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भगत सिंह के वैचारिक वामपंथ की कथा

भावुकता या तार्किक जंजाल से भगत सिंह को समझा नहीं जा सकता। भारतीय समाजवाद के सबसे युवा चिंतक इतिहास में भगतसिंह ही स्थापित होते हैं। विवेकानंद, जयप्रकाश, लोहिया, नरेन्द्रदेव, सुभाष बोस, मानवेन्द्र नाथ राय और जवाहरलाल नेहरू आदि ने ‘समाजवाद‘ का आग्रह उनसे ज्यादा उम्र में किया है।

भगत सिंह के वैचारिक वामपंथ की कथा
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भावुकता या तार्किक जंजाल से भगत सिंह को समझा नहीं जा सकता। भारतीय समाजवाद के सबसे युवा चिंतक इतिहास में भगतसिंह ही स्थापित होते हैं। विवेकानंद, जयप्रकाश, लोहिया, नरेन्द्रदेव, सुभाष बोस, मानवेन्द्र नाथ राय और जवाहरलाल नेहरू आदि ने ‘समाजवाद‘ का आग्रह उनसे ज्यादा उम्र में किया है। साम्यवादी विचारकों माक्र्स, लेनिन, एंजिल्स आदि को पढ़ने के अतिरिक्त भगतसिंह ने अप्टाॅन सिंक्लेयर, जैक लंडन, बर्नर्ड शॉ, चाल्र्स डिकेन्स, आदि सहित तीन सौ से अधिक महत्वपूर्ण किताबें पढ़ रखी थीं।

शहादत के दिन भी लेनिन की जीवनी पढ़ते पढ़ते ही फांसी के फंदे पर झूल गए। भगतसिंह के निर्माण के सहयोगी नेशनल काॅलेज लाहोर के प्राचार्य छबील दास, द्वारका दास लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन राजाराम शास्त्री, महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी और उनके मित्रों भगवतीचरण वोहरा, चंद्रशेखर आजाद, सोहनसिंह जोश, सुखदेव, विजयकुमार सिन्हा, शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि रहे हैं।

भगतसिंह ने ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन‘ नामक क्रांतिकारी संगठन के नाम में ‘सोशलिस्ट‘ नाम का शब्द इस आशय के साथ जोड़ा कि भारत को जो स्वतंत्रता मिले उसका आर्थिक उद्देश्य समाजवाद भी होना चाहिए। अपने साथियों में भगतसिंह सबसे पहले समाजवादी विचारों की तरफ आकर्षित हुए। उन्होंने ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?‘ लेख तथा ‘नौजवान सभा का घोषणा पत्र‘ लिखा।

उसे कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के समानांतर कहा जाता है। मित्र काॅमरेड सोहन सिंह जोश उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे। भगत​सिंह ने मना कर दिया जबकि वे कट्टर माक्र्सवादी थे। फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब बिना सिर उठाए भगतसिंह ने कहा ‘ठहरो भाई, मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं। एक क्रांतिकारी दूसरे क्रां​तिकारी से मिल रहा है।‘

भगतसिंह की कद काठी के मृत्युंजय हिन्दुस्तान क्या दुनिया के इतिहास में इने गिने ही हुए हैं। समाजवाद के पक्ष में भगतसिंह ने बाकी वैचारिकों के समानांतर एक लकीर खींची लेकिन प्रयोजन से भटक कर ऐसा विवाद उत्पन्न नहीं किया जिससे अंगरेजी सल्तनत को लाभ हो। समाजवाद और साम्यवाद के प्रति गहरा झुकाव उन्हें क्रान्तिकारी आन्दोलन की बौद्धिकता का भगवतीचरण वोहरा तथा शचीन्द्र नाथ सान्याल की तरह जिज्ञासु शिल्पकार बनाता है।

यह कहना लेकिन तथ्यात्मकता के प्रतिकूल है कि भगतसिंह का पहला चयन साम्यवाद के प्रति समर्थन था। समाजवाद के सिद्धान्तों के प्रति भगतसिंह की प्रतिबद्धता का इतिहास गहरी छानबीन का विषय है। तरुण भगतसिंह तथा सुखदेव आदि उनके साथी अराजकतावादी नेताओं तथा कई देशों के स्वाधीनता आन्दोलन के जननायकों जैसे रूसी अराजकतावादी बाकुनिन, इटली के मैजिनी, फ्रांसीसी दार्शनिक प्रूक्लेन {अराजकतावाद के जन्मदाता} प्रिंस क्रापाटकिन, एमा गोल्डमैन, अलेक्जेन्डर ब्रेकमैन आदि से प्रभावित थे।

इस दौरान भगतसिंह को अधिकतर ऐसी पुस्तकें पढ़ने मिलीं जो माक्र्सवाद से सम्बन्धित थीं। यह प्रमुख कारण था जिससे भगतसिंह के राजनीतिक आदर्श अराजकतावाद से समाजवाद की ओर परिवर्तित हुए। भगतसिंह के साथी शिव वर्मा के अनुसार ‘समाजवाद की दिशा में उनकी वैचारिक प्रगति की रफ्तार बहुत तेज थी।‘ 1924 से 1928 के बीच भगतसिंह ने ताजा भारतीय राजनीतिक इतिहास का भी गहरा अध्ययन किया था।

