद पर चढ़ गए और विवादित ढांचे को धूल-धुसरित कर दिया।

हम पत्रकारों ने 3 दिसंबर की रात्रि से ही यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि 6 दिसंबर तक यहां 3-4 लाख कारसेवकों की संख्या हो जाएगी। 4 दिसंबर को अयोध्या के राष्ट्रीय राजमार्ग पर जब हमने निगाहें दौड़ाई तो कारसेवकों के सिवा कुछ और नहीं दिख रहा था। लोग नारे लगा रहे थे, राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। वे कह रहे थे, जो राम-राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं। वातावरण राममय हो गया था। सरयू पर बने पुल से जब स्नान कर रहे लाखों कारसेवकों का फोटो खींच रहे थे तो कैमरे के लेंस में लोग समा नहीं रहे थे। हिंदुत्व के ज्वार का ऐसा अद्भुत दृश्य हमने पहले कभी देखा था। जब हम लोगों के बीच पहुंच रहे थे तो कोई मलयाली बोल रहा था तो कोई तेलगू। पहनावे से पूरे भारत के अलग-अलग राज्यों के लोगों को पहचाना जा सकता था। लघु भारत का अनोखा दृश्य दिख रहा था। राम सबके और सब राम के का भाव वहां हर तरफ, हर जगह देखा जा सकता था।

4 दिसंबर को हमने अयोध्या से लखनऊ मोटरसाइकिल से जाने की योजना बनाई, लेकिन हजारों वाहनों की कतारें हमारी हिम्मत को तोड़ रही थी। हमें वापस लौटना ही पड़ा। जब हम वापस अयोध्या लौट कर आए तो हमारी मोटरसाइिकल को निकालने की जगह ही नहीं मिला रही थी। सड़कों पर कारसेवक सोते दिख रहे थे। कार सेवकों के चेहरे पर गुस्सा भी दिख जाता था, लेकिन उनका गुस्सा संगठन के अनुशासन के कारण बंधा हुआ था। इस बीच राम लला परिसर में लोग ढोल-ढमाकों के साथ आने लगे थे। विहिप के जन्मभूमि न्यास के माध्यम से मंच भी बनने लगा था। 4 दिसंबर की रात्रि हम लोग सोए नहीं। हम कारसेवकों का उत्साह देख रहे थे। राम की भक्ति अयोध्या की धरती पर नए इतिहास रच रही थी।

5 दिसंबर को दोपहर में रामलला परिसर में बने मंच पर सभा शुरू हुई। इस बार के अयोध्या में विशेषता यह थी कि अधिकतर रामभक्त युवा थे। इन युवा रामभक्तों के चहरे पर जूनून और जज्बा देखा जा सकता था। केन्द्रीय पुलिस बल की टुकड़ियां भी रामघाट से लेकर पूरी अयोध्या में तैनात कर दी गई थी। 5 दिसंबर की रात्रि को ऐसा लग रहा था जैसे लोग सिर्फ अयोध्या की ओर ही आ रहे हैं। इसी रात विहिप, बजरंग दल, भाजपा के नेताओं ने अयोध्या पहुंच रहे सभी कारसेवकों से शान्ति की मार्मिक अपील की।

6 दिसंबर के भोर का अरुणोदय, लाखों युवाओं को तरुनोदय दे रहा था। अरुणोदय के दौरान फूट रही सूर्य की किरणें किसी नवोदित संदेश को समेटे थी, जिसकी जानकारी सिर्फ सूर्य भगवान को ही थी। सुबह तीन-साढे तीन बजे से ही सरयू में डुबकियों का शोर गूंजने लगा। अरुणोदय की किरणें जैसे-जैसे सूर्योदय की ओर जा रही थीं, वैसे-वैसे लोगों के पग रामलला के दर्शन की ओर बढ़ रहे थे।

6 दिसंबर सूर्योदय को देख हमें नहीं लगा था कि आज कोई इतिहास रचा जाएगा, लेकिन सूर्योदय के गर्भ में सच में इतिहास छुपा था जिसकी जानकारी दोपहर 11-12 बजे के बीच दुनिया को पता चली। सुबह के 10 बजते ही विहिप के अध्यक्ष और जन्मभूमि आन्दोलन के प्रणेता अशोक सिंहल मंच से कारसेवकों को कहते हैं कि बैरिकेट्स को कोई भी पार न करे। हमने भगवा ब्रिगेड को कार सेवकों की सुरक्षा के लिए लगाया है। इसी बीच मंच पर लाल कृष्ण आडवानी, डा. मुरली मनोहर, साध्वी उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और आचार्य धर्मेन्द्र आते हैं। जैसे ही घड़ी की सूई ने 11 बजने का इशारा किया अचानक हजारों कारसेवक विवादित ढांचे के परकोटे की ओर कूद पड़े। श्री सिंहल माइक से आग्रह करते रहे, लेकिन रामभक्तों के मन में प्रज्वलित राम ज्वार विवादित ढांचे पर फूट पड़ा देखते-देखते कुछ लोग ढांचे के गुंबदों पर चढ़ गए, भगवा ध्वज फहरा दिया और जय श्रीराम के नारे लगाने लगे। कंटीली तारों से लहू लुहान लोग विवादित ढांचे को ध्वस्त करने पर उतारू हो गए। वहां जो घट रहा था वह अविस्मरणीय, अद्भुत और अकल्पनीय था।

