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क्या ऐसी दुर्घटनाओं से सरकार भी सबक लेगी

क्या ऐसी दुर्घटनाओं से सरकार भी सबक लेगी

क्या ऐसी दुर्घटनाओं से सरकार भी सबक लेगी

नई दिल्‍ली. पनडुब्बी नौसेना की ताकत का अहसास कराती है, लेकिन जब यही दुर्घटनाग्रस्त होने लगे तो चिंता होना लाजमी है। दुख की बात यह है कि सत्ता प्रतिष्ठान में इसके प्रति गंभीरता कहीं दिखाई नहीं दे रही है। हालांकि नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके जोशी के साहस की प्रशंसा होनी चाहिए जिन्होंने नौसेना में बीते एक साल के दौरान हुए करीब दर्जनों हादसों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नौसेनाध्यक्ष पद इस्तीफा दे दिया। इससे रक्षा मंत्रालय को भी सीख लेनी चाहिए, क्योंकि यह इस्तीफा सैन्य क्षेत्र की एक बड़ी समस्या की ओर इशारा कर रहा है। समस्या है सेना के आधुनिकीकरण में हो रही बेवजह देरी।

बुधवार को पनडुब्बी सिंधुरत्न के हादसे का शिकार होने से पूर्व गत वर्ष पनडुब्बी सिंधुरक्षक भी एक बड़े हादसे में तबाह हो गई थी। वहीं पिछले माह ही पनडुब्बी सिंधुघोष मुंबई हार्बर में घुसने के दौरान घंस गई थी। इस तरह देखा जाए तो पिछले सात महीनों में दस युद्धपोतों सहित तीन पनडुब्बियां हादसे का शिकार हुई हैं। यह आधुनिक संसाधनों की कमी का सामना कर रही सेना के लिए ठीक नहीं है। इससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। कभी मिग-21 को उड़ते हुए ताबूत की संज्ञा दी गई थी अब पनडुब्बी को भी तैरता हुआ ताबूत कहा जाने लगा है।

सरकार की उदासीनता के कारण ऐसे हादसों में जवानों को असमय शहीद होना पड़ रहा है। नौसेना सहित समूची सैन्य प्रणाली दशकों पुराने हथियारों व उपकरणों के सहारे है परंतु रक्षा मंत्रालय की कारगुजारियां देखकर लगता है कि उसको इसकी विशेष परवाह नहीं है। वर्तमान में देश के पास 13 पनडुब्बियां हैं। जिसमें से पांच आईएनएस सिंधुघोष, आईएनएस सिंधुध्वज, आईएनएस सिंधुराज, आईएनएस सिंधुवीर और दुर्धटनाग्रस्त आईएनएस सिंधुरत्न की उपयोगिता खत्म हो गई है। ये सब रूस निर्मित किलो क्लास पनडुब्बी हैं, जो कि 1886 और 1988 में भारतीय नौसेना में शामिल हुए थे।

कायदे से इन्हें बहुत पहले ही नौसेना के बेड़े से रिप्लेश कर दिया जाना चाहिए, परंतु यह रक्षा मंत्रालय की चूक कही जाएगी जिसका खामियाजा सेना के जवानों को भुगतना पड़ रहा है और राष्ट्रीय सुरक्षा भी दांव पर लगी है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना हैकि किसी भी पनडुब्बी को दो दशक से ज्यादा सेवा में नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि पनडुब्बियों का परिचालन कठिन परिस्थितियों में होता है। आधुनिकीकरण के कारण नौसेना जरूरी प्रशिक्षण कार्य भी पूरा नहीं कर पा रही है। गत वर्ष कैग की जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि मौजूदा वक्त में नौसेना 67 फीसदी ही ऑपरेशन कार्य कर पा रही है।

वहीं नौसेना के अधिकारी दबी जुबान में कहते हैं कि यह आंकड़ा 40 फीसदी है। एडमिरल जोशी पनडुब्बीरोधी युद्धकला के माहिर माने जाते हैं परंतु उनके इस्तीफा का सबब भी पनडुब्बी हादसा ही बना है तो इसकी यही वजह है कि हम पुराने और जंग खाए उपकरणों के सहारे हैं। यह दुर्भाग्य है कि एक ओर हम महाशक्ति होने का दंभ भरते हैं और रक्षा तैयारियों के प्रति लापरवाह हैं। हमारी रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता अभी भी दूर की कौड़ी बनी हुई है। दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बने हुए हैं। यही नहीं जो उपकरण आयात हो रहे हैं वे भी उच्च र्शेणी के हैं या नहीं इसकी भी जवाबदेही नहीं दिखती है।

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