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निरंकार सिंह का लेख : बार-बार भूकंप के मायने

दरअसल यह धरती मुख्य तौर पर चार परतों से बनी हुई है, जिन्हें इनर कोर, आउटर कोर, मेंटल और क्रस्ट कहा जाता है। क्रस्ट और ऊपरी मैन्टल को लिथोस्फेयर कहा जाता है। ये 50 किलोमीटर की मोटी परतें होती हैं, जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट्स कहा जाता है। ये प्लेट्स अपनी जगह से हिलती रहती हैं, घूमती रहती हैं, खिसकती रहती हैं। इस दौरान कभी-कभी ये प्लेट्स एक-दूसरे से टकरा जाती हैं। ऐसे में ही भूकंप आता है।

Earthquake: शुक्रवार को पांच राज्यों में आया भूकंप, जोन 5 में हो सकती है बड़ी तबाही
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Earthquake: शुक्रवार को पांच राज्यों में आया भूकंप, जोन 5 में हो सकती है बड़ी तबाही

निरंकार सिंह

पिछले कुछ समय से जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, ओडिशा और हरियाणा के दक्षिण-पूर्वी इलाके रोहतक में कम तीव्रता के भूकंप के झटके आ चुके हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक सप्ताह में देश में कम तीव्रता के 25 भूकंप आए हैं। रोहतक में 18 जून को तड़के भूकंप के झटके महसूस किए गए। रिक्टर पैमाने पर इस भूकंप की तीव्रता 2.1 रही। इससे पहले कश्मीर में 16 जून को एक मध्यम तीव्रता का भूकंप का झटका महसूस किया गया। इसकी रिक्टर पैमाने पर तीव्रता 5.8 मापी गई। भूकंप का केंद्र तजाकिस्तान क्षेत्र में था और इसकी गहराई पृथ्वी की सतह के भीतर 100 किलोमीटर थी। भूकंप की दृष्टि से कश्मीर ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहां भूकंप आने की अत्यधिक आशंका रहती है। पहले भी कश्मीर में भूकंप ने खासा कहर बरपाया है। 8 अक्टूबर, 2005 को रिक्टर पैमाने पर 7.6 तीव्रता के भूकंप से जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दोनों ओर 80,000 से अधिक लोग मारे गए थे। उधर गुजरात के राजकोट जिले में 15 जून को हल्की तीव्रता के दो भूकंप आए। इसके एक दिन पहले 14 जून को क्षेत्र में 5.3 तीव्रता का भूकंप आया था।

दिल्ली और एनसीआर में एक बड़ा भूकंप आने की संभावना है। इसकी चेतावनी आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों ने दी है। उनका कहना है कि दिल्ली-हरिद्वार रिज में खिंचाव के कारण आए दिन धरती हिल रही है। इस वजह से झटकों का दौर जारी रहेगा। नेशनल सेंटर ऑफ सीस्मोलॉजी (एनसीएस) के पूर्व प्रमुख एके शुक्ला के अनुसार भी छोटे भूंकप को चेतावनी के रूप में जरूर देखा जा सकता है। इन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। ये किसी बड़े भूकंप का संकेत हो सकते हैं। दिल्ली-एनसीआर में भूकंप के झटकों की शुरुआत 12 अप्रैल (3.5 तीव्रता) से हुई। तब से अब तक अलग-अलग दिन 14 बार झटके लग चुके हैं। राजधानी दिल्ली देश में सबसे अधिक भूकंप अनुभव करने वाले शहरों में से एक है। हिमालय पर्वत शृंखला से लगभग 280 से 350 किमी की दूरी पर स्थित दिल्ली हिमालय के सक्रिय मुख्य सीमा थ्रस्ट (एमबीटी) से दूर नहीं है, जो कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक जाती है। भूकंप क्यों आता है, इसका वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है, परंतु यह कब और कहां आएगा, अभी कुछ नही कहा जा सकता है, पर दुनिया हर साल भूकंप के हजारों झटके झेलती है।

धरती क्यों डोलती है? इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें पृथ्वी की संरचना को समझना होगा। दरअसल, पूरी धरती 12 टेक्टोनिक प्लेटों पर स्थित है, जिसके नीचे तरल पदार्थ लावा के रूप में है। ये प्लेटें लावे पर तैर रही होती हैं। इनके टकराने से ही भूकंप आता है। यह धरती मुख्य तौर पर चार परतों से बनी हुई है, जिन्हें इनर कोर, आउटर कोर, मैन्टल और क्रस्ट कहा जाता है। क्रस्ट और ऊपरी मैन्टल को लिथोस्फेयर कहा जाता है। ये 50 किलोमीटर की मोटी परतें होती हैं, जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट्स कहा जाता है। ये टेक्टोनिक प्लेट्स अपनी जगह से हिलती रहती हैं, घूमती रहती हैं, खिसकती रहती हैं। ये प्लेट्स अमूमन हर साल करीब 4-5 मिमी तक अपने स्थान से खिसक जाती हैं। ये क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर, दोनों ही तरह से अपनी जगह से हिल सकती हैं। इस क्रम में कभी कोई प्लेट दूसरी प्लेट के निकट जाती है तो कोई दूर हो जाती है। इस दौरान कभी-कभी ये प्लेट्स एक-दूसरे से टकरा जाती हैं। ऐसे में ही भूकंप आता है। ये प्लेटें सतह से करीब 30 से 50 किमी तक नीचे हैं। भूकंप का केंद्र वह जगह होती है, जिसके ठीक नीचे प्लेटों में हलचल से भूगर्भीय ऊर्जा निकलती है। इस स्थान पर भूकंप ज्यादा महसूस होता है। इसकी तीव्रता का मापक रिक्टर स्केल होता है।