रोकने वाले रोकते रहे, पर कारसेवक विवादित ढांचे को तोड़ते रहे। पुलिस भीड़ को तितर-बितर कर रही थी। इस बीच पता चला कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए थे कि चाहे जो मजबूरी हो, लेकिन कार सेवकों पर गोली नहीं चलेगी। यहां तो यह भी दिख रहा था कि कई पुलिस वाले भी जय श्री राम के नारे लगा रहे थे। 11:25 बजे पहला गुंबद टूटने लगा। वह कौन-सी अदृश्य शक्ति थी, वह कौन सा अदृश्य साहस था जो विवादित ढांचे को तोड़ रहा था इसे कोई नहीं देख पा रहा था। डेढ़ से दो घंटे में पूरा विवादित ढांचा धूल-धूसरित हो गया। ढांचा तोड़ते समय अनेक लोग घायल हुए, कई लोगो की मृत्यु भी हुई, लेकिन कारसेवक अपने काम से डिगे नहीं। थोड़ी देर बाद वहां पर परमहंस रामचंद्र दास, महंथ नृत्य गोपाल दास और अशोक सिंहल आये और रामलला के दर्शन किए।

मैं पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहा था। ढांचे के पास से ही अपने सम्पादक को टेलीफोन से आंखों देखी बता रहा था। इस स्थिति में पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करने का साहस स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम दे रहे थे। इसी बीच मैंने कानपुर के एक स्वतंत्र पत्रकार साथी से आग्रह किया कि आज रात्रि तक ही मुझे ग्वालियर पहुंचना है। मैंने उन्हें बताया कि 6 दिसंबर की ऐतिहासिक घटना पाठको तक मैं सुबह ही पहुंचाना चाहता हूं। तब न वाट्सेप था और न ही ईमेल। हमारे पास था पत्रकार का धर्म और पत्रकारिता का जूनून। बसें बंद हो गई थी। अयोध्या से बाहर जाना संभव नहीं था। फोटो भेजने का कोई और उपाय नहीं था। तब मैंने साथी से कहा कि मुझे मोटरसाइकिल से ग्वालियर ले चलो। हम दिन के 2 बजे अयोध्या से निकल पड़े। छुपते-छुपाते फैजाबाद पहुंचे। वहां से लखनऊ। जैसे तैसे शाम 6-7 बजे कानपुर पहुंचे। वहां से बीहड़ों से होते हुए इटावा। रात 10:30 बजे इटावा से ग्वालियर के लिए रवाना हुए। इटावा से भिंड के बीच रात्रि में भड़कों के बीच से निकलना खतरे से खाली नही था। वहां दस्युओं का भी बहुत खतरा था। लेकिन हम मोटरसाइिकल के साथ आगे बढ़ रहे थे। आखिर रामजी का काज था, कोई कैसे रोक सकता था। रात्रि 12 बजे हम मध्यप्रदेश की सीमा भिंड में प्रवेश कर चुके थे। अब हमें 70-75 किमी की यात्रा और करनी थी। थकान सिर चढ़ कर बोल रही थी, लेकिन आंखों के सामने घटित इतिहास और उसका चित्र पाठकों तक पहुंचाने का रोमांच इस थकान पर भारी था। मेरे भीतर पत्रकारिता धर्म का निर्वाह करने का कर्तव्य बोध जगा हुआ था। साहस टूटा नहीं, कलम थमी नहीं। हम रात्रि 2 बजे कार्यालय पहुंचकर सब कुछ तैयार कर चुके थे। सात दिसंबर की सुबह अयोध्या का आंखों हाल सचित्र पाठकों की आंखों के सामने था। 5 अगस्त, 2020 को होने वाला रामलला मंदिर निर्माण भूमि पूजन 1992 को अयोध्या की आंखों देखी को ताजा करने वाला होगा। यह आन्दोलन के हुतात्माओं के प्रति शब्दांजलि रुपी श्रद्धांजलि होगी।

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