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विकेश कुमार बडोला का लेख : तय हो विपक्ष की भूमिका

मोदी शासन को एक ऐसा विधेयक भी संसद (Parliament) में पारित करना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान हो कि सदन में विपक्ष के रूप में अनावश्यक व अराजकतापूर्ण विरोध करने वाले राजनीतिक दलों की दलीय मान्यता और उनके सांसदों की संसद सदस्यता तत्काल समाप्त कर उन्हें कारावास अथवा कठोर दंड मिले। ऐसा किए बिना मोदी (Modi )जैसे शासकों के लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी प्रयास दीर्घकाल में व्यर्थ ही सिद्ध होंगे।

विकेश कुमार बडोला का लेख : तय हो विपक्ष की भूमिका
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नव संशोधित कृषि विधेयकों के विरोध में राज्यसभा और सभापति की लोकतांत्रिक गरिमा खंडित करने वाले विपक्ष के सांसदों के धरने का क्या औचित्य है, इस पर विपक्ष का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस को गंभीरतापूर्वक आत्ममंथन करना चाहिए।

जिन सांसदों को कृषि विधेयकों के विरोध में संसदीय (Parliamentary) अराजकता फैलाने के लिए संसद सत्र से निलंबित किया गया था, क्या जनता के सम्मुख लोकतांत्रिक संसदीय मर्यादा स्थापित करने के लिए सांसदों को दिया गया यह दंड पर्याप्त था? क्या इससे जनमानस में लोकतंत्र और संसद की मर्यादा विचलित होने से बच जाएगी?

यदि विचार करें तो यही सत्य और तथ्य सम्मुख होगा कि विपक्ष के रूप में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सपा और अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा वर्ष प्रतिवर्ष सत्रावसरों पर सदनों में सत्ता पक्ष के उपयोगी विधेयकों का जिस प्रकार मात्र विरोध के लिए विरोध किया गया और हर संभव उपाय द्वारा ससंदाधारित मान-मर्यादाओं को तिरोहित किया गया, उससे लोकतंत्र स्वयं में अपूर्ण व अनुचित धारणा के रूप में स्थापित हुआ है।

2014 में मोदी शासन के आने के बाद भारतीय लोकतंत्र का वैचारिक एवं व्यावहारिक दोनों प्रकार का व्यवहार विस्तृत रूप में परिवर्तित हुआ है। जहां एक ओर मोदी संसदीय आम चुनाव के उपरान्त निरंतर दूसरी बार प्रधानमंत्री बने वहीं विपक्ष की संसद से लेकर सड़क तक की विरोध के लिए विरोध करने की सत्ताविरोधी दुष्प्रवृत्ति में भी निरंतर वृद्धि हुई है।

यदि लोकतंत्र की वास्तविक धारणाओं के अनुरूप समस्त क्षेत्रों के वैकासिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और प्रगति पर सत्यनिष्ठा पर आधारित चिंतन-मनन हो तो निस्संदेह मोदी ही वह प्रधानमंत्री होंगे, जिनके साढ़े छह वर्षीय कार्यकाल में भारत ने एक राष्ट्र के रूप में अभूतपूर्व प्रगति की है। इस बीच उपजी वैश्विक कोरोना महामारी के कारण प्रभावित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का संदर्भ यदि विभिन्न राजनीतिक दलों के सत्ताधारियों के कार्यों के मूल्यांकन उद्देश्य हेतु थोड़ी देर के लिए एक ओर रख दिया जाए तो निश्चित रूप में मोदी शासन के कार्य ही हर दृष्टि से उल्लेखनीय, प्रशंसनीय और जनहितधारक हैं।

इस मूल्यांकन के उपरान्त भी मोदी का संसदीय विरोध अनवरत चल रहा है। संसद (Parliament) का कोई ऐसा सत्र नहीं जिसमें सत्तारूढ़ दल द्वारा राष्ट्र की दीर्घकालिक उन्नति को आधार बनाकर प्रस्तुत किए गए अनेक विधेयकों पर विपक्ष ने कांग्रेस के उकसावे में व्यर्थ आपत्तियां न की हों। यह समस्त विधेयक कांग्रेस और अन्य विपक्षी राजनीतिक दलों के मतदाताओं के लिए भी अति लाभकारी हैं, परन्तु अपने मतदाताओं के कल्याण की भावना का तिरस्कार करते हुए विपक्ष की विरोधजन्य राजनीति ने पग-पग पर लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास ही किया है।

