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तालिबान : समझौता सफल होना कठिन

समझौते के बाद तालिबान, अफगानी शासन व अन्य राजनीतिक वर्गों के प्रतिनिधियों में वार्ता होगी। इसमें अमन कायम करने से लेकर अफगानिस्तान के सांविधानिक व राजनीतिक भविष्य पर बातचीत होगी। तालिबान का विचार न वर्तमान शासन से मिलता है और न अन्य कई राजनीतिक समूहों से, इसलिए इसका किसी सर्वसम्मत परिणाम पर पहुंचना कठिन होगा। तब तालिबान क्या करेंगे? हो सकता है अफगानिस्तान भयानक गृहयुद्ध में उलझ जाए।

तालिबान : समझौता सफल होना कठिनअमेरिका और तालिबान के बीच हुआ समझौता (फाइल फोटो)

कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब भारत यात्रा पर थे तो उन्होंने स्वीकार किया कि यह समझौता होने वाला है और प्रधानमंत्री मोदी से हमारी इस पर बातचीत हुई है। जाहिर है, उस बातचीत में भारत ने अपनी समस्त आशंकाओं को जाहिर किया होगा तभी अमेरिका ने उसे भी समझौते के वक्त उपस्थित रहने के लिए औपचारिक निमंत्रण दिया। हम चाहें न चाहें तालिबान से समझौता हो गया तो इसका बहिष्कार करना या किसी तरह इससे बिल्कुल अलग रखना भारतीय हितों के प्रतिकूल होता। इसलिए दोहा में भारत के राजदूत पी. कुमारन की वहां उपस्थिति भारतीय विदेश नीति का नई परिस्थिति से सामंजस्य बिठाने का कदम है। विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृखंला प्रधानमंत्री का पत्र लेकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अरशद गनी के पास गए। वहां उन्होंने प्रशासन के अन्य लोगों से बातचीत की।

वास्तव में यह कोई सामान्य समझौता नहीं है। जिस तालिबान को साढ़े 18 वर्ष पहले अमेरिका ने नेस्तनाबूद करने की कोशिश की, वही यदि आज समझौते को तैयार हुआ है तो एक असाधारण स्थिति है। अगर आप साढ़े अठारह वर्ष पूर्व लौटें तो इस स्थिति की कल्पना कठिन थी। 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। उसका लक्ष्य केवल ओसामा बिन लादेन का ही अंत नहीं, तालिबान के सारे नेताओं का खात्मा था। उसके 2352 सैनिक उस संघर्ष में मारे जा चुके हैं। 2019 तक इस युद्ध में एक लाख से ज्यादा अफगान सैनिक, 34 हजार नागरिक मर चुके हैं। अमेरिकी आंकड़ों के अनुसार 2.4 खरब डॉलर यानी करीब 541 लाख करोड़ रुपया युद्ध मंे अमेरिका खर्च कर चुका है। आज उसी तालिबान को मान्यता देने का इतना ही मतलब है कि अमेरिका येन-केन-प्रकारेण वहां से भागने की फिराक में है। अमेरिका अब खर्च करने तथा वहां फंसे रहना नहीं चाहता है। सामान्य तर्क है कि ट्रंप ने 2016 के चुनाव में अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का वायदा किया था और दूसरी बार चुनाव में उतरने के पूर्व वे ऐसा करके अपना समर्थन आधार कायम रखना चाहते हैं।

इस समझौते के अनुसार अमेरिका और उसके सहयोगी 14 महीने के भीतर अपने सैनिकों को वापस बुला लेंगे। तत्काल वह अपनी सैनिको की संख्या 13 हजार से घटाकर 8600 करने पर प्रतिबद्ध है। यह वह स्तर है जिसे अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो बलों के कमांडर, जनरल स्कॉट्स मिलर ने उनके मिशन को पूरा करने के लिए आवश्यक बताया था। हालांकि अमेरिका की ओर से कहा गया है अगर तालिबान शांति समझौते का पालन करता है तो ही सैनिकों की वापसी होगी। तालिबान हथियार छोड़ दे इसकी कल्पना कठिन है। उसे अल कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों का साथ छोड़ना होगा। तालिबान कह रहा है कि अल कायदा अफगानिस्तान में है ही नहीं। अमेरिका को समझना है कि क्या वाकई यह कह देने से कि अल कायदा अफगानिस्तान में नहीं है वह संतुष्ट है? अमेरिका ने इसे अंतरराष्ट्रीय चरित्र देने के लिए दोहा में हस्ताक्षर करते समय 30 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विदेश मंत्री और प्रतिनिधियों की उपस्थिति सुनिश्चित की। शांति समझौता अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जालमे खलीलजाद और तालिबान के कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के बीच हुआ है। हालांकि अमेरिका के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का बयान आया है कि सैनिकों की वापसी पर काम करने का अमेरिकी इरादा समझौते में व्यक्त प्रतिबद्धता के मुताबिक तालिबान की कार्रवाई से जुड़ा है। माइक पोम्पियो ने भी कहा कि तालिबान से हुआ समझौता तभी कारगर साबित होगा, जब तालिबान पूरी तरह से शांति कायम करने की दिशा में काम करेगा। अमेरिका अपनी सेना को तभी हटाएगा जब पूरी तरह से पुख्ता कर लेगा कि तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आतंकी हमले नहीं करेगा।