उनके साथी भगवानदास माहौर के अनुसार अपनी समाजवादी प्रतिबद्धताओं के बावजूद ‘भगतसिंह समाजवाद के अच्छे पंडित नहीं थे। भगतसिंह और उनके साथी धीरे धीरे समाजवाद के सिद्धांतों के प्रति आकर्षित होते हुए भी क्रांतिकारी गतिविधियों को उनसे सम्पृक्त करने की कोशिश करते रहे। शुरू में भगतसिंह की साम्यवाद की समझ अपरिपक्व, अस्पष्ट और अमूर्त थी।

उनके समवयस्क अजय घोष ने, जो बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने, लिखा भी है, हम क्रान्ति के सपने देखा करते। लगता था कि क्रान्ति अब दूर नहीं है। लेकिन भगतसिंह क्रान्ति के आसन्न होने के बारे में उतने आश्वस्त नहीं थे। मैं उनके निराशावादी दृष्टिकोण का मजाक उड़ाता था।‘ प्रखर राष्ट्रवाद के कारण भगतसिंह ने अपने साथियों का विदेश जाकर आर्थिक सहायता प्राप्त करने का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया था।

इसी दरम्यान भगतसिंह ने क्रांति के बचे खुचे साथियों को इकट्ठा कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोजशाह कोटला में ऐतिहासिक बैठक में समाजवाद के पक्ष में पुरजोर दलीलें रखी थीं और क्रांतिकारियों के प्रतिनिधि संगठन के मूल नाम को बदलकर इंडियन रिपब्लिकन सोसलिस्ट एसोसिएशन करने में साथियों का बहुमत से अनुमोदन प्राप्त किया।

चार दस्तावेज बुनियादी तौर पर प्रामाणिक सन्देश वाहक बन गएः- {1} लाहौर की नौजवान भारत सभा का घोषणा पत्र {अप्रेल, 1928} {2} असेम्बली बम प्रकरण में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त का अदालती बयान {6ः जून, 1929} {3} कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के समय वितरित घोषणा पत्र {1929} {4} ‘बम का दर्शन‘ {26 जनवरी 1930} ‘किरती‘ में छद्म नामों से लिखे गये लेख, सुखदेव को भूख हड़ताल के समय लिखे पत्र और 2 फरवरी 1931 को पंजाब केशरी में प्रकाशित ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा‘ भी भगतसिंह के राजनीतिक दर्शन को समझने की आंखें हैं।

उनमें भगतसिंह के वामपन्थी क्रांतिकारी विचारों की विरोधाभासी और सुसंगत दोनों तरह की रोशनी दिखती है। 1929 में अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के चलते इतनी पारदर्शी, सूक्ष्म और निष्कपट बात ये क्रांतिकारी ही कर सके। भगतसिंह ने सुखदेव को लिखे पत्र में साफ कहा है, ‘साम्यवाद का जन्मदाता माक्र्स, वास्तव में उस विचार को जन्म देने वाला नहीं था।

असल में यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने ही विशेष प्रकार के विचारों वाले व्यक्ति उत्पन्न किए थे। उनमें माक्र्स भी एक था। माक्र्सवादी समाजवाद की गहरी मीमांसा के बाद भगतसिंह आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक कार्यक्रम का ऐलान करते हैं। उसके सम्बन्ध में साम्यवाद को लेकर उनमें कोई संशय नहीं है। भगतसिंह ने विदेश जाने से इन्कार किया था।

उन्हें रूसी या अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों ने शायद निमंत्रित भी नहीं किया था। ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा‘ में वे साफ कहते हैं-‘वास्तविक क्रांतिकारी सेनाएं तो गांवों और कारखानों में हैं-किसान और मजदूर‘ ‘क्रांति राष्ट्रीय हो या समाजवादी, जिन शक्तियों पर हम निर्भर हो सकते हैं वे हैं किसान और मजदूर।‘ ‘किसानों और मजदूरों का सक्रिय समर्थन हासिल करने के लिए भी प्रचार जरूरी है।‘

क्रांति के लिए हथियारों के इस्तेमाल के सवाल पर भगतसिंह और साथियों को कांग्रेस सहित कम्युनिस्टों का भी प्रोत्साहन या सहयोग नहीं मिला। भगतसिंह के विचारों और कार्यों में सुसंगतता और प्रत्यक्ष विरोधाभास के कारण उनके राजनीतिक मानस की पड़ताल करना चुनौती भरा है। तेईस चौबीस वर्ष की उम्र में सड़कों पर आकर संसार की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकत से मुट्ठी भर साथियों के साथ लड़ाई लड़ रहे भगतसिंह ने केवल अध्ययन और अध्यवसाय के कारण बौद्धिकता के इतिहास में अपनी जगह बना ली है।

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