विपक्षी दलों के नेतृत्वगणों को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि उनके राजनीतिक अस्तित्व की परिणति अपने मतदाताओं के सर्वकल्याण से संबंधित संसदीय नीतियों-नियमों का अनुपालन करने में नहीं है तो किस में है। लोकतांत्रिक शासन पद्धति में कोई भी राजनीतिक दल संसद में विपक्षी होकर भी जनकल्याण हेतु अपने दायित्वों का भलीभांति संसदीय मर्यादा के अनुकूल निर्वहन कर सकता है। यह विध्वंसजन्य धारणा भारतीय संसद में कैसे पनप गयी कि विपक्ष में रहते हुए राष्ट्र और राष्ट्र के नागरिकों के उत्थान कर्तव्य से नहीं जुड़ा जा सकता।

यदि सत्ता पक्ष का प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक, नागरिक और संसदीय निष्ठा के प्रति अपूर्व समर्पण भावना से संचित है और इसी प्रकार संपूर्ण सत्ताधारी दल व इसके नेताओं-कार्यकर्ताओं की प्रवृत्ति होती है तो विपक्ष के पास सत्तापक्ष द्वारा संसदीय पटल पर रखे जाने वाले नवीन विधेयकों व पुरानत विधेयकों के संशोधनीय प्रस्तावों के संबंध में एक रचनात्मक भूमिका निभाने का स्वर्णिम अवसर सदैव होता है।

विपक्ष को यह अवसर अवश्य भुनाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि किसानों की उपज से संबंधित, संसद के दोनों सदनों से भारी हंगामे के बीच पारित, दो कृषि विधेयकों में किए गए संशोधनात्मक बिंदुओं से विपक्षी सांसद सहमत नहीं हैं, तो इसके विरोध में अपना सुलभ संसदीय मतदान करने के उपरान्त, वे संसदीय मान-मर्यादाओं का अराजकतापूर्ण खंडन करने के बदले असहमति के बिंदुओं पर ऐसे रचनात्मक और उपयोगी सुझाव देते, जिससे सत्ता पक्ष को विवश होकर उन्हें संशोधन अधिनियम में स्थान देना पड़ता। परन्तु यहां तो विपक्षी सांसदों को यह ज्ञात ही नहीं है कि जिन दो कृषि विधेयकों के विरोध में उन्होंने राज्यसभा के भीतर से लेकर संसदीय प्रांगण तक हंगामा मचाया है, वास्तव में उसका आधार है क्या।

विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष का संसद और सड़क में जैसा भी विरोध किया जाता रहा है और अब भी निरंतर किया जा रहा है, उसमें सत्ता पक्ष के नियमों, अधिनियमों, निर्णयों और नीतियों के प्रति विरोध की प्रामाणिकता परलक्षित ही नहीं होती। संसद में सत्ता की नीतियों के विरोध का आधार दो कृषि विधेयक ही नहीं बने हैं। मोदी शासन सत्ताधारी पक्ष के रूप में जो भी जनविधेयक संसद में रखता है, विपक्ष ऐसे विधेयकों से संबंधित अपनी उन सहमतियों को भी भूल जाता है, जो सत्ता पक्ष में रहते हुए उसने सहर्ष प्रदान की थीं। कांग्रेस हो या अन्य दल, वे विपक्ष के महत्वपूर्ण पद और उत्तरदायित्वों से विमुख होकर द्विसदनीय लोकतांत्रिक शासकीय प्रणाली को पतन की ओर नहीं धकेल सकते।

आगामी समय में मोदी शासन को एक ऐसा विधेयक भी संसद में पारित करना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान हो कि सदन में विपक्ष के रूप में अनावश्यक व अराजकतापूर्ण विरोध करने वाले राजनीतिक दलों की दलीय मान्यता और उनके सांसदों की संसद सदस्यता तत्काल समाप्त कर उन्हें कारावास अथवा कठोर दंड मिले। ऐससा किए बिना मोदी जैसे शासकों के लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी प्रयास दीर्घकाल में व्यर्थ ही सिद्ध होंगे।

विपक्षियों की अराजकता, असभ्यता और संसदीय मान-मर्यादा भंग करने का दुस्साहस इसलिए भी बढ़ा और बढ़ रहा है क्योंकि सत्ता पक्ष निष्पक्षता की संसदीय निष्ठा से बंधकर कठोर दंड के पात्र अराजक विपक्षी सांसदों को यथोचित कठोरतम दंड देने के बदले उनकी मान-मनुहार में ही जुट जाता है। सत्ता पक्ष की इस प्रवृत्ति ने भी संसद में विपक्षियों के दुस्साहस को बढ़ाया है। हो सके तो सर्वप्रथम सत्ता पक्ष को अपनी इस अनुपयोगी प्रवृत्ति का त्याग करना होगा। तब ही वह विपक्षियों को संसद में संसदीय मर्यादा, गरिमा और लोकतांत्रिक सदाचरण के साथ बैठने और संसद से संबंधित कार्य करने की शिक्षा दे सकता है।

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