रिक्टर स्केल पर यदि 7 या इससे अधिक तीव्रता का भूकंप आता है तो आसपास के 40 किमी के दायरे में झटका तेज होता है, लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि भूकंपीय आवृत्ति ऊपर की तरफ है या दायरे में। यदि कंपन की आवृत्ति ऊपर की तरफ होती है तो प्रभाव क्षेत्र कम होता है। भूकंप की जितनी गहराई में आता है, सतह पर उसकी तीव्रता भी उतनी ही कम महसूस की जाती है। भूकंप की तीव्रता मापने के लिए रिक्टर स्केल का इस्तेमाल किया जाता है। इसे रिक्टर मैग्नीट्यूड टेस्ट स्केल भी कहा जाता है। भूकंप की तरंगों को रिक्टर स्केल 1 से 9 तक के आधार पर मापता है। रिक्टर स्केल पैमाने को सन 1935 में कैलिफॉर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी में कार्यरत वैज्ञानिक चार्ल्स रिक्टर ने बेनो गुटेनबर्ग के सहयोग से खोजा था। रिक्टर स्केल पर भूकंप की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 8 रिक्टर पैमाने पर आया भूकंप 60 लाख टन विस्फोटक से निकलने वाली ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है। रिक्टर स्केल पर 5 से कम तीव्रता वाले भूकंपों को हल्का माना जाता है। साल में करीब 6000 ऐसे भूकंप आते हैं। हालांकि ये खतरनाक नहीं होते, पर यह क्षेत्र की संरचना पर निर्भर करता है। रिक्टर पैमाने पर 2 या इससे कम तीव्रता वाले भूकंपों को रिकॉर्ड करना भी मुश्किल होता है तथा उनके झटके महसूस भी नहीं किए जाते। ऐसे भूकंप साल में 8000 से भी ज्यादा आते हैं। 5 से लेकर 5.9 तीव्रता तक के भूकंप मध्यम दर्जे के होते हैं और हर साल ऐसे करीब 800 झटके लगते हैं। 6 से 6.9 तीव्रता तक के भूकंप बड़े माने जाते हैं और ऐसे भूकंप साल में करीब 100 आते हैं। 7 से लेकर 7.9 तीव्रता के भूकंप खतरनाक माने जाते हैं, जो साल में करीब 20 आते हैं। रिक्टर पैमाने पर 8 से 8.9 तीव्रता तक के भूकंप को सबसे खतरनाक माना जाता है और ऐसा भूकंप भूकंप साल में एक बार आ सकता है, जबकि इससे बड़े भूकंप के 20 साल में एक बार आने की आशंका रहती है। रिक्टर पैमाने पर 8.5 वाला भूकंप 7.5 तीव्रता के भूकंप से करीब 30 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है।

भूंकप के खतरे के हिसाब से भारत को चार जोन में विभाजित किया गया है। जोन-2 में दक्षिण भारतीय क्षेत्र को रखा गया है, जहां भूकंप का खतरा सबसे कम है। जोन-3 में मध्य भारत है। जोन-4 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित उत्तर भारत के तराई क्षेत्रों को रखा गया है, जबकि जोन-5 में हिमालय क्षेत्र और पूर्वोत्तर क्षेत्र तथा कच्छ को रखा गया है। जोन-5 के अंतर्गत आने वाले इलाके सबसे ज्यादा खतरे वाले हैं। दरअसल, इंडियन प्लेट हिमालय से लेकर अंटार्कटिक तक फैली है। यह हिमालय के दक्षिण में हैं, जबकि यूरेशियन प्लेट हिमालय के उत्तर में है, जिसमें चीन आदि देश बसे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंडियन प्लेट उत्तर-पूर्व दिशा में यूरेशियन प्लेट की तरफ बढ़ रही हैं। यदि ये प्लेटें टकराती हैं तो भूकंप का केंद्र भारत में होगा। यदि अचानक भूकंप आ जाए घर से बाहर खुले में निकलें। इसके अलावा भूकंप रोधी मकान भी उतने ही जरूरी होते हैं। भूकंप के कारण भूस्खलन व हिमस्खलन भी होता है, जिनसे पर्वतीय क्षेत्रों में क्षति होती है। भूकंप से समुद्र के भीतर सुनामी भी आ सकती है।

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