भारत की भी वहां लोकतंत्र से लेकर आधुनिक शिक्षा से लेकर पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूिमका है। अगर तात्कालिक रुप से देखा जाए तो भारत के लिहाज से कतर समझौते में कुछ भी नहीं है। तालिबान के प्रतिनिधि अब्दुल बरादर ने समझौते में मदद के लिए पाकिस्तान का नाम तो लिया, लेकिन भारत का जिक्र नहीं। भारत अफगानिस्तान के विकास के लिए अरबों रुपये खर्च कर चुका है। भारत को आशंका है कि तालिबान के हाथ में सत्ता आने के बाद वह इन विकास कार्यों को बंद करा सकता है। भारत अफगानिस्तान में आधुनिक शिक्षा, महिला सशक्तीकरण की दिशा में काफी काम किया है। तालिबान की नीति आधुनिक शिक्षा और महिला विरोधी है। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान की वर्तमान में चुनी गई सरकार की जगह तालिबान की हुकूमत कायम हो। इससे पहले जब अफगानिस्तान में तालिबान ने अपनी सरकार बनाई थी, तब वहां परोक्ष रुप से पाकिस्तान का ही शासन था।

समझौते के बाद तालिबान, अफगानी शासन व अन्य राजनीतिक वर्गों के प्रतिनिधियों में वार्ता होगी। इसमें अमन कायम करने से लेकर अफगानिस्तान के सांविधानिक व राजनीतिक भविष्य पर बातचीत होगी। तालिबान का विचार न वर्तमान शासन से मिलता है और न अन्य कई राजनीतिक समूहों से। इसलिए इसका किसी सर्वसम्मत परिणाम पर पहुंचना कठिन होगा। तब तालिबान क्या करेंगे? हो सकता है अफगानिस्तान भयानक गृहयुद्ध में उलझ जाए। कहने का तात्पर्य यह कि समझौता भले हो गया, अमेरिका भले वहां से चला जाए, अब वैसे भी उसकी उपस्थिति इतनी कम है कि उसके रहते तालिबान वहां कायम हो चुके हैं। यह अफगानिस्तान का दुर्भाग्य है कि पिछले चार दशकों से वह अशांति और अस्थिरता का शिकार है, लेकिन कभी उसे संभालने का समुचित प्रयास नहीं हुआ।

तालिबान ने 1996 में पाकिस्तान की मदद से काबुल पर कब्जा जमाकर शासन किया। यह शासन कैसे रहा है यह बताने की आवश्यकता नहीं। ओसामा बिन लादेन ने जिस इस्लामिक साम्राज्य का सपना दिखाया उसका एकमात्र साकार रुप वहीं था। अफगानिस्तान आतंकवादियों का केन्द्र बन गया। अभी वहां राजनीति ही गहरे विवादों में है। अफगानिस्तान के चुनाव आयोग ने अशरफ गनी को सितंबर में हुए चुनाव में विजीत घोषित कर दिया, लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला व उनके साथियों ने परिणाम को स्वीकार नहीं किया। इस मतभेद का लाभ तालिबान उठा सकते हैं और फिर वहां क्या होगा इसकी केवल कल्पना की जा सकती है। जो भी हो यह समझौता अमेरिका की पराजय का ही द्योतक है। एक आतंकवादी समूह से संघर्ष आरंभ कर फिर उसे ही अफगानिस्तान सौंपने का वैध आधार बना दिया है जो वहां कट्टर इस्लामी शासन कायम करना चाहता है। और वह भी केवल अपना पल्ला झाड़ने के लिए। यह नीति दुनिया के हित में नहीं है।

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